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Wednesday, 3 August 2022

घातक - Moive

राजकुमार संतोषी एसे डिरेक्टर है जिन्हों ने अंदाज़ अपना अपना जैसी कोमेडी फिल्म भी बनाई है और घातक, घायल, दामिनी जैसी जोश चढानेवाली फिल्में भी बनाई है, साथ साथ उन्हों ने हैलो (१९९६) फिल्म में पिता की एक्टींग भी की है। लेकिन पब्लिक यानी की जनता जनार्दन ईनकी जोश का पारा चढाने वाली फिल्मों को सरआंखो पर उठा लिया।
 
एक बार हुआ यह की मै राजा हिंदुस्तानी फिल्म देखने के लिए अपने मित्रों के साथ फिल्म थिएटर गया था। राजा हिंदुस्तानी सिर्फ दो हफ्तों से लगी थी और ईसके सभी शो हाउसफुल जा रहे थे। करिश्मा कपूर की नई स्टाईल और सुपरहीट गानों से यह फिल्म 'बझ' पर थी। थिएटर में घुसते ही पता चल गया की टिकट मिलनेवाले नहीं है।
 
फिर हुआ यह की बाजु के थियेटर में घातक फिल्म चल रही थी। मैने कभी सनी पाजी की फिल्म टोकीज़ में देखी नहीं थी। ईस फिल्म के हीट होने के बारे में सुना था लेकिन कभी यह फिल्म देखने के बारे में सोचा नहीं था। वैसे भी मैने घायल देखी थी और लगा की यह भी वैसी ही फिल्म होगी।
 
लेकिन फिर कोई चारा न होने के कारण हम घातक देखने चले गए।  पहले तो बनारस और सन्नी देओल का 'कुढपना' देखा। फिर एक एक कर के फिल्म की और परतें खुलती गई। अमरीश पुरी की बिमारी, बंबई शहर, मीनाक्षी शेषाद्री से दोस्ती ईन सबके बाद कातिया जैसे खूंखार विलन का अपना ही खौफ। छोटी बडी कई बातें है ईस फिल्म में जो ईस फिल्म पुरा देखने में मज़बुर करती है।
 
सिस्टम और कातिया से लडता, लोगों में दबा हुआ गुस्सा भडकाता सनी देओल मुज़े ईस फिल्म में... बाकी सारी फिल्मों से बहेतर लगे।
 
उसके बाद एक एक डाईलोग पर रोंगटे खड़े होना, एक एक सीन में पब्लिक का रिएक्शन, सनी देओल की एक्शन... शुरुआत से अंत तक फिल्म ईतनी दिलचस्प लगी की अभी भी कभी चैनल पर दीख जाती है तो चैनल स्कीप नहीं की जाती!
 
 
आगे सनी देओल की नरसिम्हा के बारे में पढे!
 
 

Monday, 25 July 2022

'हम' - Movie

 

Hum फिल्म तो आने के पहले ही Superhit हो गई थी। फिल्म की एन्डीग के टाईटल देख लिजीए, जिस के अंत में लिखा था की 'Next Show Housfull'! मै तो बच्चा था ईसलिए फिल्म देख कर थियेटर से बाहर भीड देख कर अचंबित हो गया की, ईनको कैसे पता अगला शो आउसफुल होने ही वाला है!
 
खैर। फिल्म का 'Jumma Chumma' गाना थानेदार फिल्म के 'Tamma Tamma' के साथ controvercy के बाद उससे कहीं आगे निकल चुका था । 'जुम्मा चुम्मा' गाने पर राष्ट्रीय ban लगा था। ईसी कारणवश ईसे बहुत समय तक रेडियो और टीवी पर दर्शाया नहीं गया था। 'जुम्मा चुम्मा' और का 'तम्मा तम्मा' गाना एक आफ्रिकन गाने पर से बनाए गए थे। दोनो गानों में होड लगी थी की कोन सा सुपरहीट होगा। ईसके अलावा सारे गाने जैसे की एक-दूसरे से करते है प्यार हम, कागज़ कलम दवात ला, सनम मेरे सनम को लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने संगीत से एसे तरबतर किया था की उसके ओडियो कैसेट भी धडल्ले से बिक रहे थे।
 
फिल्म के सारे छोटे-बडे केरेक्टर्स ईतने ईंटरेस्टींग बनाए थे की ईसे देख कर शोले की याद आ जाती है। बख्तावर, शेखर, कुमार, विजय, जुम्मा, सतरंगी, ईंन्स्पेक्टर गिरधर और केप्टन झटाक! बच्चन सा'ब को बड़े परदे पर देखना एक रोमांच होता था और साथ में Rajnikant, Govinda जैसे हीरो का ईस फिल्म में होना ईस फिल्म का मज़ा तीन गुना बढा दिया।

उस समय तो स्टोरी लाईन भी बहुत बढिया लगी थी। टाईगर के पुराने दिनों से कहानी मोड ले कर आज के शेखर तक जब पहुंचती थी तब लगता था की एक पुरी फिल्म देखने के बाद दुसरी फिल्म शुरु हो गई हो!दोनो हिस्से में अपना अपना रोमांच और मनोरंजन है।

ईसका गीत 'एक दुसरे से' मुझे तो बहुत अच्छा लगता था और स्कुल से चल कर घर आते हुए... अपने दोस्तों के साथ कभी कभी वही गाना गाते हुए आते थे। ओडियो कैसेट तो मैने फिल्म देख कर घर आते समय ही खरीदवा लिया था। उस पर बना टाईटल टेक्स्ट भी ड्रोईंग करना अच्छा लगता था। जो मैने कई बार डायरी वगैरह में बनाता रहता था।

ईस फिल्म की शुरुआत में जो गरीबी और गुंडागर्दी के सींस थे, वह अपने लोकेशन और डाईरेक्शन के कारण बहुत रियल लग रहे थे,  ठीक वैसे ही जैसे अग्निपथ में थे।  फिर पता चला था की दोनों के डाईरेक्टर एक ही थे... मुकुल एस. आनंद। लेकिन एसा जादु फिर देखने को नहीं मिला और १९९७ में वे चल बसे।

वैसे ईस फिल्म में गोन्साल्विस जो टाईगर के दोस्त और जुम्मा के भाई बने थे... वही ईस फिल्म के प्रोड्युसर रोमेश शर्मा है।

ईस फिल्म का असर ईतना तगड़ा था की अगले दो साल तो ईसी के गाने में घर पर बजाता रहता। फिर एक एसी ही दमदार फिल्म मुझे थियेटर में देखने को मिली... नरसिम्हा! उसके बारे में आगे पढने के लिए नीचे लिक पर क्लिक करें।
 

Thursday, 14 July 2022

वर्षात्सव


(मै बरसात में कागज़ की नाव की बात करने नहीं करुंगा! मै कोई Essay on Monsoon लिखने नहीं आया हुं, सिर्फ अपनी मिलीझुली बातें ही बता रहा हुं।)

वर्षाऋतु आए और बचपन याद न आए एसा कैसे हो सकता है! बरसातों में मेरा बचपन खिडकी के सलिए को थामे हुए गुज़रता था। वैसे पहली बारिश में तो नहाना बनता ही था, लेकिन अगर शाम को खेलने के समय अगर बारिश हो जाए तो भीग कर खेल पुरा करना सभी बच्चों की ज़िद्द रहती। यह हमारी प्रामाणिकता थी, बारिश के प्रति।
 
बारिश एक चमत्कार है। किस में यह ताकत है की तालाब को सूखा कर सके और फिर से भर सके? ईस विचार के आधार पर ... बारिश एक चमत्कार ही है। बारिश में कभी कभार सुरज का निकलना और उसे देखने के लिए पीछे ईंद्रधनुष का तैयार रहना एक महान घटना है।
 

 
 
लेकिन हम विज्ञान में विश्वास रखतें है। हम सब जानतें है की पानी कैसे भाप बन कर बादल बनता है और कैसे फिर से बारिश के रुप में वही पानी लौट आता है।  हमें पता है की विज्ञान एक दिन बारिश के लिए भी स्वीच बना देगा। या कोई एप, जो आपके ईच्छानुसार तरह तरह की बारिश करवा सके।
 
फिर भले देखो या ना देखो। चाहे आप ओफिस में सड़ रहे हो, ट्राफिक में फंसे हो या टीवी के सामने जम्हाईयां लेते लेते बारिश को कोस रहे हो! लेकन वह भव्यातिभव्य घटना उपर आकाश में घटती रहती है।
 
खिडकी से टंगे हुए भी बारिश का लुफ्त लिया जा सकता है, एसा मेरा मानना था। बारिश जब भी होती है घर हो या क्लास रुम मेरा ध्यान बाकी सबसे ज्यादा खिडकी के बाहर चला जाता। ओफिस में भी बारिश के समय में छत पर जा कर या खिडकी खोल कर हाथ गीला ज़रुर करता हुं! अभी तक बच्चा जो हुं!
 
