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Thursday, 14 July 2022

वर्षात्सव


(मै बरसात में कागज़ की नाव की बात करने नहीं करुंगा! मै कोई Essay on Monsoon लिखने नहीं आया हुं, सिर्फ अपनी मिलीझुली बातें ही बता रहा हुं।)

वर्षाऋतु आए और बचपन याद न आए एसा कैसे हो सकता है! बरसातों में मेरा बचपन खिडकी के सलिए को थामे हुए गुज़रता था। वैसे पहली बारिश में तो नहाना बनता ही था, लेकिन अगर शाम को खेलने के समय अगर बारिश हो जाए तो भीग कर खेल पुरा करना सभी बच्चों की ज़िद्द रहती। यह हमारी प्रामाणिकता थी, बारिश के प्रति।
 
बारिश एक चमत्कार है। किस में यह ताकत है की तालाब को सूखा कर सके और फिर से भर सके? ईस विचार के आधार पर ... बारिश एक चमत्कार ही है। बारिश में कभी कभार सुरज का निकलना और उसे देखने के लिए पीछे ईंद्रधनुष का तैयार रहना एक महान घटना है।
 

 
 
लेकिन हम विज्ञान में विश्वास रखतें है। हम सब जानतें है की पानी कैसे भाप बन कर बादल बनता है और कैसे फिर से बारिश के रुप में वही पानी लौट आता है।  हमें पता है की विज्ञान एक दिन बारिश के लिए भी स्वीच बना देगा। या कोई एप, जो आपके ईच्छानुसार तरह तरह की बारिश करवा सके।
 
फिर भले देखो या ना देखो। चाहे आप ओफिस में सड़ रहे हो, ट्राफिक में फंसे हो या टीवी के सामने जम्हाईयां लेते लेते बारिश को कोस रहे हो! लेकन वह भव्यातिभव्य घटना उपर आकाश में घटती रहती है।
 
खिडकी से टंगे हुए भी बारिश का लुफ्त लिया जा सकता है, एसा मेरा मानना था। बारिश जब भी होती है घर हो या क्लास रुम मेरा ध्यान बाकी सबसे ज्यादा खिडकी के बाहर चला जाता। ओफिस में भी बारिश के समय में छत पर जा कर या खिडकी खोल कर हाथ गीला ज़रुर करता हुं! अभी तक बच्चा जो हुं!
 
 
आज वही बचपन का दिन है। बारिश से भीगा भीगा! बारिश में यहां से वहां जाते लोगों को देखना एक अलग ही आनंद है। वटवृक्ष के पत्तो से बगुलों की लीद भी धुल गई है। धुल से भरी भरी सडक पानी से धुल जाने के बाद प्यारी लगती है। कुछ लोग परेशान है, कुछ स्वीकार कर चुके है, कुछ कौतूहल से ओतप्रोत है। कुछ वाहन छींटे उड़ा कर जा रहें है, कुछ गढ्ढों से बच कर। 
 
बारिश की वजह से गर्मीयों से राहत की खुशी मध्यम वर्गीय लोगों को सर्वाधिक होगी। रेडियो पर बरसाती गानों की लडी सुन कर वही खुशी दोगुनी बढ जाती है। रात में एकाध छुटपुट मेंढक की ड्राउं ड्राउं मुझे गांव की याद दिला जाती है। सड्कों के किनारे कुछ ही दिनो हरी हरी घास ईस खुशी में निकल आती है, जाने मेयरसाब ईन्हें सदा के लिए किनारों पर बसने देंगे। ईन दिनों तरह तरह के किडों, पतंगो को देख कर लगता है की हां... हम सिर्फ मानव, गाय और कुत्ते ही नहीं है ईस दुनिया में।



जंगली पौधों की तरह बारिश कई भावनां और ईच्छाओं को भी मन में जाग्रुत करती है। अगर मन पाषाण हो चुका है फिर भी झंक्रुत तो करती ही है। जिस तरह नमीवाले मौसम में फर्श से पानी सुखने में देर और महेनत दोनों लगतें है, वैसे ही मन से बारिश से जन्मी भावनाए और यादें जल्दी जातें नहीं।
 
लेकिन आज काम पर लग जाना पडता है। रेईनकोट एक मानव निर्मित आवरण ही सही, लेकिन चमत्कार को मुज़ से अलग रकनेवाला काला जादु लगता है। फिर भी में बंद हथेली में बारिश की कुछ बूंदे अगले साल के लिए बचा कर रखता हुं।

