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Thursday, 22 September 2022

Oscar for India


जब हमें कोई मुवी बहुत अच्छी लगती है और खास कर के वह मुवी ब्लॉक बस्टर हो जाती है.... हम सोचतें है की यह मुवी को तो ऑस्कार मिलना चाहिए। लेकिन एसा होना मुश्किल है। आज तक कभी एसी फिल्मों को ऑस्कर नहीं मिला जो सिर्फ सुपरहीट हुई है। ऑस्कार जीतने के लिए कई क्राईटेरीया होतें है और बहुत से ज़जीस वोटींग के आधार पर बेस्ट फिल्म को चुनते है।

 
सत्यजीत रे, कल्पना लाज़मी, अमोल पालेकर, मीरा नायर, शेखर कपुर एसे कई आर्टीस्ट है जो फिल्म डाईरेक्ट करतें थे और उन्हों ने एसी फिल्म्स बनाई... जो ऑस्कार तक पहुंच सके। लेकिन मोडर्न आर्ट के मामले में विदेशी हमसे हंमेशा जीतते ही आए है। सो हमें कभी ऑस्कार नहीं मिल पाया। फिर बोलीवुड् ने भी कभी ऑस्कार के लिए मुवी बनानी नहीं चाही। सिर्फ आमिर या आशुतोष गोवारीकर अपनी तरह से कोशिश करते रहे। लेकिन वे भी ज्यादा सफल नहीं हो पाए।
 
अब यह हालत है की ब्लॉगर्स, युट्युबर्स और ईन्फ्ल्युएंसर्स ऑस्कार को 'खट्टे अंगुर' बताते हुए यह कह रहें है की ऑस्कार की कुछ ज्यादा वेल्यु नहीं है। ईसमें जीनते वाली फिल्म आर्थिक रुप से फ्लॉप होती है। कांस बर्लिन जैसे कुछ मल्टीनेशनल एवोर्ड् की वेल्यु वे भारत में बढा चढा कर दिखाना चाहतें है।
 
लेकिन, ऑस्कार निष्पक्ष एवोर्ड है और ईसमे पैसे या राजनीतिक दबाव से भी विक्षेप नहीं किया जा सकता। साम-दाम-दंड-भेद... वहां कुछ काम नहीं कर सकता। अगर एसा होता तो ऑस्कार एवोर्ड का ईतना नाम और सम्मान न होता।
 
बहुत से फिल्म मेकर्स समजतें है और चाहते भी है की भारत को एक गौरवशाली देश के रुप में दर्शा कर हम ओस्कार जीत सकतें है। लेकिन एसा नहीं हो सकता। लगान ईसका एक अच्छा उदाहरण है। हाल ही में मलियालम, बंगाली और मराठी फिल्म ईंडस्ट्री कुछ एसा काम कर रही है जो वर्ल्ड में नोटीफाई हो सके।
 
अब सवाल यह उठता है की कैसी फिल्म ऑस्कार जीत सकती है। अगर आप पीछले कुछ सालों की ओस्कार वीनर मुवीज़ देखें तो यह बहुत ही आसानी से दिखाई पड़ता है। जिन फिल्मों में एसी कहानी है, जिसी दुनिया ने क्भी देखा नहीं। एसी कहानी, जिस पर कभी कोई भी देश में फिल्म बनी नहीं। एसी कहानी जो बहुत सिंपल हो और एक सीदासादा ईंसान भी समज़ पाए। एसी फिल्म जो आपको एसा अनुभव दे, जो आपने पहले कभी फील न किया हो। एसी फिल्में ऑस्कार के नोमिनेशन तक पहुंच सकती है।

उदाहरण के तौर पर नोमेडलेंड 2021, पेरासाईट 2020 , ग्रीन बुक 2019 , द शेप ऑफ वोटर 2018.... एसी सब फिल्में ऑस्कर विजेता है। ईन फिल्मों को आपने देखी ही होगी। ईस में कहीं कोई देश के गौरवशाली ईतिहास के बारे में नहीं कहा गया है। ना ही ईनका बजेट हमारी बोलिवुद फिल्मों जितना बडा है! ईस में सीधे सादे तरीके से एक ईंसान की तकलीफें और उससे वह कैसे उगरता है यही दिखाया जाता है।  एसी फिल्में देख कर ईसे हम हमारी फिल्मों से कंपरे करना चाहिए। ताकी हम सच में वैश्विक फिल्म जगत में अपनी कुछ पहचान बना पाए। यह बहुत ज़रुरी है क्युं की पीछले कुछ सालों से हंगेरीयन, तुक्रीश, ईरानी जैसी हमसे कई गुना छोटी फिल्म ईंडस्ट्री भी विश्व सिनेमा में अपना डंका बजा रही है। हम साल की 800-900 फिल्में एनाउंस करते है और करीबन 250-300 बना भी देते है।  लेकिन विश्व में हमारी फिल्मों की पहचान न के बराबर है।
 
