Wednesday, 3 August 2022
घातक - Moive
Monday, 25 July 2022
'हम' - Movie
Thursday, 14 July 2022
वर्षात्सव
(मै बरसात में कागज़ की नाव की बात करने नहीं करुंगा! मै कोई Essay on Monsoon लिखने नहीं आया हुं, सिर्फ अपनी मिलीझुली बातें ही बता रहा हुं।)
Wednesday, 13 July 2022
गूंज - Movie

नरसिम्हा - Movie
Sunny Deol और Om Puri का रोल ईस फिल्म में बहुत अच्छा था जिसमें Dimple kapadia ने बहुत अच्छा साथ दिया था। कुल मिला कर फिल्म देखनेलायक बनी थी। लेकिन फिर भी रियालीटी से थोडी दुर ज़रुर थी। जैसे घातक में 'कातिया' की एक अलग ही दुनिया दिखाई गई थी, वैसे ही नरसिम्हा में 'बापजी' का अलग ही माहौल था। ईस में सनी देओल का शेरवाले टेटु के साथ आना बहुत रोमांच पैदा करता था।

मैनें दरअसल अपने स्कूली दोस्तों से नरसिम्हा के बारे में सुना था। रिसेस के समय वे सभी नरसिम्हा बने सनी देओल की तारीफ कर रहे थे। वह कैसे तलवार चलाता है और हाथ में नरसिम्हा का टैटू भी बनाया हुआ है वगैरह। घर में जीद्द कर के हम सब वह फिल्म देखने गए। और मुज़े तो बहुत ही ज्याद मज़ा आ गया! मेरे लिए 'नरसिम्हा' जैसे एक सुपरहीरो बन गया था।
अगले दिन स्कूल जा कर मैं भी अपने दोस्तो के साथ नरसिम्हा की बातों में जुट गया। फिर मैं भी दुसरों की तरह अपने बाजू पर बोल पोईंट पेन से नरसिम्हा का टैटु बना कर सबको दिखाया करता था!घर में टैप रेकोर्डर होने के कारण नरसिम्हा की कैसेट भी मंगवाई थी और फिर मैं उसके गाने रीपीट मोड में सुना करता था!
मै नरसिम्हा बचपन में सिर्फ एक ही बार देख पाया। उन दिनों में तो सोच भी नहीं सकते थे की फिल्म को दोबारा देखी जा सकती है / देखी जानी चाहिए! यह बात दिमाग में कभी आती ही नहीं थी। उस समय भी घर में केबल कनेक्शन वगैरह नहीं होने के कारण यह फिल्म कभी देखने को नहीं मिली। लेकिन फिर एक बार स्टेशन के पासवाले थियेटर में, जहां सुबह के मेटनी शो में मिथुन दा और बी ग्रेड की फिल्में चलती रहती है... वहीं नरसिम्हा फिल्म लगी थी। वहां यह फिल्म फिर से देख ली।
वैसे नरसिम्हा सच में एक अच्छा कोन्सेप्ट है। जो सुपरहीरो के जैसे भी काम कर सकता है। अगर ईसे साउथ की फिल्मों की तरह ट्रीटमेंट दे कर फिर से बनाया जाए तो भी यह दर्शकों को एक बढिया रोमांचकारी अनुभव दे सकता है।
Thursday, 30 June 2022
कच्चे रंग - दूरदर्शन
१९९७ या उसके बाद दूरदर्शन पर दोपहर एक नया धारावाहीक प्रसारित हुआ था। शायद उसका नाम 'कच्चे रंग' था। नाम मुज़े अच्छी तरह याद नहीं है, लेकिन फिल्म का टाईटल सोंग यही था.... क्च्चे रंग उतर जाएंगे, मौसम है गुज़र जाएंगे। जो गुलज़ार साहब द्वारा लिखीत था।
यह गाना फिर दो-तीन साल बाद सनसेट पोईंट नामक गुलज़ार जी के आल्बम में शामिल हुआ. कुछ बदलाव के सात। जो था, 'कच्चे रंग उतर जाने दो, मौसम है गुज़र जाने दो!' टीवी सीरियल और ओडीयो आलबम, दोनों में संगीत था विशाल भारद्वाज का।
नटखट रानी बड़ी सयानी - दूरदर्शन
90s के दशक के दोपहर में बच्चों की एस सिरियल आई थी, 'नटखट रानी बड़ी सयानी'। कुछ लोगों ने यह फिल्म जरुर देखी होगी। ईस सिरियल में रानी नामकी लड़की दुसरे शहर से आती है या उसके माँ-बाप रानी का दाखिला बोर्डिंग स्कूल में कर देते है। वहां वह रानी को बिलकुल अच्छा नहीं लगता और काफी समय तक खुद को उस माहौल में ढाल नहीं पाती।
स्कूल में वह गुस्से से शैतानीयां करने लगती है। मन ही मन में दुखी रहनेवाली रानी सिनियर छात्राओसे झगडा भी कर लेती है। ईस तरह उसका एक ग़्रुप बन जाता है जो बाद में बहुत पोप्युलर हो जाता है और रानी को स्कूल अच्छा लगने लगता है!