Wednesday, 22 June 2022

बर्फ का गोला


बर्फ का गोला.... चुस्की का प्रारंभिक स्वरुप, सबने जीवन में खाया ही होगा। बस, उसी की कुछ यादें लिख रहा हुं, कैसे पहली बार बर्फ का गोला खाने को मिला और फिर दोबारा उसके लिए क्या क्या पापड बेलने पडे!
मुझे बर्फ तो क्या, ठंडे पानी पीने की भी मनाही थी। वैसे तो घर में फ्रिज था ही नहीं, सिर्फ एक ही दोस्त के घर पर फ्रिज था। लेकिन मुझे टोंसिल्स हो जाते थे, अगर मैं आईस्क्रीम खाउं या ठंडा पानी पी लुं। मम्मी की डांट फिटकार से तो अच्छा था कि मैं एसी कोई चीज़ें खाउं ही ना।

एक बार मैं अपने दोस्त के घर खेलने के लिए गया था। वहां शाम के साड़े पांच बजे एक बर्फवाला निकला। मेरा दोस्त उसकी मम्मी से जिद्द करने लगा। मुझे अभी बर्फ के गोले के बारे में पता ही नहीं था। देखा था लेकिन कभी खाने को भी मिलेगा, कल्पना करना मुश्किल था!

दोस्त की मम्मी ने चवन्नी दी। हम दोनों एक एक प्लेट ले कर वहां गए और दोस्तने बिना पुछे ही ओरेन्ज रंग डलवा दिया। उन दिनों बर्फ के घिस-पिस कर हाथों से ही दबा कर गोल लड्डु सा बना दिया जाता था। फिर उस पर कोई एक रंग डाल कर दिया जाता था। दाएँ-बाएँ दो अलग अलग रंगो का चलन थोडी देर से शुरु हुआ।
फिर वापस घर आ कर हम बर्क के गोले की चुस्कीयां लेने लगे। तब क्या बताउं के कितना मज़ा आ गया!

फिर आधा गोला खत्म करने पर मेरे दोस्त ने कहा अब ईस पर थोड़ा नमक डाल कर खातें है, मज़ा आएगा। अब तक तो गोले का मज़ा आ ही रहा था, नमक छीडकने के बाद स्वाद बढ गया! फिर मेरे दोस्त ने बताया की अलग अलग रंगो का स्वाद अलग अलग होता है, अब अगली बार काला खट्टा रंग खाएंगे। मैं भी हां में हां मिलाता रह गया। उस दिन हम क्या खेले क्या नहीं, लेकिन क्रुतज्ञावश में उस दिन उसकी सारी बातें मानता रहा!

तो एसा था मेरा पहला अनुभव बर्फ के गोले खाने का।
 
थोड़ा बडा हो जाने के बाद तो मैं घर से बाकायदा पैसे ले कर गोला खाने के लिए जाता। लेकिन एसा बहुत कम बार होता, क्युं की बर्फ खाने की घर से मंजुरी नहीं मिलती थी। हर बार 'ना' सुनना पडता था। फिर मुझे एक और मित्र मिला। 
 
उसके पास पता नहीं कैसे, हंमेशा पैसे होते थे। वह शायद मम्मी-पापा और बड़े भाई से अलग अलग पैसे लेता होगा। लेकिन जो भी हो, वह दिलदार दोस्त कम से कम... तीन-चार लोगों को बर्फ जरुर खिलाता था! यानि एक अठन्नी तो वह खर्च कर ही देता था। कभी कभी जब तीन-चार की जगह हम दो लोग ही मौजुद होते तो हम दो बार भी बर्फ खा लेते! मुझे बोनस का मतलब बचपन से ही पता था!
 
जब हम बर्फ खरीदते तो उसे छुप कर खाते. ताकि अधिक बच्चें हमें देख न लें और सबको या घरवालों को पता ना लगे। झाडीयों के पीछे बैठ कर हम आराम से बर्फ खाते और होठों के बदले हुए रंग को वापस सामान्य होने पोंछते रहते!

ईस तरह बर्फ के गोले का जादू बहुत लंबा चला।
 
हां, बर्फवाला गर्मीयों की सीझन में आता था। मतलब जब हम बर्फ खा रहे थे उन दिनों वेकेशन होता था या उसकी तैयारी होती थी। ईसलिए वेकेशन का मज़ा और बर्फ़ का गोला .... ईन दोनों की मिश्रीत यादें बहुत ही बढिया बनी!
 