 
आज वही बचपन का दिन है। बारिश से भीगा भीगा! बारिश में यहां से वहां जाते लोगों को देखना एक अलग ही आनंद है। वटवृक्ष के पत्तो से बगुलों की लीद भी धुल गई है। धुल से भरी भरी सडक पानी से धुल जाने के बाद प्यारी लगती है। कुछ लोग परेशान है, कुछ स्वीकार कर चुके है, कुछ कौतूहल से ओतप्रोत है। कुछ वाहन छींटे उड़ा कर जा रहें है, कुछ गढ्ढों से बच कर। 
 
बारिश की वजह से गर्मीयों से राहत की खुशी मध्यम वर्गीय लोगों को सर्वाधिक होगी। रेडियो पर बरसाती गानों की लडी सुन कर वही खुशी दोगुनी बढ जाती है। रात में एकाध छुटपुट मेंढक की ड्राउं ड्राउं मुझे गांव की याद दिला जाती है। सड्कों के किनारे कुछ ही दिनो हरी हरी घास ईस खुशी में निकल आती है, जाने मेयरसाब ईन्हें सदा के लिए किनारों पर बसने देंगे। ईन दिनों तरह तरह के किडों, पतंगो को देख कर लगता है की हां... हम सिर्फ मानव, गाय और कुत्ते ही नहीं है ईस दुनिया में।



जंगली पौधों की तरह बारिश कई भावनां और ईच्छाओं को भी मन में जाग्रुत करती है। अगर मन पाषाण हो चुका है फिर भी झंक्रुत तो करती ही है। जिस तरह नमीवाले मौसम में फर्श से पानी सुखने में देर और महेनत दोनों लगतें है, वैसे ही मन से बारिश से जन्मी भावनाए और यादें जल्दी जातें नहीं।
 
लेकिन आज काम पर लग जाना पडता है। रेईनकोट एक मानव निर्मित आवरण ही सही, लेकिन चमत्कार को मुज़ से अलग रकनेवाला काला जादु लगता है। फिर भी में बंद हथेली में बारिश की कुछ बूंदे अगले साल के लिए बचा कर रखता हुं।

Wednesday, 13 July 2022

गूंज - Movie

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गूंज (Goonj) एक एसी फिल्म थी जो मैने अब तक नहीं देखी! लेकिन ईस फिल्म के गाने मुज़े हंमेशा याद रहे। यह फिल्म का Audio Cassette मेरे पास अचानक ही आ गया। दरअसल मुझे उन दिनों हम फिल्म की ओडीयो कैसेट चाहीए थी। लेकिन पापा एसा कैसेट लाए जिस में ए साईड हम और बी साईड गूंज फिल्म के गाने थे! एसा दो तीन बार हुआ था की दो फिल्मों के गाने एक ही कैसेट में आ जाते थे। कई बार तो एकाध गाना कट भी हो जाता था। 
 
फिर कभी कभी मैं गूंज के गाने सुन लेता था। कुछ समय बाद मुज़े एहसास हुआ की गूंज के गाने मुज़े पसंद है! फिर मै वह गाने बहुत सुनने लगा। समा ये सुहाना, जवानी के दिन है, सुटा लगा लो यारों, लव टेक्नोलोजी वगैरह गाने मुझे पुरे के पुरे याद हो गए!
 
उन दिनों School में जब यह गाना में बार बार गुनगुनाने लगता तो दोस्त पुछते की यह कोन सी फिल्म का गाना है, और में यही कहानी सुनाता जो आपको अभी अभी सुनाई है।
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फिर Tape recorder का ज़माना गया और सारे कैसेट्स भी जाने कहां रख दिए गए। एमपी३ के युग में एसे पुराने और अनसुने गाने ढूंढना भी एक चेलेंज था। गूंज के गाने मुझे मिले ही नहीं। लेकिन युट्युब आने के बाद यह गाने मुज़े फिर से सुनने को मिले।

खैर, कैसेट पर Juhi Chawla और Kumar गौरव का फोटो देख कर तो लगा था की यह कोई हीट मुवी ही होगी। लेकिन वास्तव में यह फिल्म हीट नहीं थी और उस समय शायद इसके बारे में कोई जानता नहीं था। कैसेट पर पढा की संगीतकार कोई बिद्दु जी है। ईंटरनेट के युग में पता चला की बिद्दु जी फिल्मी गानों को Remix भी करतें है। 
 
अगर आपको याद हो की जब प्यार किसी से होता है का एक रीमिक्स गानों का कैसेट बडा हीट हुआ था। जिस मे मदहोश 'दिल की धडकन' गाना बहुत ही अच्छा रीमिक्स हुआ था। वह सारे गाने बिद्दु जीने ही किए थे। फिर एक और आलबम लेट नाईंटीस में आया था, सुबह सुबह जब खिडकी खोले बाजु वाली लडकी हाय... यह आलबम या फिल्म के गाने बिद्दु जीने हीसंगीत बद्ध किए थे।
 

 
सुन लिज़ीए एक गाना, हो सकता है आपको पसंद आए!
 

आगे पढें नरसिम्हा या  हम फिल्म के बारे में!
 

नरसिम्हा - Movie

 
1991 में आई एन. चंद्रा की नरसिम्हा (Narsimha) एक हीट फिल्म थी। ईसमें Sunny Deol और रीयालीटी शो Boogie Woogie के जज डान्सर Ravi मेईन हीरो के रोल में थे। Urmila Matondakar की बतौर हीरोईन यह पहली फिल्म थी। जाओ तुम चाहे जहां, हमसे तुम दोस्ती कर लो, लेकिन मुहोब्बत बड़ी है, पकड पकड खेंच के पकड जैसे लक्ष्मीकांत प्यारेलाल द्वारा कंपोझ कीए हुए गाने भी बहुत चले थे।
 
Sunny Deol और Om Puri का रोल ईस फिल्म में बहुत अच्छा था जिसमें Dimple kapadia ने बहुत अच्छा साथ दिया था। कुल मिला कर फिल्म देखनेलायक बनी थी। लेकिन फिर भी रियालीटी से थोडी दुर ज़रुर थी। जैसे घातक में 'कातिया' की एक अलग ही दुनिया दिखाई गई थी, वैसे ही नरसिम्हा में 'बापजी' का अलग ही माहौल था। ईस में सनी देओल का शेरवाले टेटु के साथ आना बहुत रोमांच पैदा करता था।
 

 

मैनें दरअसल अपने स्कूली दोस्तों से नरसिम्हा के बारे में सुना था। रिसेस के समय वे सभी नरसिम्हा बने सनी देओल की तारीफ कर रहे थे। वह कैसे तलवार चलाता है और हाथ में नरसिम्हा का टैटू भी बनाया हुआ है वगैरह। घर में जीद्द कर के हम सब वह फिल्म देखने गए। और मुज़े तो बहुत ही ज्याद मज़ा आ गया! मेरे लिए 'नरसिम्हा' जैसे एक सुपरहीरो बन गया था।

अगले दिन स्कूल जा कर मैं भी अपने दोस्तो के साथ नरसिम्हा की बातों में जुट गया। फिर मैं भी दुसरों की तरह अपने बाजू पर बोल पोईंट पेन से नरसिम्हा का टैटु बना कर सबको दिखाया करता था!घर में टैप रेकोर्डर होने के कारण नरसिम्हा की कैसेट भी मंगवाई थी और फिर मैं उसके गाने रीपीट मोड में सुना करता था!

मै नरसिम्हा बचपन में सिर्फ एक ही बार देख पाया। उन दिनों में तो सोच भी नहीं सकते थे की फिल्म को दोबारा देखी जा सकती है / देखी जानी चाहिए! यह बात दिमाग में कभी आती ही नहीं थी। उस समय भी घर में केबल कनेक्शन वगैरह नहीं होने के कारण यह फिल्म कभी देखने को नहीं मिली। लेकिन फिर एक बार स्टेशन के पासवाले थियेटर में, जहां सुबह के मेटनी शो में मिथुन दा और बी ग्रेड की फिल्में चलती रहती है... वहीं नरसिम्हा फिल्म लगी थी। वहां यह फिल्म फिर से देख ली।

वैसे नरसिम्हा सच में एक अच्छा कोन्सेप्ट है। जो सुपरहीरो के जैसे भी काम कर सकता है। अगर ईसे साउथ की फिल्मों की तरह ट्रीटमेंट दे कर फिर से बनाया जाए तो भी यह दर्शकों को एक बढिया रोमांचकारी अनुभव दे सकता है। 

ईस फिल्म से जुडे आपके क्या विचार या यादें है, कॉमेंट कर के ज़रुर बताए!

आगे पढें फिल्म हम और गुंज के बारे में|

Thursday, 30 June 2022

कच्चे रंग - दूरदर्शन

१९९७ या उसके बाद दूरदर्शन पर दोपहर एक नया धारावाहीक प्रसारित हुआ था। शायद उसका नाम 'कच्चे रंग' था। नाम मुज़े अच्छी तरह याद नहीं है, लेकिन फिल्म का टाईटल सोंग यही था.... क्च्चे रंग उतर जाएंगे, मौसम है गुज़र जाएंगे। जो गुलज़ार साहब द्वारा लिखीत था।

File:Gulzar.jpg - Wikimedia Commons

यह गाना फिर दो-तीन साल बाद सनसेट पोईंट नामक गुलज़ार जी के आल्बम में शामिल हुआ. कुछ बदलाव के सात। जो था, 'कच्चे रंग उतर जाने दो, मौसम है गुज़र जाने दो!' टीवी सीरियल और ओडीयो आलबम, दोनों में संगीत था विशाल भारद्वाज का। 

File:Vishal Bhardwaj 2017.jpg - Wikimedia Commons

सीरियल में दिखाया गया था की, एक बड़ी आलीशान हवेली या बंगला था।  जिसका मालिक के गुज़र जाने के बाद उनकी पत्नी अपनी दो-तीन बच्चॉं के साथ दुखी जीवन व्यतित कर रही थी। पैसो की ईंकम बंध हो जाने के बाद उनकी हालत खराब हो रही थी। उनसे कई लोग बंगला खरीदने की कोशिश करतें है। वह मां भी सोचती है की अगर बंगला बेच दिया जाए तो अच्छे पैसे मिल जाएंगे और बच्चीयों का जीवन संभल जाएगा।
 
बेहद उदास ईस धारावाहीक में हंसी / खुशी के द्रश्य बहुत कम थे। बेकग्राउंद संगीत बहुत ईमोशनल था और सिरीयल का ओवरओल फील बहुत अच्छा था। क्या आपने यह सीरियल देखा था?
अगर देखा हो तो ज़रुर कोमेंट कर के बताईए, जिस से कुछ मेरी भी यादें ताज़ा हो!
 
 

नटखट रानी बड़ी सयानी - दूरदर्शन


90s के दशक के दोपहर में बच्चों की एस सिरियल आई थी, 'नटखट रानी बड़ी सयानी'। कुछ लोगों ने यह फिल्म जरुर देखी होगी। ईस सिरियल में रानी नामकी लड़की दुसरे शहर से आती है या उसके माँ-बाप रानी का दाखिला बोर्डिंग स्कूल में कर देते है। वहां वह रानी को बिलकुल अच्छा नहीं लगता और काफी समय तक खुद को उस माहौल में ढाल नहीं पाती।

स्कूल में वह गुस्से से शैतानीयां करने लगती है। मन ही मन में दुखी रहनेवाली रानी सिनियर छात्राओसे झगडा भी कर लेती है। ईस तरह उसका एक ग़्रुप बन जाता है जो बाद में बहुत पोप्युलर हो जाता है और रानी को स्कूल अच्छा लगने लगता है!