अच्छी बात यह है की अभी कई सुपरहीट फिल्मों को छोड कर ईंडिया ने अपनी 'ध लास्ट फिल्म शो' नाम की फिल्म भेजी है। यह फिल्म ऑस्कार के लिए वाकई अच्छी लग रही है।
 
 

Wednesday, 13 July 2022

गूंज - Movie

Goonj 1989 poster.png

गूंज (Goonj) एक एसी फिल्म थी जो मैने अब तक नहीं देखी! लेकिन ईस फिल्म के गाने मुज़े हंमेशा याद रहे। यह फिल्म का Audio Cassette मेरे पास अचानक ही आ गया। दरअसल मुझे उन दिनों हम फिल्म की ओडीयो कैसेट चाहीए थी। लेकिन पापा एसा कैसेट लाए जिस में ए साईड हम और बी साईड गूंज फिल्म के गाने थे! एसा दो तीन बार हुआ था की दो फिल्मों के गाने एक ही कैसेट में आ जाते थे। कई बार तो एकाध गाना कट भी हो जाता था। 
 
फिर कभी कभी मैं गूंज के गाने सुन लेता था। कुछ समय बाद मुज़े एहसास हुआ की गूंज के गाने मुज़े पसंद है! फिर मै वह गाने बहुत सुनने लगा। समा ये सुहाना, जवानी के दिन है, सुटा लगा लो यारों, लव टेक्नोलोजी वगैरह गाने मुझे पुरे के पुरे याद हो गए!
 
उन दिनों School में जब यह गाना में बार बार गुनगुनाने लगता तो दोस्त पुछते की यह कोन सी फिल्म का गाना है, और में यही कहानी सुनाता जो आपको अभी अभी सुनाई है।
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फिर Tape recorder का ज़माना गया और सारे कैसेट्स भी जाने कहां रख दिए गए। एमपी३ के युग में एसे पुराने और अनसुने गाने ढूंढना भी एक चेलेंज था। गूंज के गाने मुझे मिले ही नहीं। लेकिन युट्युब आने के बाद यह गाने मुज़े फिर से सुनने को मिले।

खैर, कैसेट पर Juhi Chawla और Kumar गौरव का फोटो देख कर तो लगा था की यह कोई हीट मुवी ही होगी। लेकिन वास्तव में यह फिल्म हीट नहीं थी और उस समय शायद इसके बारे में कोई जानता नहीं था। कैसेट पर पढा की संगीतकार कोई बिद्दु जी है। ईंटरनेट के युग में पता चला की बिद्दु जी फिल्मी गानों को Remix भी करतें है। 
 
अगर आपको याद हो की जब प्यार किसी से होता है का एक रीमिक्स गानों का कैसेट बडा हीट हुआ था। जिस मे मदहोश 'दिल की धडकन' गाना बहुत ही अच्छा रीमिक्स हुआ था। वह सारे गाने बिद्दु जीने ही किए थे। फिर एक और आलबम लेट नाईंटीस में आया था, सुबह सुबह जब खिडकी खोले बाजु वाली लडकी हाय... यह आलबम या फिल्म के गाने बिद्दु जीने हीसंगीत बद्ध किए थे।
 

 
सुन लिज़ीए एक गाना, हो सकता है आपको पसंद आए!
 

आगे पढें नरसिम्हा या  हम फिल्म के बारे में!
 

नरसिम्हा - Movie

 
1991 में आई एन. चंद्रा की नरसिम्हा (Narsimha) एक हीट फिल्म थी। ईसमें Sunny Deol और रीयालीटी शो Boogie Woogie के जज डान्सर Ravi मेईन हीरो के रोल में थे। Urmila Matondakar की बतौर हीरोईन यह पहली फिल्म थी। जाओ तुम चाहे जहां, हमसे तुम दोस्ती कर लो, लेकिन मुहोब्बत बड़ी है, पकड पकड खेंच के पकड जैसे लक्ष्मीकांत प्यारेलाल द्वारा कंपोझ कीए हुए गाने भी बहुत चले थे।
 
Sunny Deol और Om Puri का रोल ईस फिल्म में बहुत अच्छा था जिसमें Dimple kapadia ने बहुत अच्छा साथ दिया था। कुल मिला कर फिल्म देखनेलायक बनी थी। लेकिन फिर भी रियालीटी से थोडी दुर ज़रुर थी। जैसे घातक में 'कातिया' की एक अलग ही दुनिया दिखाई गई थी, वैसे ही नरसिम्हा में 'बापजी' का अलग ही माहौल था। ईस में सनी देओल का शेरवाले टेटु के साथ आना बहुत रोमांच पैदा करता था।
 

 

मैनें दरअसल अपने स्कूली दोस्तों से नरसिम्हा के बारे में सुना था। रिसेस के समय वे सभी नरसिम्हा बने सनी देओल की तारीफ कर रहे थे। वह कैसे तलवार चलाता है और हाथ में नरसिम्हा का टैटू भी बनाया हुआ है वगैरह। घर में जीद्द कर के हम सब वह फिल्म देखने गए। और मुज़े तो बहुत ही ज्याद मज़ा आ गया! मेरे लिए 'नरसिम्हा' जैसे एक सुपरहीरो बन गया था।

अगले दिन स्कूल जा कर मैं भी अपने दोस्तो के साथ नरसिम्हा की बातों में जुट गया। फिर मैं भी दुसरों की तरह अपने बाजू पर बोल पोईंट पेन से नरसिम्हा का टैटु बना कर सबको दिखाया करता था!घर में टैप रेकोर्डर होने के कारण नरसिम्हा की कैसेट भी मंगवाई थी और फिर मैं उसके गाने रीपीट मोड में सुना करता था!