वैसे, आठवीं कक्षा में जब स्कूल के पास एक बर्फवाला लड़का अपना ठेला ले कर आता... उस पर मुज़े गुस्सा आता था। हमारी स्क़ुल का रिसेस समय दोपहर तीन या साड़े तीन बज़े हुआ करता था। वह गोलेवाला लड़का बिलकुल टाईम पर आ के अपना ठेला लगा देता था। उसकी उम्र भी अधिक तो नहीं थी, शायद दो-तीन साल बड़ा होगा।  
 

 
उस समय वह एक टोपी खास पहनता, वैसी ही जैसी आमिरखान ने फिल्म दिल है की मानता नहीं में पहनी थी। पता नहीं, एसी कैप उसे कहां से मिल गई थी। गोराचीट्टा और भुरी आंखो के कारण वह कैप उस पर जंचती भी थी।
 
वहां हमारे और बाकी क्लास की लड़कीयां भीड़ जमा देती थी। वह बर्फवाला खुद को हीरो समजने लगा था। हमारे क्लास की एक लड़की को बिना पैसे भी गोला दे देता था। हमारे लिए बात बहुत संदेहास्पद थी। हम जब बर्फ लेने जाते तो हमे वह देर से ही बर्फ देता, पहले वह सारी लड़कीयों को ही बर्फ खिलाता। बहुत गुस्सा आता था उस पर... लेकिन खैर!
 

Sunday, 22 May 2022

तीसरी साइकिल



दसवीं क्लास में आने के बाद 3 महीने गुजर गए। फिर मेरे पापा ने हीरो रेंजर साइकिल खरीद कर दी। जिसको हम लोग सीधे हैंडल वाली साइकिल कह के बुलाते थे। यह साइकिल मैंने कम से कम से 8 से 10 साल तक चलाई होगी। हम लोग क्वार्टर में रहते थे और हमारा घर दूसरे माले पर था। हमारे यहां सब लोग चोरी के डर से अपनी अपनी साइकिल उठाकर ऊपर बरामदे में रखते थे! मेरा भी यही रूटीन रहा।

मैं अपनी साइकिल बहुत संभाल के रखता था। उसको घर पर ही रिपेयर और सर्विस करता था। और कई बार इसको बाहर भी देनी पड़ती। बहुत पुरानी हो जाने के बाद मैंने उसको एक दो बार कलर भी किया था।

इस साइकिल के पेडल प्लास्टिक के होने की वजह से बहुत जल्दी खराब हो जाते थे। तीन चार महीनों में एक नया पैडल का सेट डलवाना पड़ता था। फिर मैंने बोर होकर उसमें अपनी देसी साइकिल के पैडल डलवा दिए थे!

दोस्त लोग कहते थे कि अगर हाइट बढ़ानी हो तो साइकिल की सीट ऊंची करवा लेनी चाहिए। तो मैंने ऐसा भी करके देखा, लेकिन मेरी हाइट ज्यादा नहीं बढ़ी। क्योंकि मैं पहले से ही अपने क्लास में सबसे लंबा था!

मेरे पास जब दूसरे नंबर की सिंपल साइकिल थी, तब हमारा एक सरदार दोस्त हीरो रेंजर साइकिल लेकर आया था ऐसी हीरो रेंजर साइकिल मैं जब ब्रेक लगाते हैं तो "पों..." की आवाज आती थी। हम उसको बाहर बार साइकिल पास चला कर ब्रेक मारने को कहते थे। और उसकी आवाज सुनकर बहुत आश्चर्य होता था। लेकिन मेरे पास थी जबर हीरो रेंजर साइकिल आई, तब ऐसी आवाज मेरी साइकिल से नहीं आती थी।

उस साइकिल में मैंने थोड़े मॉडिफिकेशन भी करवाए थे। जैसे कि हैंडल भी यू शेप का डलवा कर देखा। आगे बास्केट भी डलवाई थी। सारी 'कार्टूनगिरी' मैंने इस साइकिल पर आजमा डाली! फिर सालों तक यह साइकिल वैसे ही पड़ी रही। और फिर मेरे पापा बोल कर उसे सस्ते में बेच डाला।

चौथी साईकिल

Saturday, 21 May 2022

दूसरी साइकिल

टोबू साइकिल के बाद मेरे पापा ने जो मुझे दो पहिए वाली साइकिल खरीद कर दी थी... उसे 'हीरो जेट'कहा जाता था। तो ऐसा नहीं था कि मुझे साइकिल स्टोर पर ले जाया गया था, बल्कि मेरे पापा खुद एक साईकिल लेकर के आए थे - जो साइज में अपनी बड़ीवाली साइकिल से थोड़ी छोटी थी। और वह डार्क ब्राउन कलर की थी। एक-दो सालों बाद मुझे पता चला कि यह एक लेडीस साइकिल है!!!