वह उदास से चेहरे वाली लडकी एक क्लासमेट जैसी दिखने के कारण मुझे याद रह गई थी। मेरा भी स्कूल बदलने के कारण मैं उस सिरियल से और रानी के व्यवहार से पुर्णतः रिलेट कर पा रहा था। वह सिरियल मैने पुरी देखी थी।

ईन्टरनेट की सुविधा आने के बाद भी मैने वह सिरीयल के बारे में बहुत सर्च किया लेकिन कुछ मिल नहीं पाया। फिर एक बार नटखट रानी का टाईटल सोंग युट्युब पर अपलोड हुआ, जो देख कर बहुत अच्छा लगा।

फिर सालों बाद, किसी ने एक चौंकानेवाली (मेरे लिए) बात बताई की वह लड़की अब हैदराबाद की कलेक्टर बन गई है! फिर उन्हों ने वह कलेक्टर के फोटो भी शेर किए।  फिर उनका नाम भी पता चला - श्वेता मोहंती, IAS ।

 

 
हाला की उनके प्रोफाईल या बायो में ईस सीरियल का उल्लेख नहीं है, लेकिन नाम और चहेरा बिलकुल मेल खाता है। अगर आपने नटखट रानी बडी सयानी  देखी है तो आप क्या सोचतें है ईस के बारे में?
 
आगे पढें...

Friday, 24 June 2022

शोले - दूरदर्शन पर



केबल टीवी, वी.सी.आर. ना होनें के कारण कई बच्चों ने शोले फिल्म नहीं देखी थी। फिर जब 26 जनवरी 1996 को दूरदर्शन पर शोले फिल्म के प्रसारण की बात चली... सभी लोग बहुत खुश हो गए। यह बहोत से लोग का आंकडों का अंदाज़ा भी नहीं लगाया जा सकता।
 
उस दिन सालों बाद ठीक वैसे ही स्वयुंभु कर्फ्यु लग गया था जैसा रामायण के प्रसारण समय में होता था। दूरदर्शन पर यह पहली बार हुआ की किसी फिल्म के बीच में बहुत सारे विज्ञापन दिखाए गए हो।
 
फिल्म शुरु होने पहले कई टीवीवाले घरों में भीड़ जम गई थी। हालांकि, बहुत सारे घरो में अब टीवी आ चुके थे। फिर जब फिल्म शुरु हुई तो उसे देखने का वही आनंद आया जो, उस समय शोले फिल्म को थियेटर में देखने से मिला होगा।
 
फिल्म वैसे तो मल्टीस्टारर है और पुरी कहानी देखने लायक है, फिर भी सभी को ईंतज़ार तो गब्बरसिंह का था। लेकिन, एक बात एसी हुई जिससे गब्बरसिंह की एंट्री का पुरा मज़ा मारा गया। दूरदर्शन पर गब्बर की एंट्री के ठीक पहले ही Glunose D का पुराना गब्बरसिंह वाला एडवर्टाईझमेंट चला दिया गया। सब को लगा की यही गब्बर की एंट्री है, लेकिन वह विज्ञापन था।
 
ईस बात की चर्चा लोकल न्यूझपेपर में भी आई थी! दुरदर्शन की टीआरपी (या उस वक्त जो भी स्केल चलता हो) भी उस दिन टॉप पर चला गया था। लेकिन वह दिन नहीं भुला जा सकता जब दूरदर्शन पर ईतनी बड़ी फिल्म को दिखाया गया और करोडों लोगों ने वह फिल्म देखी।
 
दुसरे दिन स्कूल जा कर पता चला की एक-दो कमनसीब दोस्तों के घर उस दिन लाईट चली गई थी! कम से कम चार-पांच दिन तक फिल्म की बातें होती रही। बचपन से शोले के कई डाईलोग लोगों के मुंह से सुने थे। कई मैगेझींस में फोटो और आर्टिकल पढे थे। यह सब देख-पढ के शोले फिल्म देखने के लिए ईच्छा तो जाने कब से दबी पडी थी। लेकिन तब ना कैबल टीवी था और ना वी.सी.आर. कोई शोले फिल्म के लिए लाता था। उसके डाईलोग की ऑडीयो कैसेट भी बाज़ार में मिला करती थी। लेकिन दो कैसेट का वह सैट तो मध्यमवर्गीय बच्चे के लिए पाना नामुमकीन सा था, क्युं की अठन्नी में से चौकलेट और स्कुल में रिसेस का खर्चा भी तो बचाना होता था!
 
वैसे आपने यह फिल्म कब देखी थी? क्या मेरी तरह दूरदर्शन पर? अगर हां, तो ज़रुर बताईगा की आपका अनुभव कैसा रहा!
 

Thursday, 23 June 2022

थोडा सा रुमानी हो जाए


14 नवंबर 1992, शनिवार की शाम दूरदर्शन पर एक एसी फिल्म दिखाई थी, जिसका अर्थ मुझे तब जा कर समज आया... जब लगभग 2010 में जब ईस फिल्म की सीडी मेरे परममित्र ने मुझे भेंट में दी! देखिये ना, एक पंक्ति में कितने साल बित जातें है! मुझे एक प्लेटफोर्म चाहिए था जहां मन खोल कर ईस फिल्म के बारे में लिख सकुं।

आज २०२२, लगभग तीस सालों के बाद उसी फिल्म के बारे में, मै फिर से लिख रहा हुं! एसा नहीं है की पहले मैने ईस फिल्म के बारे में नहीं लिखा। बहुत से फोरम, सोशियल मिडीया, सवाल-जवाब के प्लेटफोर्म पर ईस फिल्म के बारे में मैने ढुंढा, लिखा और ईस फिल्म के बारे में सबको बताने का प्रयत्न किया।
ईस फिल्म का नाम है, 'थोडा सा रुमानी हो जाए'। मशहुर एक्टर अमोल पालेकरजी ने दूरदर्शन के साथ यह म्युझिकल फिल्म बनाई थी। म्युझिकल फिल्म का अर्थ है... कहीं भी-कभी भी संवाद गाने का रुप ले लेता हो।

यह फिल्म कई 4-5 फिल्मों पर आधारित है, जिनका क्रेडिट आखिर के आउट्रो टाईटल्स में दिया गया है।


 
पात्र परिचयः
कहानी की नायिका एक एसी लड़की है जिसकी शादी की उम्र बीती जा रही है। वह बिन माँ की लड़की 'बिन्नी', अपने पिता और दो भाएयों के साथ एक बहुत छोटे से शहर में रहती है। गर्मी का मौसम था और बारिश के कुछ आसार नहीं। बिन्नी अपने पिता और भाईयों की लाडली है। वे तीनों उसकी शादी की फिक्र करतें है। हालां कि, बिन्नी दिखने में साधारण है। अधिक गोरी नहीं, लड़कीयों जैसे नखरे नहीं। शायद, उसकी माँ होती तो उसका स्वभाव थोड़ा अलग हो सकता था।
 
 
बिन्नी के पिता खुद बहुत खुशमिजाज़ ईंसान है। वह अधिक फिक्र नहीं करते और बिन्नी की हर ईच्छा को मान देतें है। बिन्नी का छोटा भाई जिसका नाम 'बीम' है, वह अभी बच्चे से जवान हो रहा है। वह अपनी स्वतंत्रता चाहता है, और बड़ा दिखना चाहता है। लेकिन उसकी नादानी अभी जाने को है। ईन तीन पात्रों की आपस में एकदम एकदम बनती है।

बिन्नी के बड़े भैया, जो ईंजीनीयर भी है... वह घर में पैसे कमानेवाला ईंसान है। वही है जो घर को अपने कंट्रोल में रखना चाहता है। वह खुद को बहुत प्रेक्टीकल समजता है और बिलकुल एसे ही बातें भी करता है। वह बिन्नी को ले कर अपने पापा की तरह अधिक आशावादी नहीं है। वह सबको, वास्तविकता समझाना चाहता है, उसे स्वीकार करने को कहता रहता है।
 
कहानीः
बिन्नी की मुलाकात उस छोटे से शहेर के - नये मेयर से होती है। मेयर तलाकशुदा ईंसान है, धीर गंभीर विचार रखता है। जब बिन्नी के पापा और बीम की मुलाकात जब मेयर से होती है, उन्हें मेयर बहुत अच्छा ईंसान लगता है। वे सोचते है की  बिन्नी की शादी अगर मेयर से हो जाए...


लेकिन, मेयर शादी करना नहीं चाहता। बिन्नी अपने अकेलेपन से झूझ रही है। बीम भैया द्वारा अपने उपर हो रही सख्ती से परेशान है। बडे भैया सुखे की चिंता कर रहें है। बिन्नी के पिता अब कभी कभी बिन्नी की चिंता करने लगे है।
 

फिल्म  के मध्य हिस्से में एक और पात्र प्रविष्ट होता है। ईस पात्र के बारे में यहां उजागर करना ठीक नहीं रहेगा। हालांकि पोस्टर और कवर पर उसी को हीरो के तौर पर दिखाया जाता है। लेकिन मेरे विचार से ईस कहानी का कोई मुख्य पात्र नहीं है। बीम जैसा छोटा पात्र भी कहानी का महत्तम हिस्सा है। ईस तरह कहानी पुर्णतः सभी पात्रों और परिस्थितियो पर निर्भर है।
 
ईस बीच, भास्कर चंदावरकर द्वारा रचित कर्णप्रिय संगीत और गीत आतें है... जो कहानी के मुड को और प्रभावशाली बनातें है। एक शांत, गंभीर, अचानक हंसी की फुहार बरसानेवाली, आपको सुखे और बिन्नी की बीतती उम्र की चिंता देनेवाली यह फिल्म... आगे एसा मोड लेती है जो मै अच्छी तरह लिखना चाहता हुं। लेकिन यह फिल्म के साथ बेईमानी होगी!


लेकिन ईतना ज़रुर कहुंगा की, फिल्म के उस मोड़ पर ह्युमन बिहेवीयर की उस आदत को उजागर किया है... जहां कोई उम्मीद न होने पर लोग चमत्कार और जादु में कैसे विश्र्वास कर लेतें है! उस संवाद और परिस्थितियों का मिलन आप फिल्म के मध्य हिस्से में जरुर देखिए, बहुत मज़ेदार है!

यह फिल्म के बारे में पता चला की, यह फिल्म प्रदर्शित भी हुई थी और बुध्धीजीवी लोगों ने पसंद भी की थी। लेकिन एसी फिल्म जो मेन स्ट्रीम सिनेमा से अलग हो उसका प्रचलित या हीट हो पाना बहुत मुश्किल है। 1991 में बनी यह फिल्म 1993 में दुरदर्शन पर दिखाई गई ईसलिए उस वक्त सबको देखनी पडी होगी, एसा मै समजता हुं! दुरदर्शन पर ईस फिल्म के प्रसारण की तारीख ईस लिए ईतनी पक्की लिख पाया हुं, क्युं की बचपन में दुरदर्शन पर दिखानेवाली फिल्मों के नाम मुझे डायरी में नोट करने की आदत थी!
 