मै नरसिम्हा बचपन में सिर्फ एक ही बार देख पाया। उन दिनों में तो सोच भी नहीं सकते थे की फिल्म को दोबारा देखी जा सकती है / देखी जानी चाहिए! यह बात दिमाग में कभी आती ही नहीं थी। उस समय भी घर में केबल कनेक्शन वगैरह नहीं होने के कारण यह फिल्म कभी देखने को नहीं मिली। लेकिन फिर एक बार स्टेशन के पासवाले थियेटर में, जहां सुबह के मेटनी शो में मिथुन दा और बी ग्रेड की फिल्में चलती रहती है... वहीं नरसिम्हा फिल्म लगी थी। वहां यह फिल्म फिर से देख ली।

वैसे नरसिम्हा सच में एक अच्छा कोन्सेप्ट है। जो सुपरहीरो के जैसे भी काम कर सकता है। अगर ईसे साउथ की फिल्मों की तरह ट्रीटमेंट दे कर फिर से बनाया जाए तो भी यह दर्शकों को एक बढिया रोमांचकारी अनुभव दे सकता है। 

ईस फिल्म से जुडे आपके क्या विचार या यादें है, कॉमेंट कर के ज़रुर बताए!

आगे पढें फिल्म हम और गुंज के बारे में|

Tuesday, 28 June 2022

हमें Academy Award Oscar क्युं जीतना होगा?


हमें Academy Award Oscar क्युं जीतना होगा?
 
दुनिया की सबसे अधिक Films भारत में बनती है। ईसमें से बहुत कम Movies पुरे भारत के दर्शकगण पसंद कर पाते है। अधिकत्तर Bollywood Films बहुत पुरी तरह फ्लॉप हो जाती है। यह तो हुई कर्मर्शियल बात। दरअसल सिनेमा सिर्फ एंटरटेनमेंट नहीं है। वह एक आर्ट भी है। बहुत सी कलाओं का मिश्रित स्वरुप।

हम सिर्फ एंटरटेनमेंट के लेबल तले फिल्म देखना चाहते है। यह पुरी तरह गलत है। आप खुद भी एसा नहीं चाहते, यकीन मानिए! आईए, आपकी पसंद और नापसंद के बारे में चर्चा करतें है! 
 
हाल की मौजुदा परिस्थिति
 
दर्शकः
हमारी भारतीय फिल्मों के दर्शको के बारे में कहा जाता है की... जनता जनार्दन है, वही फिल्म का आखरी फैसला करती है। लेकिन क्या यह सच है? कौन सा डिरेक्टर या फिल्म मेकर आपसे पुछने आता है की, 'मालिक, आपके लिए अगली फिल्म कैसी बनाउं?'
 
फिल्म मेकर्स एसे प्रकार / जोनर की ही फिल्मे बनाते है जो पहले भारत या विदेश में हीट हो चूकी हो। अलग करने जाएंगे तो उनको अपने पैसे डूबने का ड़र रहता है। दुसरा डर यह भी है की, सिर्फ एक फिल्म फ्लॉप हो जाने पर भी बोलिवुड में अधित्तर रिश्ते बदल जाते है। दुसरी बार काम ढुंढना मुश्किल हो जाता है। ईसलिए वे बड़े प्रेक्टिकल तरीके से ईंडस्ट्री में बने रहेना चाह्तें है।
 
दर्शक सर्वोपरी नहीं है। अगर आपको एसा वहम है तो उसे दुर करो। सिर्फ आप ही दर्शक नहीं हो। फिल्म किसी और देश या प्रदेश में चलेगी तो भी फिल्ममेकर खुश है।अगर आप थियेटर में नहीं जाते तो फिल्म को ओटीटी पर बेच दी जाएगी, आप देखो या ना देखो। फिल्म का खर्चा और थोडा फायदा निकल गया वह भी कभी कभी बड़ी बात कहलाती है।खर्चा अगर निकल गया है फिर दर्शको को कौन पुछता है?
 
फिल्म मेकर्स
बहुत पापड बैलने के बाद फिल्म मेकर बना जा सकता है। फिल्म मेकींग को सीखना तो बहुत आसान लगेगा, जब ईंडस्ट्री में यह काम ढुंढने जाओगे। एक मेकअप आर्टिस्ट्स, लाईटमेन या क्लेपबोय भी एसा मिल जाएगा जो फिल्म मेकींग जानता हो!
 