वह उदास से चेहरे वाली लडकी एक क्लासमेट जैसी दिखने के कारण मुझे याद रह गई थी। मेरा भी स्कूल
बदलने के कारण मैं उस सिरियल से और रानी के व्यवहार से पुर्णतः रिलेट कर पा
रहा था। वह सिरियल मैने पुरी देखी थी।
ईन्टरनेट की सुविधा आने के बाद भी मैने वह सिरीयल के बारे में बहुत सर्च किया लेकिन कुछ मिल नहीं पाया। फिर एक बार नटखट रानी का टाईटल सोंग युट्युब पर अपलोड हुआ, जो देख कर बहुत अच्छा लगा।
फिर सालों बाद, किसी ने एक चौंकानेवाली (मेरे
लिए) बात बताई की वह लड़की अब हैदराबाद की कलेक्टर बन गई है! फिर उन्हों ने
वह कलेक्टर के फोटो भी शेर किए। फिर उनका नाम भी पता चला - श्वेता मोहंती,
IAS ।
Friday, 24 June 2022
शोले - दूरदर्शन पर
केबल टीवी, वी.सी.आर. ना होनें के कारण कई बच्चों ने शोले फिल्म नहीं देखी थी। फिर जब 26 जनवरी 1996 को दूरदर्शन पर शोले फिल्म के प्रसारण की बात चली... सभी लोग बहुत खुश हो गए। यह बहोत से लोग का आंकडों का अंदाज़ा भी नहीं लगाया जा सकता।
Thursday, 23 June 2022
थोडा सा रुमानी हो जाए
यह फिल्म कई 4-5 फिल्मों पर आधारित है, जिनका क्रेडिट आखिर के आउट्रो टाईटल्स में दिया गया है।
फिल्म के मध्य हिस्से में एक और पात्र प्रविष्ट होता है। ईस पात्र के बारे में यहां उजागर करना ठीक नहीं रहेगा। हालांकि पोस्टर और कवर पर उसी को हीरो के तौर पर दिखाया जाता है। लेकिन मेरे विचार से ईस कहानी का कोई मुख्य पात्र नहीं है। बीम जैसा छोटा पात्र भी कहानी का महत्तम हिस्सा है। ईस तरह कहानी पुर्णतः सभी पात्रों और परिस्थितियो पर निर्भर है।
लेकिन ईतना ज़रुर कहुंगा की, फिल्म के उस मोड़ पर ह्युमन बिहेवीयर की उस आदत को उजागर किया है... जहां कोई उम्मीद न होने पर लोग चमत्कार और जादु में कैसे विश्र्वास कर लेतें है! उस संवाद और परिस्थितियों का मिलन आप फिल्म के मध्य हिस्से में जरुर देखिए, बहुत मज़ेदार है!
आशा है आप यह फिल्म ज़रुर देखेंगे। युट्युब पर फिल्म एक क्लिक में उपल्ब्ध है, और जिसे ढुंढने के लिए मेरे 6-7 साल गुज़र गए थे!