ईस फिल्म के पात्रों को किसी कॉलेज में ह्युमन बिहेवीयर के चेप्टर में शामिल किया गया है। सारे पात्रों की तटस्थता, एकदुसरे से मिल कर नीकल रहे प्रतिभाव वगैरह देखना बहुत रोमांचकारी है। सीधा सीधा एक सकारात्मक संदेश भी है, जो ईसके शीर्ष गीत में अच्छी तरह कहा गया है....
 
बादलों का नाम न हो, अंबर के गांव में।
जलता हो जंगल खुद, अपनी छांव में।
यही तो है मौसम (२)
आओ तुम और हम, बारिश के नग़्में गुनगुनाएं...
थोडा सा रुमानी हो जाए!
 
यही ईस फिल्म की मुख्य थीम / सीख है।  ईतनी तकलीफों में भी हमें उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए, तपती धुप में बारिश ना सही, बारिश के गीत तो गा ही सकतें है!

आशा है आप यह फिल्म ज़रुर देखेंगे। युट्युब पर फिल्म एक क्लिक में उपल्ब्ध है, और जिसे ढुंढने के लिए मेरे 6-7 साल गुज़र गए थे!



Wednesday, 22 June 2022

स्कूल की यादें


तीसरी कक्षा से School का मुख्य दरवाजा सामने ही पडता था! हमारी मेडम स्कुल की घंटी बजने की राह देखने को कहती थी, और हम school bag तैयार कर के बैठ जाते थे! मेरी बेन्च दरवाजे से सटी होने के कारण मै ईसी प्रकार भाग कर स्कुल से सबसे पहेले निकल पडता था! बाहर मेरे पापा को साईकल ले कर मेरी राह देखते हुए देख कर कितनी खुशी मिलती थी! मेरा घर मेईन रोड पर था...जहां दुर एक सरकारी स्कुल थी। शाम पांच बजे जब सब बच्चे छुट कर जाते तो कई लोग उन्हे बरामदे में खडे हो कर (चाय पीते पीते) उन्हे देखा करते। वे बच्चे भी खुब थे...जैसे कोई परेड चल रही हो, वे सब अपनी अपनी मस्ती मैं दोडते, भागते, चिल्लाते, बतियाते हुए चलते चलते घर जाते थे!

और हम सोचते रहेते की हम कितने अमीर है! हमारे पास तो अब साईकिल भी है! जब आठवीं तक आएंगे तब हम भी साईकल ले कर स्कुल जाया करेंगे.... क्या ख्वाब था! कितनी राह देखी गई थी! कुछ एसे बच्चे भी हुआ करते थे जिनका मक्सद सिर्फ और सिर्फ धमाल मचाना था। प्रायः मे जिन्हे बहादुर समझता रहा उनको रोते हुए देख कर अचंबित रह गया! हमारी स्कुल में फ्री पिरियड ज्यादा होते थे! या कभी मेडम को कुछ काम रहेता था....तो वह अपना काम करती थी। कुछ उनकी मुंहफट चमचीयां भी हुआ करती थी जो उनको कहती थी की दुसरे सर का होमवर्क बाकी है तो क्या वह हम कर सकते है? और एसे हमे फ्री पिरियड मिल जाते थे! मेरा होमवर्क ज्यादातर कंप्लीट होता था....और में एसे फ्री टाईम में यह करते हुए पाया जाता था! 

 


मेरे हिसाब से हमे खुब सारा होमवर्क दिया जाता था जो कम से कम एक-देढ घंटा चला करता था। यह तो बच्चो के साथ सरासर अन्याय था! फिर जब शाम पांच बजे 'राजकुमार जी' खेलने को निकलते.... कंप्युटर तो बहोत दुर की बात है! हमारे स्कुल मे पंखे भी ठीक से नही चलते थे! दो पंखो में से एक तो बस यूं ही चमगादड़ की तरह लटके रहा करता था! सात दिन की सात अलग अलग प्रार्थनाएं माईक पर ७वीं कक्षा की लडकीयां गाती थी! घर के पास वाले कीसी कीसी दोस्त की एसी भी स्कुल थी जहां टाई पहेनी जाती थी। आज कल जैसे रंगबेरंगी युनिफोर्म चलन में है, वैसे तो हम सोच भी नही सकते थे! हमारे पास सफेस शर्ट और ब्लु चड्डी हुआ करती थी सभी दोस्तो की ब्लु चड्डी के भी पचास शेड्स हुआ करते थे....ध फीफ्टी शेड्स ओफ ब्लु एक दोर एसा भी था...जब आस पडोस तक खबर पहुंच गई थी की मैं गोपीयो से घिरा रहेता हुं....सिर्फ मुझे ही पता था की में कितना तन्हा हुं...

 


उन दिनो मैने सोच लिया था की २५-५० पैसे हफ्ते में खर्च नही किए तो क्या किया? अपनी कीसी नोटबुक में चवन्नी, पचास पैसे के सिक्के ले जाया करता था। जो चाहे चोकलेट, स्टीकर, रीफिल वगेरह....खरिद लिया! क्या एश थी! 


एक बार एसा भी हुआ था...स्कुल छुट चुका था। दो पहर साडे बारह-एक का समय होगा। हम सब एक पुल के नीचे खडे थे, जोरो की बारिश हो रही थी। आज मैने सोच लिया के भले गीला हो जाउं लेकिन घर जल्दी पहुंच जाना है। सो मैने साईकिल आगे बढ़ा ली। गीला होते होते घर तक पहूंचा जो लगभग आघे घंटे की दूरी पर था। लेकिन यह क्या?! यहां तो बारिश की बुंद भी नही गिरी थी, रोड सारे सुखे थे और सुरज भी चमक रहा था! रस्ते में लोग मुझे चोंक कर देख रहे थे, मै पुरी तरह पानी में तर था! मेरे घर तरफ उस दिन बारिश हुई ही नही और मै असमंजस मे बार बार आकाश की और देखता रहा था!
मै पहली कक्षा में पढ़ता था। शनिवार की सुबह सुबह सब बच्चों को स्कुल के बाहर ले जा कर लाईन में खडा कर दिया गया था। मुझे हर बार की तरह कुछ समझ नहीं आ रहा था की क्या हो रहा है। एक से सात कक्षा के सभी छात्रों को स्कुल के बाहर एक कतार में चलने की सुचना दे कर प्रिन्सीपल साहब स्कुल के पीछे की तरफ जाने वाले रास्ते पर चल दिए। मैं डर के अपने किसी दोस्त को पुछ रहा था की क्या होने वाला है.... हमारी बटालियन धीरे धीरे आगे चल रही थी। हमने स्कुल के थोडे पीछे जा कर देखा तो एक विशाल मेदान था....जिसके दुसरे छोर तक नज़र भी नहीं पहूंचती थी! दरअसल बात यह थी वह ग्राउन्ड एसआरपी का था। शायद कीसी की दरखास्त पर हम बच्चों को वहां खेलने की ईजाज़त मील गई थी। हम एक से सात कक्षा के बच्चों को वहां खडा कर के थोडी सुचनाएं देने के बाद हमे खेलने को छोड दिया! यह हमारा सब से बडा उपहार था। शनिवार को स्कुल में पुरे पांच पिरियड होते थे...हम सिर्फ खेलते ही रहे....खेलते ही रहे! मेरे मन में एक और खुशी/बेताबी बढ़ रही थी। कल ईतवार जो था! सातवीं कक्षा में अचानक हम दोस्तो ने हररोज रिसेस में वही पुराने ग्राउन्ड में जाने का सोचा। लगभग एक माह तक हम रोज मस्ती, खेलकुद से दुर कुदरती वातावरण का आनंद लेते थे....उन दिनो मेरे लंचबोक्स में क्या होता था पता है?
सातवी कक्षा के बाद स्कूल का समय १२ बजे से ५.३० का होने वाला था.....सुना था की दो रिसेस मीलने वाली है, बडी रिसेस में कुछ बच्चे घर भाग जाते है! बहोत सारे फ्री पिरियड होते है और आप क्लास में सो भी सकते हो! ४-५ कक्षा में कुछ एसे भी दिन थे जब मुझे स्कूल वाकई अच्छा लगने लगा था! में सोचता था कि 'बचपन' मे मै कितना पागल था क्युं की २-३ कक्षा में मुझे स्कुल जाना अच्छा ही नहि लगता था। लेकिन अब यहां मेरे दोस्त बनने लगे थे। स्कूल १२ बजे छुट जाया करता था। अब मै पहली बेन्च पर बेठने के बावजुद सबसे आखिर में क्लास से नीकलता था। शायद ईस लिए की खाली क्लास को देखना मुझे अच्छा लगता था। कभी कभी वह घर जैसा दिखता था। कुछ एसा ही होता था मेरा क्लास रुम...बस उस वक्त एसी प्लास्टिक की कुर्सीयां नहि होती थी!
हर एक बैंच की अपनी एक कहानी होती होगी । हर एक बच्चा अपनी कोई न कोई निशानी बैंच पर छोड ही जाता है। बैंच पर अपना नाम खुरदना, या बोलपेन से मोटे मोटे अक्षरों से लिख देना। कोई बच्चा मेरी तरहा तबले की थाप दे कर ज़ोरो से गीत भी गाता होगा। क्या बैंच को यह सब पसंद होगा? फिर स्कुल में दिवाली के समय कुछ दोस्त छुपा कर एसे फोटो वाले ग्रीटींग कार्ड लाने लगे थे! अगर आपको चवन्नी में अमिताभ या माधुरी मील सकती हो तो क्या आप दिवाने नही हो जाओगे? उन दिनो मेगेझीन तो हर घर में होते नही थे, ले दे कर एक दिन समाचार पत्रों मे बोलिवुड की पुर्ति आती होगी। अखबार भी रोज़ थोडे ही मंगवाया जाता था!
 