लेकिन फिल्म एसे नहीं बनती। फिल्म प्रोड्युसर और फाईनांसर को कैसे अप्रोच किया जाता है, वह कैसे आपको प्रतिउत्तर देते है, फिर आप कैसे उनको मनाते हो ... ईन सब बातों से अधिक कठीन है रोज़ धक्के खाना, अपमानित होना, शहर में सर्वाईव करना, पर्सनल तकलीफों को भुला देना और सालों तक यही सब दौहराते रहना।
 
फिर जा के कुछ परिस्थितियां आपको अगर एक मौका देती है, फिर आप कोन सा कद्म उठाते हो? क्या आप एसी फिल्म बनाओगे जो फ्लॉप हो सकती है या वह फिल्म जो सभी लोग बना रहें है और अधित्तर हीट होती है?
 
ईस मुकाम पर सोचना, निर्णय करना बहुत कठिन है। अगर आप हीट हो गए फिर मौके ही मौके है, लेकिन अगर फ्लॉप हुए तो हंमेशा के लिए बोरिया बिस्तर बांध के वापस घर। अंत में यहां हो सकता है की आपके कनेक्शन या वंशवाद शायद काम आए और आपको फिर कुछ मौके मिल पाए।
 
 

ऑस्कार एवोर्ड
तो ईस सतही / ज़मीनी सच्चाईयों को ध्यान में रख कर फिल्म के एवोर्ड के बारे में लोग सोचतें है। ऑस्कर एवोर्ड एक पहेचान दिलाता है। उस से कोई सीधा पैसा नहीं मिलता। अगर एवोर्ड या अच्छे काम करने की लालसा हो वही लोग एवोर्ड के चक्कर में पड़ते है। दर्शको को भी एवोर्ड विनिंग फिल्में पसंद नहीं आती। बहुत कम एसी फिल्में है जिसे एवोर्ड भी मिला हो और फिल्म व्यावसायिक तौर पर सफल भी हुई हो। 
 
Oscar क्युं जीतना होगा? 
सम्मान
देखा जाए तो ऑस्कर सिर्फ एसी फिल्मों को मिलता है जो उसके अपने स्टांडर्ड से मेल खाते हो। वैसे ही फोरेन फिल्म केटेगरी में एक बेस्ट फोरेन लेंग्वेज फिल्म केटेगरी में भी ये एवोर्ड मिलता है। ब्रिटन और फ्रांस ने तो यह ईनाम कब से जीत रखें होंगे। लेकिन पिछले कुछ सालों से तुर्कीश, हंगेरी, चिले जैसे कई देश भी यह जीत चुके है। https://en.wikipedia.org/wiki/List_of_countries_by_number_of_Academy_Awards_for_Best_International_Feature_Film
 
 
भारत में जब दुनिया की सबसे अधिक संख्या फिल्म बन रही है, हम कई बार उस एवोर्ड में नोमिनेशन पाने के बाद भी जीतने से बाकी रह गए है। यह सिर्फ एक एवोर्ड नहीं रह गया है, हमारे लिए एक चुनौती बन गई है।  वैसे कईलोग निराश हो कर एस एवोर्ड को खट्टा अंगुर बताते हुए बारे में अलग अलग बात करते है!
 
लेकिन अगर होलिवुड फिल्मो का जनक है तो उसके द्वारा दिया जानेवाला एवोर्ड ही यह प्रामाणित करेगा की फिल्म वर्ल्ड क्लास है की नहीं। ईस चैलेंज को स्वीकार कर के कई देशों ने फोरेन लेंग्वेज की फिल्में सबमीट कर के यह एवोर्ड जीता है। हमें भी फिल्मों में अपनी दक्षता साबित करने के लिए यह एवोर्ड जीतना ही होगा।

क्या हमारी फिल्ममेकिंग दक्षता अभी भी कम है? ऑस्कार हमें कैसी फिल्में दिला सकती है? क्या हमें ऑस्कर जीतना चाहिए? एक दर्शक के तौर पर आप क्या सोचतें है, एक भारतीय के तौर पर आपके विचार क्या है, फिल्मों के चाहक की क्या राय होनी चाहिए?

अपने विचार कोमेंट जरुर करें।
 

Monday, 20 June 2022

परिचय


कोई भी फिल्म शुरु होती है तो पहला द्रश्य से ही दर्शक बहुत सारी उम्मीद बांध लेते है। ठीक वैसी ही उम्मीद और जिज्ञासा जो हम किसी अच्छे पढते लिखते बच्चे या नई नौकरी पाने वाले नौजवान से लगाते है। मानो पहले प्यार को ढुंढता हुआ आशिक जो कुछ महसुस करता है। कोई नई गाडी खरीदने पर या कोई नई जगह जाने पर नयापन लगता है। पता नहीं.....जाने आगे क्या हो!