Wednesday, 22 June 2022
स्कूल की यादें
तीसरी
कक्षा से School का मुख्य दरवाजा सामने ही पडता था! हमारी मेडम स्कुल की
घंटी बजने की राह देखने को कहती थी, और हम school bag तैयार कर के बैठ जाते थे!
मेरी बेन्च दरवाजे से सटी होने के कारण मै ईसी प्रकार भाग कर स्कुल से सबसे
पहेले निकल पडता था! बाहर मेरे पापा को साईकल ले कर मेरी राह देखते हुए
देख कर कितनी खुशी मिलती थी!
मेरा घर मेईन रोड पर था...जहां दुर एक सरकारी स्कुल थी। शाम पांच बजे जब सब
बच्चे छुट कर जाते तो कई लोग उन्हे बरामदे में खडे हो कर (चाय पीते पीते)
उन्हे देखा करते। वे बच्चे भी खुब थे...जैसे कोई परेड चल रही हो, वे सब
अपनी अपनी मस्ती मैं दोडते, भागते, चिल्लाते, बतियाते हुए चलते चलते घर
जाते थे!
और हम सोचते रहेते की हम कितने अमीर है! हमारे पास तो अब साईकिल भी है! जब आठवीं तक आएंगे तब हम भी साईकल ले कर स्कुल जाया करेंगे.... क्या ख्वाब था! कितनी राह देखी गई थी! कुछ एसे बच्चे भी हुआ करते थे जिनका मक्सद सिर्फ और सिर्फ धमाल मचाना था। प्रायः मे जिन्हे बहादुर समझता रहा उनको रोते हुए देख कर अचंबित रह गया! हमारी स्कुल में फ्री पिरियड ज्यादा होते थे! या कभी मेडम को कुछ काम रहेता था....तो वह अपना काम करती थी। कुछ उनकी मुंहफट चमचीयां भी हुआ करती थी जो उनको कहती थी की दुसरे सर का होमवर्क बाकी है तो क्या वह हम कर सकते है? और एसे हमे फ्री पिरियड मिल जाते थे! मेरा होमवर्क ज्यादातर कंप्लीट होता था....और में एसे फ्री टाईम में यह करते हुए पाया जाता था!
मेरे हिसाब से हमे खुब सारा होमवर्क दिया जाता था जो कम से कम एक-देढ घंटा चला करता था। यह तो बच्चो के साथ सरासर अन्याय था! फिर जब शाम पांच बजे 'राजकुमार जी' खेलने को निकलते.... कंप्युटर तो बहोत दुर की बात है! हमारे स्कुल मे पंखे भी ठीक से नही चलते थे! दो पंखो में से एक तो बस यूं ही चमगादड़ की तरह लटके रहा करता था! सात दिन की सात अलग अलग प्रार्थनाएं माईक पर ७वीं कक्षा की लडकीयां गाती थी! घर के पास वाले कीसी कीसी दोस्त की एसी भी स्कुल थी जहां टाई पहेनी जाती थी। आज कल जैसे रंगबेरंगी युनिफोर्म चलन में है, वैसे तो हम सोच भी नही सकते थे! हमारे पास सफेस शर्ट और ब्लु चड्डी हुआ करती थी सभी दोस्तो की ब्लु चड्डी के भी पचास शेड्स हुआ करते थे....ध फीफ्टी शेड्स ओफ ब्लु एक दोर एसा भी था...जब आस पडोस तक खबर पहुंच गई थी की मैं गोपीयो से घिरा रहेता हुं....सिर्फ मुझे ही पता था की में कितना तन्हा हुं...
उन दिनो मैने सोच लिया था की २५-५० पैसे हफ्ते में खर्च नही किए तो क्या किया? अपनी कीसी नोटबुक में चवन्नी, पचास पैसे के सिक्के ले जाया करता था। जो चाहे चोकलेट, स्टीकर, रीफिल वगेरह....खरिद लिया! क्या एश थी!