 
 
हम तो पोस्टकार्ड साईज रंगीन फोटो देख कर दंग रह गये थे। फिर जो आपको वह चवन्नीयों वाला किस्सा सुनाया था न? उन से देढ रुपये जमा कर मैने ६ ग्रीटींग कार्ड्स खरीदे! उन ६ कार्ड्स में एक तो अमिताभ जी का था। एक नये एक्शन हीरो अजय देवगन का था। बाकी चार खुबसुरत फुलो के थे....जी नही सही में फुलो वाले कार्ड्स थे| कार्ड में सिलवटें न हो जाए इस लिए एक नोटबुक में उन्हे रख दिया था। दो चार दिन तो सब को कार्ड दिखाता रहा, लेकिन एक दीन रीसेस टाईम में किसी एक लडकी ने वह कार्ड्स ले कर सहेलींयो को दे दिए। मेरे क्लास में वापस आने पर वे सब मुझे कार्ड दिखा कर चिढ़ाने लगी। मै हरएक कार्ड उनसे छीन लाया....लेकिन सब में सिलवटें पड चूकी थे!
 
 
स्कूल मे हम बच्चों की जो बातें होती थी...क्या बताउं। यहां-वहां, ईधर-उधर, दुनिया भर की बातें! लेकिन उनमें से आधी बाते भी हमारे काम की नही होती थी। बाकी आधी जो काम की होती थी उनमें भी कोई तुक वगेरह नही हुआ करता था! लेकिन बातें करने का मज़ा ही कुछ और था। यह ओर हाल है की आज लोग मुझे कहते है तुम बहुत कम बोलते हो!
 
 
क्लास में कभी कभी नई नई चीजें भी आती रहती थी, जिनमें पेन सबसे ज्यादा चर्चामें रहता था । चोथी कक्षा तक तो हम पेन्सिल का ही उपयोग करते थे। बार बार उसे छीलने के बहाने क्लासरुम के बाहर निकलते थे! कुछ एसे बच्चे भी थे जो शार्पनर की बजाए ब्लेड का उपयोग करते थे। मुझे तो उंगली कटने का डर लगता था लेकिन मेरा शार्पनर बार-बार गुम होजाने के कारण मै भी ब्लेड का ईस्तमाल करने लगा था।
 
 
पांचवी कक्षा की पहले या दुसरे ही दिन हमारी सबसे खतरनाक शिक्षिका ने (जो ईग्लिश पढ़ाया करती थी) एलान किया की कल से आप अपना पेन ले कर के आओगे। वैसे हमे तो पता ही था की पांचवी कक्षा में, ईग्लिश विषय में, आपको पेन से ही लिखना पड़ता है। लेकिन फिर भी....मुझे लगा कि मै बहुत बड़ा हो गया हुं। पापा की तरह मै अब पेन से लिखुंगा! यह बहूत बड़ी बात थी मेरे लिए! पेन में उन दिनों आज की तरह ज्यादा वेराईटीझ नहीं हुआ करती थी। ओप्शन जो उपल्बध होते थे...एक रूपयेवाली या ज्यादा से ज्यादा दो रुपएवाली। सादी या नुकीला पोईंट। बस। ईतना ही। अगर रीफील खत्म हो जाए तो बाकाईदा नई रीफील ली जाती थी। ये नही के रीफील खतम तो नया पेन। हां एसा हो सकता था की आपको क्लास में या स्कुल के ग्राउन्ड से कीसीका गीरा हुआ पेन मिल जाए। जब आप नए पेन से या उस मिले हुए पेन से लिखना शुरू करो....तुरंत बाजुवाल मित्र आपको पुछता भी था (सभी एक दुसरे के पेन के बारे में जानते ही थे।) की..."नया पेन लाया? दिखा दिखा!" मतलब के कोन से मित्र के पास कोन सा पेन है यह सभी को पता होता था। पेन की सबकी अपनी अपनी मनपसंद ब्रान्ड हुआ करती थी। स्टीक मतलब पुष्पा, रेनोल्ड मतलब तेजल। कभी कभी पापा की ओफिस में पेन दिए जाते तो वह पेन मुझे देते। लेकिन वह पेन मुझे पसंद ही नही था...बिना ढक्कन वाला मोटा सा पेन। मैने पापा के पुराने पेन को काट कर एक एसा पेन बनाया था जीससे लिखा भी जा सकता था और, पीछे फुंक मारने से सीटी बजती थी! मैने अपने एक पुराने खिलौने की सीटी उसमें डाल दी थी! आठवी कक्षा में एक वैशाली नाम की लड़की एक पैन लाई थी, उससे लिखने कागज़ से खुश्बु आती थी! उस पेन का आकार गोल सिलिन्डर नही लेकिन चोकोर सिलिन्डर था। सफेद, लाल, हरा, गुलाबी, सायन जैसे मनमोही देशी-विदेशी रंगो में यह पेन उपलब्ध था। किंमत थोडी सी ज्यादा थी - पांच रुपये। छठी कक्षा मैं तो एसे पेश आते थे मानो हम बारहवीं कक्षा में आ गए हो, या उतने ही मेच्योर हो गए हो। झगड़े भी बढ़ गए थे। मुझे जो लगता था कि पुरा क्लास मेरे साथ है, वह अब गलत साबित हो रहा था। खेल-कुद, हाजरजवाबी, कपडेलत्ते, ग्रूप और शेखी मारने वाली बातों में मै पीछे रह गया था। मेरा अब तक जो पढ़ाई में अव्व्ल रहने का रेकोर्ड था वह तुट चुका था। पिछले साल मेरा पांचवा नंबर आया था। ईस साल मेरा लड़कीयों वाला ग्रूप भी तुट चुका था। सो मै पुरा ध्यान पढाई में लगा रहा था। अपने बचपन और पुराने दिन एसे याद करता था जैसे में अब कर रहा हुं! ईस बात से अंजान की ईस साल की तीनों परीक्षा में मेरा अव्व्ल नंबर आनेवाला था और मुझे सर्टिफीकेट भी मिलनेवाला था! ईसका मतलब यह नहीं की मैं बहुत ही ज्यादा होशियारचंद हुं। बल्कि मेरे कोम्पेटीटर को अब पहला नंबर लाने की कोई पड़ी न थी। वे सब अपनी धुन में मस्त थे!
मुझे हाल ही में मिले उस स्कुलमेट का जिसने मुझे यह 'प्लास्टिक बैग्स' की याद दिलवाई। यह बैग्स बुक्स निकालते वख्त आवाज़ बहुत करते थे। हम हंमेशा सर-मैडम को आवाज कर कर के चिढाते थे! कीतनी बार यह प्लास्टिक बैग्स ने धोका दिया है । फट के पुरी किताबें बिखेर दी है। अधिक वजन रखने से ईनके हैन्डल भी तुट जाते थे। लेकिन बरसात में यही सबसे ज्यादा भरोसेमंद रहे थे। बारिश के दिनों में स्कुल बैग्स में प्लास्टिक बैग रख कर उनमें किताबें रखी जाती थी। ८ वीं कक्षा से स्कूल बैग का खर्चा बच गया। उन दिनों कोलेस स्टुडन्ट सिर्फ एक नोट ले कर कोलेज में जाते थे। आप ९० के दशक की कोई फिल्म देख लो....अक्षय या आमिर की! सिर्फ एक नोट में सारे विषयों का समावेश हो जाता था! हालां की कुछ स्टुडन्ट्स प्लास्टिक बैग युझ करते थे। यही ट्रेन्ड था उस समय का। हम भी ८ वीं कक्षा से तरह तरह के प्लास्टिक बैग्स ले कर स्कूल जाने लगे। यह बेग एक-देढ महिने साथ निभाता था। स्कुल के ईस आठवीं क्लास के ख़तम हुए दायके ग़ुजर गए है! ईस दौरान दो-तीन दोस्त कभी-कभार मिल गए। बातें हुई। एक बात वे खास बोले...पुरानी बातें है, ईनमें अब क्या रखा है? तब हम छोटे थे और नासमज थे...वगैरह। सही है....अतीत को साथ ले कर कौन पागल जीता है भाई? लेकिन मेरे दिमाग में जैसे की कहा था की कुछ केमिलल रीकेशन का लोचा है! कुछ ना होते हुए भी वह दीन एसे महसुस होते है जैसे शाम को किसी सड़क पर पीछे छोड़ा हुआ कोई एसा चौराहा जहां थोड़ी सी रोशनी थी। सब कुछ भुल कर कुछ साल जिंदगी के जद्दोजहद में बीततें है। फिर कोई तराना, कोई खुश्बु, कोई त्यौहार या बरसात, फिर से पुरा स्कूल सामने ला कर रख देती है! यह पागलपन नहीं तो ओर क्या है?
उन दिनो विडीओ गेम आदि तो होते नही थे, ट्युशन का भी नामोनिशान नहीं था। स्कुल में जो पढ़ा वही साल भर बाद परीक्षा में लिखना पड़ता था। ईसलिए हमारे पास तो फालतु समय खुब हुआ करता था। आप खेल कुद् करके थक जाओ फिर भी दिन खत्म नही होता था! फिर रात को टीवी चालु कर के बैठ जाते थे। पांच-दस मिनट के बाद कोई प्रोग्राम दिखाई देता था, वरना युं ही झरमर झरमर बारीश सा स्क्रीन सब देखा करते थे। आस पास से महेमान भी वक्त गुज़ारने आ जाते थे, वरना हम कहीं चले जाते थे। समय बहुत था, जो धीरे धीरे गुज़रता था, अच्छा गुज़रता था!
यह मेरी अपनी सचीमुची की यादें है! यह मेरा सच है! आपको कैसा लगा यह पढ कर जरुर बताईगा और अपनी कोई पुरानी यादें हो तो जरुर साझा किजीएगा!


आगे पढें 90s का दशक

बर्फ का गोला


बर्फ का गोला.... चुस्की का प्रारंभिक स्वरुप, सबने जीवन में खाया ही होगा। बस, उसी की कुछ यादें लिख रहा हुं, कैसे पहली बार बर्फ का गोला खाने को मिला और फिर दोबारा उसके लिए क्या क्या पापड बेलने पडे!
मुझे बर्फ तो क्या, ठंडे पानी पीने की भी मनाही थी। वैसे तो घर में फ्रिज था ही नहीं, सिर्फ एक ही दोस्त के घर पर फ्रिज था। लेकिन मुझे टोंसिल्स हो जाते थे, अगर मैं आईस्क्रीम खाउं या ठंडा पानी पी लुं। मम्मी की डांट फिटकार से तो अच्छा था कि मैं एसी कोई चीज़ें खाउं ही ना।

एक बार मैं अपने दोस्त के घर खेलने के लिए गया था। वहां शाम के साड़े पांच बजे एक बर्फवाला निकला। मेरा दोस्त उसकी मम्मी से जिद्द करने लगा। मुझे अभी बर्फ के गोले के बारे में पता ही नहीं था। देखा था लेकिन कभी खाने को भी मिलेगा, कल्पना करना मुश्किल था!