'परिचय' गुलज़ार जी की एक क्लासिक फिल्म है। शायद सभी ने यह फिल्म एक बार तो देखी होगी। रामगोपाल वर्मा जिस तरह हर एक्टर को अलग केरेक्टर में पेश करते थे....गुलज़ार जी ने यह बहुत पहेले ही कर दिया था! जितेन्द्र जैसे जम्पींग जेक एक्टर को ईतना गंभीर और ठहराव वाला रोल देना ही बहुत अद्*भुत सोच थी। सभी को जया बच्चन से तो अपेक्षा होती ही लेकिन जितेन्द्र?

फिर एक फिल्म लिखना, उस की स्क्रीप्ट, संवाद भी लिखना और उपर से गीत भी लिखना.....गुलज़ार ही कर सकतें है एसा तो! और फिल्म को देखो तो? पुरी तरफ परफेक्ट, मानो एक एक क्षण किसी शिल्पकार ने धीरे धीरे उभारे हो। टेक्निकल खामीयां भी कोई नहीं!

लेकिन आज कल जैसे ट्रेलर, प्रोमो और फिल्म मेकिंग के सीन्स आधी फिल्म तो दिखा ही जाते है, जिस से दर्शक की आधी जिज्ञासा तो पुरी ही हो जाती है। आधी फिल्म बे मतलब (फिल्म की कहानी में जबरन डाले हुए ) गानों से भरी हुई होती है। एसे ही फिल्म मेकर्सने नया श्लोक/आयात बोलिवुड को दी है...
एन्टरटेईन्मेन्ट-एन्टरटेईन्मेन्ट-एन्टरटेईन्मेन्ट!
अगर दादा साहब फाळके या राज कपूर ने भी एसा ही सोचा होता तो?


खैर....अब परिचय की कहानी पर आते है।

कर्नल राय साहब एक कड़क मिज़ाजी ईन्सान है, अपनी पुरखों की हवेली में रहते है। अपने उसुलो के पक्के और नियमों से बंधे हुए। अपने संगीत प्रेमी बेटे निलेश से वह खफा थे क्यों की वह उनके मर्जी के खिलाफ संगीत सिखता था और अपने गुरु की लडकी से बिना बताए शादी कर ली थी।


राय साहब उसे घर से निकाल देतें है। स्वाभीमानी निलेश भी घर वापस नहीं लौटता। अपना जीवन गरीबी में व्यतित करता है। उसके कुल पांच बच्चे होते है। रमा, अजय, विजय, मीता और संजय (संजु)। निलेश की पत्नी गुजर जाती है और निलेश भी बहुत बिमार होता है।

वह अपने पिता कर्नल राय साहब को खत लिख कर बताता है। आखिरकार निलेश की मृत्यु के बाद वह बच्चे अपने दादा जी मतलब कि राय साहब के पास पहुंच जाते है। 

रमा सबसे बडी थी और उसे लगता था की अपने पिता की मौत के जिम्मेदार उसके दादा राय साहब थे...वह उनसे खफा होती है। सारे बच्चे भी उसीका अनुकरण करतें है। गुस्सैल राय साहब और उनकी बहन सती देवी बच्चों पर सख्ती बरतती है।

बच्चों को टीचर की व्यवस्था घर में ही दी जाती है। लेकिन बच्चे अपनी शरारतों से उन सभी शिक्षकों को भगा देतें है। वे पढना ही नहीं चाहते।

रवि शहर नौकरी ढुंढ रहा है| यहां एक बहुत ही हृदयस्पर्शी सीन जोडा गया है, जिस को शायद कम लोगों ने नोटिस किया होगा/याद रखा होगा। ईस सीन जब रवि एक बनिये के वहां नौकरी के लिए जाता है तो उसे नौकरी मिल जाती है। लेकिन उसे पता चलता है की उसको वह नौकरी कीसी बुढे कर्मचारी की जगह पर मिल रही है। रवि की उस बुढे कर्मचारी से बात, संवाद होता है। मुझे यह सीन बहुत पसंद आया। यह सीन आप जरुर देखिएगा। फिल्म में यह सीन शायद जरा भी जरुरी नहीं था, कहानी से ईसका कोई तालुक भी नहीं था। लेकिन फिर भी...जीवन की करूणा और मानवता फिल्मों में होनी/दिखानी ही चाहिए; गुलज़ार जी यही मानते होंगे। सुपर्ब!

ईस से पहले गुलज़ार जी की फिल्म मेरे अपने में मुख्य हीरो रह चूके विनोद खन्ना ने रवि के दोस्त अमित का किरदार निभाया...जो मेरे खयाल से बड़ी उदारता है।

अमित रवि को सलाह देता है जब तक नौकरी न मिल जाए गांव जा कर उसके मामा जी जो नौकरी दिलवा रहें है....वह कर ले। फिर अच्छी नौकरी मिलने पर चाहे तो वापस लौट आए।

ईस प्रकार रवि गांव की ओर निकल पडता है, ईस कर्णप्रिय गीत के साथ....मुसाफिर हुं यारो! 