मैसेज अच्छा वैसे इसमें शर्माने जैसी कोई बात नहीं थी, क्योंकि मेरे स्कूल में मेरे क्लास में बहुत से बच्चे ऐसे ही साईकिल युज़ करते थे। यह साइकिल मैं स्कूल में ले जाने की हिम्मत नहीं कर पाया था क्योंकि मेरा कोई साथ ही नहीं था जो मेरे घर से स्कूल तक साइकिल पर जाता हो।

सातवीं कक्षा तक मैंने अपने एक दोस्त को पीछे बैठा कर डबल सवारी चलाना सीख लिया था। फिर मैं उसी दोस्त को बैठा कर पहली बार स्कूल में अपनी साइकिल ले जा पाया। भले उसको पीछे बिठाना पड़ा और डबल सवारी जाना पड़ा, लेकिन साइकिल को 'पहली बार' स्कूल में ले जाने की खुशी बहुत ज्यादा थी!

इस साइकिल से मैं कई बार गिरा था, और घुटनों में चोट लगी थी। कई बार इस पर मैंने अलग-अलग छोटे स्टीकर लगाएं  एक बार काले ऑयल पेंट से नाम भी लिखा। इसके लिए साइकिल का पंप भी मंगवाया और इसका पंचर बनाना भी सीख लिया!यह साइकिल में ज्यादा नहीं चला पाया  सातवीं से दसवीं की शुरूआत तक यह साइकिल स्कूल लेकर गया।

उसके बाद मैंने तीसरी साइकिल खरीदी जिसकी कहानी में आगे आपको सुना रहा हूं।

तीसरी साईकिल

पहली साइकिल


पहली साइकिल तो तीन पहियों वाली होती है ना? मेरे पास भी वैसी साइकिल थी, लेकिन वह पूरी तरह प्लास्टिक से बनी हुई। मैं जब 5 वर्ष का हुआ तब तक वह टूट चुकी थी। उसके दो-तीन साल तक मैं साइकिल चला नहीं पाया।
फिर घर से थोड़ी दूर एक परिवार ने भाड़े पर साइकिल देने का व्यवसाय शुरू किया। उन्होंने 5 से 6 छोटी दो पहिए वाली साइकिल भाड़े पर देना शुरू किया था। आधे घंटे के 50 पैसे और 1 घंटे का ₹1! मैं तो खुद को अमीरों में गिनता था, तो मैं 1 घंटे के लिए साइकिल लेता था!
मुझे साइकिल मांगने में शर्म आती थी। तो पापा को लेकर जाता था। ज्यादातर वहां पर राह देखनी पड़ती थी क्योंकि सारी साइकिल खत्म हो जाती थी। आधे घंटे के बाद मेरा नंबर आता था और पापा पीछे से साइकिल पकड़ते और मैं उनको दौडता रेहता। फिर एक बार मैंने पीछे मुड़ कर देखा तो पापा नहीं थे, और मैंने साइकिल चलाना सीख लिया था!
उसके बाद भी मैंने भाड़े से साइकिल चलाई क्योंकि खुद की साइकिल मुझे बहुत देर से मिली। तब मैं शायद पांचवी या छठवीं कक्षा में पढ़ता था। और मुझे कोई ज्यादा शौक भी नहीं था कि साइकिल लेकर स्कूल जाऊं, क्योंकि स्कूल में मुझे एसटी बस से जाना अच्छा लगता था! यह बस वाली कहानी मै आपको बाद में बताऊंगा।

इन भाड़े के साइकिल में कभी भी ब्रेक नहीं होते थे! अगर का साइकिल आधे घंटे के लिए नहीं है, तो डर रहता था कि समय आधे घंटे से अधिक ना हो जाए। नहीं तो 1 घंटे का किराया देना पड़ता था। इसलिए साइकिल 5 मिनट जल्दी ही दे दी जाती थी।
यह तो पहली साइकिल की बात जो मैंने सीखी थी लेकिन जो मुझे पापा ने खरीद कर दी उसी बातें करनी अभी बाकी है!