दोस्त की मम्मी ने चवन्नी दी। हम दोनों एक एक प्लेट ले कर वहां गए और दोस्तने बिना पुछे ही ओरेन्ज रंग डलवा दिया। उन दिनों बर्फ के घिस-पिस कर हाथों से ही दबा कर गोल लड्डु सा बना दिया जाता था। फिर उस पर कोई एक रंग डाल कर दिया जाता था। दाएँ-बाएँ दो अलग अलग रंगो का चलन थोडी देर से शुरु हुआ।
फिर वापस घर आ कर हम बर्क के गोले की चुस्कीयां लेने लगे। तब क्या बताउं के कितना मज़ा आ गया!

फिर आधा गोला खत्म करने पर मेरे दोस्त ने कहा अब ईस पर थोड़ा नमक डाल कर खातें है, मज़ा आएगा। अब तक तो गोले का मज़ा आ ही रहा था, नमक छीडकने के बाद स्वाद बढ गया! फिर मेरे दोस्त ने बताया की अलग अलग रंगो का स्वाद अलग अलग होता है, अब अगली बार काला खट्टा रंग खाएंगे। मैं भी हां में हां मिलाता रह गया। उस दिन हम क्या खेले क्या नहीं, लेकिन क्रुतज्ञावश में उस दिन उसकी सारी बातें मानता रहा!

तो एसा था मेरा पहला अनुभव बर्फ के गोले खाने का।
 
थोड़ा बडा हो जाने के बाद तो मैं घर से बाकायदा पैसे ले कर गोला खाने के लिए जाता। लेकिन एसा बहुत कम बार होता, क्युं की बर्फ खाने की घर से मंजुरी नहीं मिलती थी। हर बार 'ना' सुनना पडता था। फिर मुझे एक और मित्र मिला। 
 
उसके पास पता नहीं कैसे, हंमेशा पैसे होते थे। वह शायद मम्मी-पापा और बड़े भाई से अलग अलग पैसे लेता होगा। लेकिन जो भी हो, वह दिलदार दोस्त कम से कम... तीन-चार लोगों को बर्फ जरुर खिलाता था! यानि एक अठन्नी तो वह खर्च कर ही देता था। कभी कभी जब तीन-चार की जगह हम दो लोग ही मौजुद होते तो हम दो बार भी बर्फ खा लेते! मुझे बोनस का मतलब बचपन से ही पता था!
 
जब हम बर्फ खरीदते तो उसे छुप कर खाते. ताकि अधिक बच्चें हमें देख न लें और सबको या घरवालों को पता ना लगे। झाडीयों के पीछे बैठ कर हम आराम से बर्फ खाते और होठों के बदले हुए रंग को वापस सामान्य होने पोंछते रहते!

ईस तरह बर्फ के गोले का जादू बहुत लंबा चला।
 
हां, बर्फवाला गर्मीयों की सीझन में आता था। मतलब जब हम बर्फ खा रहे थे उन दिनों वेकेशन होता था या उसकी तैयारी होती थी। ईसलिए वेकेशन का मज़ा और बर्फ़ का गोला .... ईन दोनों की मिश्रीत यादें बहुत ही बढिया बनी!
 
वैसे, आठवीं कक्षा में जब स्कूल के पास एक बर्फवाला लड़का अपना ठेला ले कर आता... उस पर मुज़े गुस्सा आता था। हमारी स्क़ुल का रिसेस समय दोपहर तीन या साड़े तीन बज़े हुआ करता था। वह गोलेवाला लड़का बिलकुल टाईम पर आ के अपना ठेला लगा देता था। उसकी उम्र भी अधिक तो नहीं थी, शायद दो-तीन साल बड़ा होगा।  
 

 
उस समय वह एक टोपी खास पहनता, वैसी ही जैसी आमिरखान ने फिल्म दिल है की मानता नहीं में पहनी थी। पता नहीं, एसी कैप उसे कहां से मिल गई थी। गोराचीट्टा और भुरी आंखो के कारण वह कैप उस पर जंचती भी थी।
 
वहां हमारे और बाकी क्लास की लड़कीयां भीड़ जमा देती थी। वह बर्फवाला खुद को हीरो समजने लगा था। हमारे क्लास की एक लड़की को बिना पैसे भी गोला दे देता था। हमारे लिए बात बहुत संदेहास्पद थी। हम जब बर्फ लेने जाते तो हमे वह देर से ही बर्फ देता, पहले वह सारी लड़कीयों को ही बर्फ खिलाता। बहुत गुस्सा आता था उस पर... लेकिन खैर!
 

Sunday, 22 May 2022

चटर-पटर


हमारा स्कूल का समय सुबह का हुआ करता था 9:30 या 10:00 बजे हमारा ब्रेक टाइम हुआ करता था। इस रिसेस के टाइम पर  हम लोग दोस्तों के साथ स्कूल के बाजू में रवि भैया की दुकान पर जमावड़ा कर देते थे। वहां से तरह-तरह की चीजें लेकर खाना या सिर्फ देखने जाना, यह हमारा रोज का कार्यक्रम हुआ करता था।

एक बच्चे के तौर पर यह स्कूल के पास की दुकान से ज्यादा आश्चर्यजनक सुपर मॉल और कोई नहीं है! उस समय में कुछ ठेले वाले और एक दो मौसी भी आती थी! चीनी बेर, बर्फ का गोला और दूसरी तरह तरह की चीजें मिलती थी।

लेकिन मैं अपनी चवन्नी रविभाई की दुकान पर ही खत्म कर देता था। क्योंकि मम्मी ने बाहर खाने का मना किया था!

वह जो ब्रेक होता था, वह मेरे लिए सबसे ज्यादा खूबसूरत समय हुआ करता था। वक्त - उससे ज्यादा फ्रेश मुझे कभी नहीं लगा। हां कभी-कभी होमवर्क का टेंशन रहता था या स्कूल में कभी डांट पड़ी होने की वजह से मूड खराब रहता था। फिर भी ब्रेक में मैं थोड़ी देर के लिए सब कुछ भूल जाता था।

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तीसरी साइकिल



दसवीं क्लास में आने के बाद 3 महीने गुजर गए। फिर मेरे पापा ने हीरो रेंजर साइकिल खरीद कर दी। जिसको हम लोग सीधे हैंडल वाली साइकिल कह के बुलाते थे। यह साइकिल मैंने कम से कम से 8 से 10 साल तक चलाई होगी। हम लोग क्वार्टर में रहते थे और हमारा घर दूसरे माले पर था। हमारे यहां सब लोग चोरी के डर से अपनी अपनी साइकिल उठाकर ऊपर बरामदे में रखते थे! मेरा भी यही रूटीन रहा।

मैं अपनी साइकिल बहुत संभाल के रखता था। उसको घर पर ही रिपेयर और सर्विस करता था। और कई बार इसको बाहर भी देनी पड़ती। बहुत पुरानी हो जाने के बाद मैंने उसको एक दो बार कलर भी किया था।

इस साइकिल के पेडल प्लास्टिक के होने की वजह से बहुत जल्दी खराब हो जाते थे। तीन चार महीनों में एक नया पैडल का सेट डलवाना पड़ता था। फिर मैंने बोर होकर उसमें अपनी देसी साइकिल के पैडल डलवा दिए थे!

दोस्त लोग कहते थे कि अगर हाइट बढ़ानी हो तो साइकिल की सीट ऊंची करवा लेनी चाहिए। तो मैंने ऐसा भी करके देखा, लेकिन मेरी हाइट ज्यादा नहीं बढ़ी। क्योंकि मैं पहले से ही अपने क्लास में सबसे लंबा था!

मेरे पास जब दूसरे नंबर की सिंपल साइकिल थी, तब हमारा एक सरदार दोस्त हीरो रेंजर साइकिल लेकर आया था ऐसी हीरो रेंजर साइकिल मैं जब ब्रेक लगाते हैं तो "पों..." की आवाज आती थी। हम उसको बाहर बार साइकिल पास चला कर ब्रेक मारने को कहते थे। और उसकी आवाज सुनकर बहुत आश्चर्य होता था। लेकिन मेरे पास थी जबर हीरो रेंजर साइकिल आई, तब ऐसी आवाज मेरी साइकिल से नहीं आती थी।

उस साइकिल में मैंने थोड़े मॉडिफिकेशन भी करवाए थे। जैसे कि हैंडल भी यू शेप का डलवा कर देखा। आगे बास्केट भी डलवाई थी। सारी 'कार्टूनगिरी' मैंने इस साइकिल पर आजमा डाली! फिर सालों तक यह साइकिल वैसे ही पड़ी रही। और फिर मेरे पापा बोल कर उसे सस्ते में बेच डाला।