रवि अपने मामा जी के साथ राय साहब को मिलने जाता है और वहां उसकी शिक्षक की नौकरी पक्की हो जाती है। वहां रवि किस तरह धीरे धीरे शरारती बच्चॉ के सुधारता है और उनका दोस्त बनता है यह कहानी का सबसे मजेदार हिस्सा है।


धीरे धीरे रमा रवि से प्यार करने लगती है, राय साहब भी रवि पर विश्वास करने लगते है। रवि धीरे धीरे अपने प्रयासों से बच्चों के दिल से अपने दादा जी, मतलब की राय साहब के प्रति जो गुस्सा था वह निकाल देता है।

उल्लेखनीय है की विलन या नेगेटीव रोल में प्रस्थापित हो चूके प्राण साहब की केरेक्टर भूमिका दर्शकों और विवेचकों द्वारा बहुत पसंद की गई। जितेन्द्र और प्राण को अपने चलते आ रहे रोल से अलग लेकिन यथायोग्य रोल में देखना...बहुत फ्रेश अप्रोच था!


राय साहब के नौकर 'नारायण' का रोल असरानी ने अदा किया है। यकीन मानीए ईस रोल को असरानी के अलावा अन्य कोई भी शायद ही न्याय दे पाता। नारायण स्वामी भक्त है और कर्नल राय साहब के अकेलेपन के दुख से अच्छी तरह वाकेफ है।

ईस बीच कर्नल साहब को काम के सिलसिले में बाहर जाना पडा। बच्चे जो घर में कैद से थे वह अब अधिक खुल गए। रवि भी उनको हंसाता, घुमाता और साथ साथ पढाता है। बच्चे रवि के मामा जी से मिलने उनके घर भी जातें है। मामा-मामी को रमा भा जाती है।


कोई भी लेखक या कलाकार यह जानता है की रचनाओं में विषमता (Contrast) का होना कितना जरुरी है। द्राश्य, श्राव्य या अनुभव हो सके ऐसा कोन्ट्रास्ट दिखाने से रचनाओं में रस बढता है। रचनाएं और ईन्ट्रेस्टींग हो जाती है। मतलब की साईझ कोन्ट्रास्ट, एस्थेटीक/फील कोन्ट्रास्ट ... सब होना ही चाहिए। वरना कहानी या फिल्म भी सरपट या सपाट हो जाती है।

फील/एस्थेटीक कोन्ट्रास्ट का बढिया उदाहरण होलिवुड की फिल्म 'ध प्रपोझल' हो सकती है। ईस में शहर से निकल कर छोटे से टाउन में आ कर रहना फिर आखिर में वापस शहर का वातावरण दिखाना...वगैरह दर्शक को रसप्रद लगता है। होलिवुड की एसी सेंकडो फिल्म हैं...कास्ट अवे, ध ममी, रोकी वगैरह।

अपने यहां कोन्ट्रास्ट का उपयोग कम बार हुआ है वह भी माईल्ड लेवल पर। या जब अमीर हीरो/हीरोईन या गरीब हीरो/हीरोईन का प्रेम दिखाया गया हो तब आप यह कोन्ट्रास्ट महसुस कर सकतें है।

लेकिन गुलज़ार और ह्रिषिकेश मुकर्जी ने एस्थेटीक कोन्ट्रास्ट का उपयोग किया है जो बहुत कम फिल्म दिग्दर्शक कर सके। वह भी उस जमाने में...जब फिल्म बनाना ही एक चेलेन्ज था!

यहां पुरी कहानी बता देने से अच्छा है की आप स्वयं ईस फिल्म को देखे और अनुभव करे। यह फिल्म एक पुरानी फिल्म 'द साउंड ओफ म्युझीक' से प्रेरित हो कर बनाई गई है। लेकिन गुलज़ार जीने ईसमें अपनी वो दक्षता दिखाई है की फिल्म पुरी तरह भारतीय परिवेश में ढल गई है। 

आनंद, परिचय, खुश्बु जैसी कई एसी फिल्में है जो एक बार देखने जैसी नहीं है। आप उम्र के अलग अल्ग पड़ाव पर ईसे देखें, आपको एक नया अनुभव और सीख मिलती रहेगी!

गुलजारजी की ही फिल्म खुश्बु के बारे में यहां क्लिक कर के पढें।

Friday, 24 July 2020

ऐसी हिंदी फिल्में जो ऑस्कर भी जीत सकती थी!





