(मै बरसात में कागज़ की नाव की बात करने नहीं करुंगा! मै कोई Essay on Monsoon लिखने नहीं आया हुं, सिर्फ अपनी मिलीझुली बातें ही बता रहा हुं।)
Thursday, 14 July 2022
वर्षात्सव
Wednesday, 22 June 2022
बर्फ का गोला
बर्फ का गोला.... चुस्की का प्रारंभिक स्वरुप, सबने जीवन में खाया ही होगा। बस, उसी की कुछ यादें लिख रहा हुं, कैसे पहली बार बर्फ का गोला खाने को मिला और फिर दोबारा उसके लिए क्या क्या पापड बेलने पडे!
मुझे बर्फ तो क्या, ठंडे पानी पीने की भी मनाही थी। वैसे तो घर में फ्रिज था ही नहीं, सिर्फ एक ही दोस्त के घर पर फ्रिज था। लेकिन मुझे टोंसिल्स हो जाते थे, अगर मैं आईस्क्रीम खाउं या ठंडा पानी पी लुं। मम्मी की डांट फिटकार से तो अच्छा था कि मैं एसी कोई चीज़ें खाउं ही ना।
एक बार मैं अपने दोस्त के घर खेलने के लिए गया था। वहां शाम के साड़े पांच बजे एक बर्फवाला निकला। मेरा दोस्त उसकी मम्मी से जिद्द करने लगा। मुझे अभी बर्फ के गोले के बारे में पता ही नहीं था। देखा था लेकिन कभी खाने को भी मिलेगा, कल्पना करना मुश्किल था!
दोस्त की मम्मी ने चवन्नी दी। हम दोनों एक एक प्लेट ले कर वहां गए और दोस्तने बिना पुछे ही ओरेन्ज रंग डलवा दिया। उन दिनों बर्फ के घिस-पिस कर हाथों से ही दबा कर गोल लड्डु सा बना दिया जाता था। फिर उस पर कोई एक रंग डाल कर दिया जाता था। दाएँ-बाएँ दो अलग अलग रंगो का चलन थोडी देर से शुरु हुआ।
फिर वापस घर आ कर हम बर्क के गोले की चुस्कीयां लेने लगे। तब क्या बताउं के कितना मज़ा आ गया!
फिर आधा गोला खत्म करने पर मेरे दोस्त ने कहा अब ईस पर थोड़ा नमक डाल कर खातें है, मज़ा आएगा। अब तक तो गोले का मज़ा आ ही रहा था, नमक छीडकने के बाद स्वाद बढ गया! फिर मेरे दोस्त ने बताया की अलग अलग रंगो का स्वाद अलग अलग होता है, अब अगली बार काला खट्टा रंग खाएंगे। मैं भी हां में हां मिलाता रह गया। उस दिन हम क्या खेले क्या नहीं, लेकिन क्रुतज्ञावश में उस दिन उसकी सारी बातें मानता रहा!
Sunday, 22 May 2022
तीसरी साइकिल
दसवीं क्लास में आने के बाद 3 महीने गुजर गए। फिर मेरे पापा ने हीरो रेंजर साइकिल खरीद कर दी। जिसको हम लोग सीधे हैंडल वाली साइकिल कह के बुलाते थे। यह साइकिल मैंने कम से कम से 8 से 10 साल तक चलाई होगी। हम लोग क्वार्टर में रहते थे और हमारा घर दूसरे माले पर था। हमारे यहां सब लोग चोरी के डर से अपनी अपनी साइकिल उठाकर ऊपर बरामदे में रखते थे! मेरा भी यही रूटीन रहा।
मैं अपनी साइकिल बहुत संभाल के रखता था। उसको घर पर ही रिपेयर और सर्विस करता था। और कई बार इसको बाहर भी देनी पड़ती। बहुत पुरानी हो जाने के बाद मैंने उसको एक दो बार कलर भी किया था।
इस साइकिल के पेडल प्लास्टिक के होने की वजह से बहुत जल्दी खराब हो जाते थे। तीन चार महीनों में एक नया पैडल का सेट डलवाना पड़ता था। फिर मैंने बोर होकर उसमें अपनी देसी साइकिल के पैडल डलवा दिए थे!