चौथी साईकिल

Saturday, 7 May 2022

बचपन की यादें



नमस्ते, आपका स्वागत है!
यहां मै कुछ अपने बारे में बताना चाहूंगा। बचपन से मेरी दुनिया बहोत सीमटी हुई है। हमारे वक्त में ईलेक्ट्रोनिग गेज़ेट्स, विडीओ गेम्स आदी बहोत कम हुआ करते थे....बिलकुल ना के बराबर। फिर जो बच्चे मेरे जैसे थे, जिनके ज्यादा दोस्त न हो या कम हो, वे अपना समय व्यतीत करने के लिए दूरदर्शन, कहानीयां, चित्रकारी आदी के 'व्यसनी' हुआ करते थे!
ईस तरह का 'टाईमपास' (टीवी को छोड के) बाकी बच्चो के लिए बहोत क्रिएटीव माना जाता है। कहेते है कि ईससे बच्चो की चीज़ो को समझने की शक्ति बढ़ती है। जो आगे बहोत काम लगती है!
हाला की अभी पीछले महिने अमेरीका से यह रिपोर्ट आई थी की मीकी माउस जैसे केरेक्टर्स, जिसमें प्राणी को ईन्सानो की तरह कपड़े पहने हुए और बाते करते हुए दीखाया जाता है....उससे बच्चो में मुर्खता बढ़ती है! यह मैने अब जाना.....जब मेरा पूरा बचपन चंपक जैसे मेगेझीन पढ़ते हुए बीता! अब मैं सोच रहा हुं की अगर मैने यह सब नहिं पढ़ा होता तो आज कोई बड़ा ईन्सान होता? कुछ यह भी मेरी आदत रही है...वक्त बेवक्त खो जाता हुं! खिडकी/बरामदे से बाहर झांकते रहेना, भींतो की पपडीयों में चहेरे देखना, छत या पंखे को ताड़ कर सोचते रहेना वगेरह मेरी बचपन की बिमारींया है! किताबों मे खोये रहेना, डायरीयों मे डुबे रहेना मेरा शौख रहा है। फिर भी....फिर भी कुछ खास याद नहीं है जो मैने कभी पढ़ा था। बस बच्चोंवाली कहानियां, मेगेझीन्स, कोमिक्स वगेरह। लेकिन वह कहानियां, मेगेझीन्स, कोमिक्स वगेरह उस खिडकी या बरामदे से कम नहीं थीं। मुझे वही जिंदगी, वही कुदरत, वही मौसम दिखते थे! समय कभी साथ नही देता....वह बह जाता है जब उसे थम जाना चाहीए था.....वह रुक जाता है जब उसे जल्दी गुज़र जाना चाहीए था! मेरा बचपन, मेरे प्यारे दिन वह कहां ले गया होगा? क्या वह भी मेरी उन किताबों की तरहा पीले पड गए होंगे? क्या उनसे भी वह पुराने सामान जैसी गंध आ रही होगी? या वह अभी भी रुक कर मेरी राह देख रहे होगें? बिलकुल वैसे ही जैसे पहेले थे! भीगे भीगे से...

आज बहोत कुछ बदल गया है! श्री कृष्ण ने यह क्युं कह दिया...परिवर्तन संसार का नियम है? अगर वे यह नही कहेते तो कितना अच्छा होता! यह जगनिर्माण का हेतु अभी तक मुझे समझ नहीं आ रहा है! यह जग आगे विध्वंश की ओर बढ़ता ही जा रहा है, वह भी बडे गर्व या कभी लगता है बडा अंजान बन कर! फिर भी अंदर कहीं एक आस तो होती है, शायद वह दिन वापस आयेंगे....जैसे नदी के नीर उल्टे बहते है! मुझे फिर से उस जगह, उस काल में संजो दिया जायेगा...वही पुराने लोगों के बीच जो अब बुढे से दिखते है! मै फिर से जीना चाहूंगा बिलकुल यही जिंदगी....दोबारा....ईसी तरह!

स्कूल की यादें

तीसरी कक्षा से स्कुल का मुख्य दरवाजा सामने ही पडता था! हमारी मेडम स्कुल की घंटी बजने की राह देखने को कहती थी, और हम बैग तैयार कर के बैठ जाते थे! मेरी बेन्च दरवाजे से सटी होने के कारण मै ईसी प्रकार भाग कर स्कुल से सबसे पहेले निकल पडता था! बाहर मेरे पापा को साईकल ले कर मेरी राह देखते हुए देख कर कितनी खुशी मिलती थी! मेरा घर मेईन रोड पर था...जहां दुर एक सरकारी स्कुल थी। शाम पांच बजे जब सब बच्चे छुट कर जाते तो कई लोग उन्हे बरामदे में खडे हो कर (चाय पीते पीते) उन्हे देखा करते। वे बच्चे भी खुब थे...जैसे कोई परेड चल रही हो, वे सब अपनी अपनी मस्ती मैं दोडते, भागते, चिल्लाते, बतियाते हुए चलते चलते घर जाते थे!