Oscar जीतना बहुत से film makers और फिल्मचाहकों का सपना है। कई कारणवश हम ऑस्कर जीतते जीतते रह जाते है। एसा भी नहीं की टेलेंट की कुछ कमी है। लेकिन ईतने दशकों से विश्व में सर्वाधिक फिल्में बनाने के बावजूद हम ऑस्कर पाने में सफल नहीं हुए। कारण कई है, लेकिन हम जब तक ऑस्कर जीतते नहीं ईन कारणों को दुनिया सिर्फ बहानें कहेंगी। आईए देखते है कुछ एसी फिल्में जो ऑस्कर जीत सकती थी।

सलाम बोम्बे 
मीरा नायर की 1988 में बनी फिल्म सलाम बोम्बे एक एसी फिल्म थी जो मुंबई के स्लम विस्तार में बनाई गई थी। ईस फिल्म में नाना पाटेकर, अनीता कंवर और रघुवीर यादव मुख्य भुमिका में थे और कहानी का हीरो एक बच्चा था - सफीक सैयद।
ईतना तो सबको पता ही होगा लेकिन एक ओर बात थी जो काफी कम लोगों को पता थी। ईतनी बेतरीन फिल्म का बाल कलाकार सफीक सैयद एक-दो फिल्म के बादकहां गया यह किसी ने जानने की कोशिश नहीं की! बारह साल बाद बेंगलोर के एक प्रमुख अखबारने ने  उस ऑटो ड्राईवर का ईन्टर्व्यु किया जो यह सलाम बोम्बे का एक्टर था। यह ईन्टर्व्यु ईस लिए लिया गया था क्युं की उस वक्त स्लम डॉग मिलेनियर फिल्म हीट हुई थी और सब लोग विष्य वस्तु में समानता होने के कारण ईस पुरानी फिल्म को याद कर रहे थे।
भले वह फिल्म उस दौर का जीवन, तकलीफें और दर्द दर्शाती थी, मुझे लगता है की सलाम बोम्बे अपने समय से आगे की फिल्म थी। अगर आपने यह फिल्म नहीं देखी तो जरुर देखें। और फिर स्लम डॉग मिलेनियर फिल्म से तुलना कर के हमें कोमेन्ट सेक्शन में अपनी राय दें।


तुंबाड
तुंबाड एक एसी फिल्म है जिसे बनने में छ साल लगे! एक बार यह बनी तो सही लेकिन निर्माता को यह लगा की फिल्म और बेहतर बन सकती थी। फिल्म ईन्डस्ट्री में कभी एसा सुना है की केवल ईसे वजह से पुरी फिल्म री-शूट की गई हो? सिर्फ अपने काम के बखान कर के या अगर अधिक समज़दार हो तो खुद की निंदा कर के लोग निकल लेतें है। लेकिन कभी री-शूट नहीं करते! क्युं की ईस में पैसा लगता है और जितनी की थी उतनी ही मेहनत लगती है!
लेकिन तुंबाड फिल्म दोबारा शूट की गई और फिर दो-ढाई साल ईस पर पोस्ट प्रोडक्शन का काम हुआ। आप सबको तो पता ही होगा की कैसे बरसात के सारे सीन असल बरसात और लाईटींग में शुट कीए गए है। एक सीन में जब हीरो फानुस लिए गुफा में जा रहा था वह सीन भी केवल एक सच्चे फानुस से ही प्रकाशित किया गया था। एसी ही वास्तविकता हस्तर को देने के लिए ईतना बढिया एनिमेशन किया गया की सारी एनिमेशन के जानकार ईस के गुण गाने लगे।
हमें क्या है भई? हमने तो फिल्म देखी, वाहवाही की और चल दिए। ईस फिल्म को बह्त कुछ मिलना चाहिए था। 'शिप ऑफ थिसियस" में एक्टर के रुप में काम कर चुके सोहम शाह की यह खुद की पहली कोशिश थी। आशा है की वह फिर से ईतनी कोशिश कर के अच्छी फिल्म बनाएंगे....ताकी हम फिर से उसे ऑस्कर में ना भेजें!

'शिप ऑफ थिसियस' एक एसी फिल्म थी जिसे किरन राव के कारण अपनी पहचान मिल पाई। यह फिल्म भी ऑस्कर के काबिल थी। लेकिन पता नहीं क्युं यह फिल्म ईस सुची में शामिल नहीं कर पा रहा हुं। लेकिन ईसका ज़िक्र यहां जरुरी था। आप क्या सोचतें हे ईन दोनो फिल्म के बारे में?


अ वेडनसडे
ईस फिल्म का नाम कोई ओर क्युं नहीं था? में बताउं? ईसी फिल्म का डाईलोग है, "लोग नाम में अपना मझहब ढुंढ लेते है!"
यह फिल्म में कोई जवान हीरो नहीं था, ना ही कोई आईटम सोंग, ना कोई स्लो मोशन स्टाईलिश एक्शन सीक्वन्स। फिर भी यह फिल्म अपने बेहतरीन स्क्रीप्ट की वजह से दर्शको के दिलो-दिमाग पर छा गई।
में मानता हुं की यह फिल्म ओस्कर के हिसाब से शायद एक-दो मार्क्स कम हो... लेकिन उस वर्ष की भारत की सर्वश्रेष्ठ फिल्म थी!