दोस्त लोग कहते थे कि अगर हाइट बढ़ानी हो तो साइकिल की सीट ऊंची करवा लेनी चाहिए। तो मैंने ऐसा भी करके देखा, लेकिन मेरी हाइट ज्यादा नहीं बढ़ी। क्योंकि मैं पहले से ही अपने क्लास में सबसे लंबा था!
मेरे पास जब दूसरे नंबर की सिंपल साइकिल थी, तब हमारा एक सरदार दोस्त हीरो रेंजर साइकिल लेकर आया था ऐसी हीरो रेंजर साइकिल मैं जब ब्रेक लगाते हैं तो "पों..." की आवाज आती थी। हम उसको बाहर बार साइकिल पास चला कर ब्रेक मारने को कहते थे। और उसकी आवाज सुनकर बहुत आश्चर्य होता था। लेकिन मेरे पास थी जबर हीरो रेंजर साइकिल आई, तब ऐसी आवाज मेरी साइकिल से नहीं आती थी।
उस साइकिल में मैंने थोड़े मॉडिफिकेशन भी करवाए थे। जैसे कि हैंडल भी यू शेप का डलवा कर देखा। आगे बास्केट भी डलवाई थी। सारी 'कार्टूनगिरी' मैंने इस साइकिल पर आजमा डाली! फिर सालों तक यह साइकिल वैसे ही पड़ी रही। और फिर मेरे पापा बोल कर उसे सस्ते में बेच डाला।
चौथी साईकिल
Saturday, 21 May 2022
दूसरी साइकिल
टोबू साइकिल के बाद मेरे पापा ने जो मुझे दो पहिए वाली साइकिल खरीद कर दी थी... उसे 'हीरो जेट'कहा जाता था। तो ऐसा नहीं था कि मुझे साइकिल स्टोर पर ले जाया गया था, बल्कि मेरे पापा खुद एक साईकिल लेकर के आए थे - जो साइज में अपनी बड़ीवाली साइकिल से थोड़ी छोटी थी। और वह डार्क ब्राउन कलर की थी। एक-दो सालों बाद मुझे पता चला कि यह एक लेडीस साइकिल है!!!
मैसेज अच्छा वैसे इसमें शर्माने जैसी कोई बात नहीं थी, क्योंकि मेरे स्कूल में मेरे क्लास में बहुत से बच्चे ऐसे ही साईकिल युज़ करते थे। यह साइकिल मैं स्कूल में ले जाने की हिम्मत नहीं कर पाया था क्योंकि मेरा कोई साथ ही नहीं था जो मेरे घर से स्कूल तक साइकिल पर जाता हो।
सातवीं कक्षा तक मैंने अपने एक दोस्त को पीछे बैठा कर डबल सवारी चलाना सीख लिया था। फिर मैं उसी दोस्त को बैठा कर पहली बार स्कूल में अपनी साइकिल ले जा पाया। भले उसको पीछे बिठाना पड़ा और डबल सवारी जाना पड़ा, लेकिन साइकिल को 'पहली बार' स्कूल में ले जाने की खुशी बहुत ज्यादा थी!
इस साइकिल से मैं कई बार गिरा था, और घुटनों में चोट लगी थी। कई बार इस पर मैंने अलग-अलग छोटे स्टीकर लगाएं एक बार काले ऑयल पेंट से नाम भी लिखा। इसके लिए साइकिल का पंप भी मंगवाया और इसका पंचर बनाना भी सीख लिया!यह साइकिल में ज्यादा नहीं चला पाया सातवीं से दसवीं की शुरूआत तक यह साइकिल स्कूल लेकर गया।
उसके बाद मैंने तीसरी साइकिल खरीदी जिसकी कहानी में आगे आपको सुना रहा हूं।
पहली साइकिल
पहली साइकिल तो तीन पहियों वाली होती है ना? मेरे पास भी वैसी साइकिल थी, लेकिन वह पूरी तरह प्लास्टिक से बनी हुई। मैं जब 5 वर्ष का हुआ तब तक वह टूट चुकी थी। उसके दो-तीन साल तक मैं साइकिल चला नहीं पाया।






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