और हम सोचते रहेते की हम कितने अमीर है! हमारे पास तो अब साईकिल भी है! जब आठवीं तक आएंगे तब हम भी साईकल ले कर स्कुल जाया करेंगे.... क्या ख्वाब था! कितनी राह देखी गई थी! कुछ एसे बच्चे भी हुआ करते थे जिनका मक्सद सिर्फ और सिर्फ धमाल मचाना था। प्रायः मे जिन्हे बहादुर समझता रहा उनको रोते हुए देख कर अचंबित रह गया! हमारी स्कुल में फ्री पिरियड ज्यादा होते थे! या कभी मेडम को कुछ काम रहेता था....तो वह अपना काम करती थी। कुछ उनकी मुंहफट चमचीयां भी हुआ करती थी जो उनको कहती थी की दुसरे सर का होमवर्क बाकी है तो क्या वह हम कर सकते है? और एसे हमे फ्री पिरियड मिल जाते थे! मेरा होमवर्क ज्यादातर कंप्लीट होता था....और में एसे फ्री टाईम में यह करते हुए पाया जाता था!
मेरे हिसाब से हमे खुब सारा होमवर्क दिया जाता था जो कम से कम एक-देढ घंटा चला करता था। यह तो बच्चो के साथ सरासर अन्याय था! फिर जब शाम पांच बजे 'राजकुमार जी' खेलने को निकलते.... कंप्युटर तो बहोत दुर की बात है! हमारे स्कुल मे पंखे भी ठीक से नही चलते थे! दो पंखो में से एक तो बस यूं ही चमगादड़ की तरह लटके रहा करता था! सात दिन की सात अलग अलग प्रार्थनाएं माईक पर ७वीं कक्षा की लडकीयां गाती थी! घर के पास वाले कीसी कीसी दोस्त की एसी भी स्कुल थी जहां टाई पहेनी जाती थी। आज कल जैसे रंगबेरंगी युनिफोर्म चलन में है, वैसे तो हम सोच भी नही सकते थे! हमारे पास सफेस शर्ट और ब्लु चड्डी हुआ करती थी सभी दोस्तो की ब्लु चड्डी के भी पचास शेड्स हुआ करते थे....ध फीफ्टी शेड्स ओफ ब्लु एक दोर एसा भी था...जब आस पडोस तक खबर पहुंच गई थी की मैं गोपीयो से घिरा रहेता हुं....सिर्फ मुझे ही पता था की में कितना तन्हा हुं...
उन दिनो मैने सोच लिया था की २५-५० पैसे हफ्ते में खर्च नही किए तो क्या किया? अपनी कीसी नोटबुक में चवन्नी, पचास पैसे के सिक्के ले जाया करता था। जो चाहे चोकलेट, स्टीकर, रीफिल वगेरह....खरिद लिया! क्या एश थी!
एक बार एसा भी हुआ था...स्कुल छुट चुका था। दो पहर साडे बारह-एक का समय होगा। हम सब एक पुल के नीचे खडे थे, जोरो की बारिश हो रही थी। आज मैने सोच लिया के भले गीला हो जाउं लेकिन घर जल्दी पहुंच जाना है। सो मैने साईकिल आगे बढ़ा ली। गीला होते होते घर तक पहूंचा जो लगभग आघे घंटे की दूरी पर था। लेकिन यह क्या?! यहां तो बारिश की बुंद भी नही गिरी थी, रोड सारे सुखे थे और सुरज भी चमक रहा था! रस्ते में लोग मुझे चोंक कर देख रहे थे, मै पुरी तरह पानी में तर था! मेरे घर तरफ उस दिन बारिश हुई ही नही और मै असमंजस मे बार बार आकाश की और देखता रहा था!
मै पहली कक्षा में पढ़ता था। शनिवार की सुबह सुबह सब बच्चों को स्कुल के बाहर ले जा कर लाईन में खडा कर दिया गया था। मुझे हर बार की तरह कुछ समझ नहीं आ रहा था की क्या हो रहा है। एक से सात कक्षा के सभी छात्रों को स्कुल के बाहर एक कतार में चलने की सुचना दे कर प्रिन्सीपल साहब स्कुल के पीछे की तरफ जाने वाले रास्ते पर चल दिए। मैं डर के अपने किसी दोस्त को पुछ रहा था की क्या होने वाला है.... हमारी बटालियन धीरे धीरे आगे चल रही थी। हमने स्कुल के थोडे पीछे जा कर देखा तो एक विशाल मेदान था....जिसके दुसरे छोर तक नज़र भी नहीं पहूंचती थी! दरअसल बात यह थी वह ग्राउन्ड एसआरपी का था। शायद कीसी की दरखास्त पर हम बच्चों को वहां खेलने की ईजाज़त मील गई थी। हम एक से सात कक्षा के बच्चों को वहां खडा कर के थोडी सुचनाएं देने के बाद हमे खेलने को छोड दिया! यह हमारा सब से बडा उपहार था। शनिवार को स्कुल में पुरे पांच पिरियड होते थे...हम सिर्फ खेलते ही रहे....खेलते ही रहे! मेरे मन में एक और खुशी/बेताबी बढ़ रही थी। कल ईतवार जो था! सातवीं कक्षा में अचानक हम दोस्तो ने हररोज रिसेस में वही पुराने ग्राउन्ड में जाने का सोचा। लगभग एक माह तक हम रोज मस्ती, खेलकुद से दुर कुदरती वातावरण का आनंद लेते थे....उन दिनो मेरे लंचबोक्स में क्या होता था पता है?
सातवी कक्षा के बाद स्कूल का समय १२ बजे से ५.३० का होने वाला था.....सुना था की दो रिसेस मीलने वाली है, बडी रिसेस में कुछ बच्चे घर भाग जाते है! बहोत सारे फ्री पिरियड होते है और आप क्लास में सो भी सकते हो! ४-५ कक्षा में कुछ एसे भी दिन थे जब मुझे स्कूल वाकई अच्छा लगने लगा था! में सोचता था कि 'बचपन' मे मै कितना पागल था क्युं की २-३ कक्षा में मुझे स्कुल जाना अच्छा ही नहि लगता था। लेकिन अब यहां मेरे दोस्त बनने लगे थे। स्कूल १२ बजे छुट जाया करता था। अब मै पहली बेन्च पर बेठने के बावजुद सबसे आखिर में क्लास से नीकलता था। शायद ईस लिए की खाली क्लास को देखना मुझे अच्छा लगता था। कभी कभी वह घर जैसा दिखता था। कुछ एसा ही होता था मेरा क्लास रुम...बस उस वक्त एसी प्लास्टिक की कुर्सीयां नहि होती थी!
हर एक बैंच की अपनी एक कहानी होती होगी । हर एक बच्चा अपनी कोई न कोई निशानी बैंच पर छोड ही जाता है। बैंच पर अपना नाम खुरदना, या बोलपेन से मोटे मोटे अक्षरों से लिख देना। कोई बच्चा मेरी तरहा तबले की थाप दे कर ज़ोरो से गीत भी गाता होगा। क्या बैंच को यह सब पसंद होगा? फिर स्कुल में दिवाली के समय कुछ दोस्त छुपा कर एसे फोटो वाले ग्रीटींग कार्ड लाने लगे थे! अगर आपको चवन्नी में अमिताभ या माधुरी मील सकती हो तो क्या आप दिवाने नही हो जाओगे? उन दिनो मेगेझीन तो हर घर में होते नही थे, ले दे कर एक दिन समाचार पत्रों मे बोलिवुड की पुर्ति आती होगी। अखबार भी रोज़ थोडे ही मंगवाया जाता था!
हम तो पोस्टकार्ड साईज रंगीन फोटो देख कर दंग रह गये थे। फिर जो आपको वह चवन्नीयों वाला किस्सा सुनाया था न? उन से देढ रुपये जमा कर मैने ६ ग्रीटींग कार्ड्स खरीदे! उन ६ कार्ड्स में एक तो अमिताभ जी का था। एक नये एक्शन हीरो अजय देवगन का था। बाकी चार खुबसुरत फुलो के थे....जी नही सही में फुलो वाले कार्ड्स थे| कार्ड में सिलवटें न हो जाए इस लिए एक नोटबुक में उन्हे रख दिया था। दो चार दिन तो सब को कार्ड दिखाता रहा, लेकिन एक दीन रीसेस टाईम में किसी एक लडकी ने वह कार्ड्स ले कर सहेलींयो को दे दिए। मेरे क्लास में वापस आने पर वे सब मुझे कार्ड दिखा कर चिढ़ाने लगी। मै हरएक कार्ड उनसे छीन लाया....लेकिन सब में सिलवटें पड चूकी थे! स्कूल मे हम बच्चों की जो बातें होती थी...क्या बताउं। यहां-वहां, ईधर-उधर, दुनिया भर की बातें! लेकिन उनमें से आधी बाते भी हमारे काम की नही होती थी। बाकी आधी जो काम की होती थी उनमें भी कोई तुक वगेरह नही हुआ करता था! लेकिन बातें करने का मज़ा ही कुछ और था। यह ओर हाल है की आज लोग मुझे कहते है तुम बहुत कम बोलते हो! क्लास में कभी कभी नई नई चीजें भी आती रहती थी, जिनमें पेन सबसे ज्यादा चर्चामें रहता था । चोथी कक्षा तक तो हम पेन्सिल का ही उपयोग करते थे। बार बार उसे छीलने के बहाने क्लासरुम के बाहर निकलते थे! कुछ एसे बच्चे भी थे जो शार्पनर की बजाए ब्लेड का उपयोग करते थे। मुझे तो उंगली कटने का डर लगता था लेकिन मेरा शार्पनर बार-बार गुम होजाने के कारण मै भी ब्लेड का ईस्तमाल करने लगा था। पांचवी कक्षा की पहले या दुसरे ही दिन हमारी सबसे खतरनाक शिक्षिका ने (जो ईग्लिश पढ़ाया करती थी) एलान किया की कल से आप अपना पेन ले कर के आओगे। वैसे हमे तो पता ही था की पांचवी कक्षा में, ईग्लिश विषय में, आपको पेन से ही लिखना पड़ता है। लेकिन फिर भी....मुझे लगा कि मै बहुत बड़ा हो गया हुं। पापा की तरह मै अब पेन से लिखुंगा! यह बहूत बड़ी बात थी मेरे लिए! पेन में उन दिनों आज की तरह ज्यादा वेराईटीझ नहीं हुआ करती थी। ओप्शन जो उपल्बध होते थे...एक रूपयेवाली या ज्यादा से ज्यादा दो रुपएवाली। सादी या नुकीला पोईंट। बस। ईतना ही। अगर रीफील खत्म हो जाए तो बाकाईदा नई रीफील ली जाती थी। ये नही के रीफील खतम तो नया पेन। हां एसा हो सकता था की आपको क्लास में या स्कुल के ग्राउन्ड से कीसीका गीरा हुआ पेन मिल जाए। जब आप नए पेन से या उस मिले हुए पेन से लिखना शुरू करो....तुरंत बाजुवाल मित्र आपको पुछता भी था (सभी एक दुसरे के पेन के बारे में जानते ही थे।) की..."नया पेन लाया? दिखा दिखा!" मतलब के कोन से मित्र के पास कोन सा पेन है यह सभी को पता होता था। पेन की सबकी अपनी अपनी मनपसंद ब्रान्ड हुआ करती थी। स्टीक मतलब पुष्पा, रेनोल्ड मतलब तेजल। कभी कभी पापा की ओफिस में पेन दिए जाते तो वह पेन मुझे देते। लेकिन वह पेन मुझे पसंद ही नही था...बिना ढक्कन वाला मोटा सा पेन। मैने पापा के पुराने पेन को काट कर एक एसा पेन बनाया था जीससे लिखा भी जा सकता था और, पीछे फुंक मारने से सीटी बजती थी! मैने अपने एक पुराने खिलौने की सीटी उसमें डाल दी थी! आठवी कक्षा में एक वैशाली नाम की लड़की एक पैन लाई थी, उससे लिखने कागज़ से खुश्बु आती थी! उस पेन का आकार गोल सिलिन्डर नही लेकिन चोकोर सिलिन्डर था। सफेद, लाल, हरा, गुलाबी, सायन जैसे मनमोही देशी-विदेशी रंगो में यह पेन उपलब्ध था। किंमत थोडी सी ज्यादा थी - पांच रुपये। छठी कक्षा मैं तो एसे पेश आते थे मानो हम बारहवीं कक्षा में आ गए हो, या उतने ही मेच्योर हो गए हो। झगड़े भी बढ़ गए थे। मुझे जो लगता था कि पुरा क्लास मेरे साथ है, वह अब गलत साबित हो रहा था। खेल-कुद, हाजरजवाबी, कपडेलत्ते, ग्रूप और शेखी मारने वाली बातों में मै पीछे रह गया था। मेरा अब तक जो पढ़ाई में अव्व्ल रहने का रेकोर्ड था वह तुट चुका था। पिछले साल मेरा पांचवा नंबर आया था। ईस साल मेरा लड़कीयों वाला ग्रूप भी तुट चुका था। सो मै पुरा ध्यान पढाई में लगा रहा था। अपने बचपन और पुराने दिन एसे याद करता था जैसे में अब कर रहा हुं! ईस बात से अंजान की ईस साल की तीनों परीक्षा में मेरा अव्व्ल नंबर आनेवाला था और मुझे सर्टिफीकेट भी मिलनेवाला था! ईसका मतलब यह नहीं की मैं बहुत ही ज्यादा होशियारचंद हुं। बल्कि मेरे कोम्पेटीटर को अब पहला नंबर लाने की कोई पड़ी न थी। वे सब अपनी धुन में मस्त थे!
मुझे हाल ही में मिले उस स्कुलमेट का जिसने मुझे यह 'प्लास्टिक बैग्स' की याद दिलवाई। यह बैग्स बुक्स निकालते वख्त आवाज़ बहुत करते थे। हम हंमेशा सर-मैडम को आवाज कर कर के चिढाते थे! कीतनी बार यह प्लास्टिक बैग्स ने धोका दिया है । फट के पुरी किताबें बिखेर दी है। अधिक वजन रखने से ईनके हैन्डल भी तुट जाते थे। लेकिन बरसात में यही सबसे ज्यादा भरोसेमंद रहे थे। बारिश के दिनों में स्कुल बैग्स में प्लास्टिक बैग रख कर उनमें किताबें रखी जाती थी। ८ वीं कक्षा से स्कूल बैग का खर्चा बच गया। उन दिनों कोलेस स्टुडन्ट सिर्फ एक नोट ले कर कोलेज में जाते थे। आप ९० के दशक की कोई फिल्म देख लो....अक्षय या आमिर की! सिर्फ एक नोट में सारे विषयों का समावेश हो जाता था! हालां की कुछ स्टुडन्ट्स प्लास्टिक बैग युझ करते थे। यही ट्रेन्ड था उस समय का। हम भी ८ वीं कक्षा से तरह तरह के प्लास्टिक बैग्स ले कर स्कूल जाने लगे। यह बेग एक-देढ महिने साथ निभाता था। स्कुल के ईस आठवीं क्लास के ख़तम हुए दायके ग़ुजर गए है! ईस दौरान दो-तीन दोस्त कभी-कभार मिल गए। बातें हुई। एक बात वे खास बोले...पुरानी बातें है, ईनमें अब क्या रखा है? तब हम छोटे थे और नासमज थे...वगैरह। सही है....अतीत को साथ ले कर कौन पागल जीता है भाई? लेकिन मेरे दिमाग में जैसे की कहा था की कुछ केमिलल रीकेशन का लोचा है! कुछ ना होते हुए भी वह दीन एसे महसुस होते है जैसे शाम को किसी सड़क पर पीछे छोड़ा हुआ कोई एसा चौराहा जहां थोड़ी सी रोशनी थी। सब कुछ भुल कर कुछ साल जिंदगी के जद्दोजहद में बीततें है। फिर कोई तराना, कोई खुश्बु, कोई त्यौहार या बरसात, फिर से पुरा स्कूल सामने ला कर रख देती है! यह पागलपन नहीं तो ओर क्या है?
उन दिनो विडीओ गेम आदि तो होते नही थे, ट्युशन का भी नामोनिशान नहीं था। स्कुल में जो पढ़ा वही साल भर बाद परीक्षा में लिखना पड़ता था। ईसलिए हमारे पास तो फालतु समय खुब हुआ करता था। आप खेल कुद् करके थक जाओ फिर भी दिन खत्म नही होता था! फिर रात को टीवी चालु कर के बैठ जाते थे। पांच-दस मिनट के बाद कोई प्रोग्राम दिखाई देता था, वरना युं ही झरमर झरमर बारीश सा स्क्रीन सब देखा करते थे। आस पास से महेमान भी वक्त गुज़ारने आ जाते थे, वरना हम कहीं चले जाते थे। समय बहुत था, जो धीरे धीरे गुज़रता था, अच्छा गुज़रता था!
यह मेरी अपनी सचीमुची की यादें है! यह मेरा सच है! आपको कैसा लगा यह पढ कर जरुर बताईगा और अपनी कोई पुरानी यादें हो तो जरुर साझा किजीएगा!

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