स्वदेश
यह आशुतोष गोवारीकर की सर्वश्रेष्ठ फिल्म है। गांव का वातावर दर्शाती यह फिल्म कई कठोर सच्चाईयों को दर्शक के सम्मुख ले आती है। शाहरुख जैसा सुपरस्टार और रहेमान के सुपरहीट गानों के बावजुद२१ करोड में बनी यह फिल्म सिर्फ ३४ करोड़ कमा कर सीमट गई। फिर कोई दिग्दर्शक या निर्माता अच्छी फिल्म बनाने के बारे में क्युं सोचे?





बंदिनी
आज की फिल्मों की परिभाषा में पर यह नारी प्रधान फिल्म मोडर्न ना सही बोल्ड जरुर कही जा सकती है। अब यहां बोल्ड का अर्थ ऐसी ना ले लेना जो आज की फिल्में बोल्ड लेबल के नीचे आती है। ईस फिल्म का विषय बहुत अलग था। ईस की कहानी बता कर मैं दर्शको का मज़ा बिगाड़ना नहीं चाहता....लेकिन एक छोटा सा स्पॉईलर तो बनता है बिमल रॉय की विषय चुनने की निर्भीकता के लिए। वह है....प्रारंभ में ही पता चलता है की हीरोईन अपने पति का खुन कर के जेल काट रही है! यह फिल्म का ओपनींग सीन है।  अब आगे देखिते रहीएगा की क्या का होता है। ईस का एक गीत "मोरा गोरा अंग लई ले" गुलज़ारजी का सबसे पहला फिल्मी गीत है।

दो आँखें बारह हाथ
व्ही. शांताराम की यह फिल्म भारतीय २५ देखनेलायक फिल्मों की सुची में गौरवांवीत है। ईस फिल्म ने कई देशो में अपनी छाप छोडी और बर्लीन फेस्टीवल में ईनाम भी जीता। ईस का "ए मालिक तेरे बंदे हम" पुरे छह दशक बाद भी सबको जबानी याद है। ईस फिल्म की प्रेरणा व्ही. शांतारामजी को ध ओपन प्रीझन नामक एक ईंग्लेन्ड की एक कहानी से मिली थी। ईस फिल्म की सफलता के बाद ईस फिल्म की दक्षिण भारत में दो रिमेक भी बनी थी।




कागज़ के फुल
गुरुदत्त पहले से ही बहुत संजीदा किस्म के कलाकार रहें होंगे एसा मुझे लगता है। अत्यंत सुंदर वहीदा रहेमान के साथ उनकी यह फिल्म एक आईकोनीक फिल्म है। फिल्म में कहानी को उभारने का जो प्रयत्न किया गया है वह बहुत सुंदर है। फिर भी शायद यह फिल्म आज के दौर में स्क्रीप्ट के माममे में थोडी सी धीमी लगे लेकिन उस दौर के लिए वह फिल्म बहुत आगे थी।




आनंद
आनंद ह्रिषिकेश मुकर्जी की सर्वोत्तम फिल्म कही जा सकती है। यह फिल्म देखने में आज भी उतनी ही फ्रेश लगती है जितनी पहले लग रही होगी। ईस फिल्म को हम सबने देखा ही होगा और वर्ल्ड सिनेमा के लिहाज़ से भी यह एक उत्तम फिल्म है। अगर आपका कोई विदेशी मित्र फिल्मों का शौकीन हो, तो आप ईसे यह फिल्म देखने को जरुर कह सकते है।






खुश्बु
बहुत शरमींदगी के साथ यह फिल्म का यहां समावेश कर रहा हुं! शरमींदगी ईसलिए क्युं की मुझे लगता है की अपनी मनपसंद फिल्म का नाम एसे लिस्ट में जोड़ देना कहीं मेरा ईस फिल्म को अधिक पसंद करना तो नहीं! लेकिन मेरे कुछ मुद्दे है जो ईस फिल्म को ऑस्कार के लिए नामांकित करता है...मेरी ओर से!
पहला मुद्दा यह है की ऑस्कार विजेता फिल्में बहुत बार किसी पुस्तक के उपर से बनाई गई होतीं है - खुश्बु एक बंगाली साहित्यकार सरतचंद्र के उपन्यास पर आधारित है। दुसरा मुद्दा यह है की किसी वैश्विक या सामाजिक विषय ज्यादातर पसंद किए जातें है - खुश्बु एक नारी प्रधान फिल्म है और उसका पति डॉक्टर है जो पुरे गांव को हैज़े की महामारी से बचा रहा है। ईस तरह सामाजिक और वैश्विक दोनों विषय ईस में है। ईस लिए यह फिल्म ईस सुची में शामिल है। अगर आपने यह फिल्म नहीं देखी तो ज़रुद देखिएगा। और मुझे कोमेन्ट कर के बताईएगा की मेरा चयन ठीक था या गलत!


ईस के सिवा गाईड, आनंद, आग जैसी कई फिल्में है। जिनका जिक्र आगे नए लिस्ट में जरुर आएगा। आप अपनी राय और सुझाव जरुर दें।


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