एक बार एसा भी हुआ था...स्कुल छुट चुका था। दो पहर साडे बारह-एक का समय होगा। हम सब एक पुल के नीचे खडे थे, जोरो की बारिश हो रही थी। आज मैने सोच लिया के भले गीला हो जाउं लेकिन घर जल्दी पहुंच जाना है। सो मैने साईकिल आगे बढ़ा ली। गीला होते होते घर तक पहूंचा जो लगभग आघे घंटे की दूरी पर था। लेकिन यह क्या?! यहां तो बारिश की बुंद भी नही गिरी थी, रोड सारे सुखे थे और सुरज भी चमक रहा था! रस्ते में लोग मुझे चोंक कर देख रहे थे, मै पुरी तरह पानी में तर था! मेरे घर तरफ उस दिन बारिश हुई ही नही और मै असमंजस मे बार बार आकाश की और देखता रहा था! मै पहली कक्षा में पढ़ता था। शनिवार की सुबह सुबह सब बच्चों को स्कुल के बाहर ले जा कर लाईन में खडा कर दिया गया था। मुझे हर बार की तरह कुछ समझ नहीं आ रहा था की क्या हो रहा है। एक से सात कक्षा के सभी छात्रों को स्कुल के बाहर एक कतार में चलने की सुचना दे कर प्रिन्सीपल साहब स्कुल के पीछे की तरफ जाने वाले रास्ते पर चल दिए। मैं डर के अपने किसी दोस्त को पुछ रहा था की क्या होने वाला है.... हमारी बटालियन धीरे धीरे आगे चल रही थी। हमने स्कुल के थोडे पीछे जा कर देखा तो एक विशाल मेदान था....जिसके दुसरे छोर तक नज़र भी नहीं पहूंचती थी! दरअसल बात यह थी वह ग्राउन्ड एसआरपी का था। शायद कीसी की दरखास्त पर हम बच्चों को वहां खेलने की ईजाज़त मील गई थी। हम एक से सात कक्षा के बच्चों को वहां खडा कर के थोडी सुचनाएं देने के बाद हमे खेलने को छोड दिया! यह हमारा सब से बडा उपहार था। शनिवार को स्कुल में पुरे पांच पिरियड होते थे...हम सिर्फ खेलते ही रहे....खेलते ही रहे! मेरे मन में एक और खुशी/बेताबी बढ़ रही थी। कल ईतवार जो था! सातवीं कक्षा में अचानक हम दोस्तो ने हररोज रिसेस में वही पुराने ग्राउन्ड में जाने का सोचा। लगभग एक माह तक हम रोज मस्ती, खेलकुद से दुर कुदरती वातावरण का आनंद लेते थे....उन दिनो मेरे लंचबोक्स में क्या होता था पता है? सातवी कक्षा के बाद स्कूल का समय १२ बजे से ५.३० का होने वाला था.....सुना था की दो रिसेस मीलने वाली है, बडी रिसेस में कुछ बच्चे घर भाग जाते है! बहोत सारे फ्री पिरियड होते है और आप क्लास में सो भी सकते हो! ४-५ कक्षा में कुछ एसे भी दिन थे जब मुझे स्कूल वाकई अच्छा लगने लगा था! में सोचता था कि 'बचपन' मे मै कितना पागल था क्युं की २-३ कक्षा में मुझे स्कुल जाना अच्छा ही नहि लगता था। लेकिन अब यहां मेरे दोस्त बनने लगे थे। स्कूल १२ बजे छुट जाया करता था। अब मै पहली बेन्च पर बेठने के बावजुद सबसे आखिर में क्लास से नीकलता था। शायद ईस लिए की खाली क्लास को देखना मुझे अच्छा लगता था। कभी कभी वह घर जैसा दिखता था। कुछ एसा ही होता था मेरा क्लास रुम...बस उस वक्त एसी प्लास्टिक की कुर्सीयां नहि होती थी! हर एक बैंच की अपनी एक कहानी होती होगी । हर एक बच्चा अपनी कोई न कोई निशानी बैंच पर छोड ही जाता है। बैंच पर अपना नाम खुरदना, या बोलपेन से मोटे मोटे अक्षरों से लिख देना। कोई बच्चा मेरी तरहा तबले की थाप दे कर ज़ोरो से गीत भी गाता होगा। क्या बैंच को यह सब पसंद होगा? फिर स्कुल में दिवाली के समय कुछ दोस्त छुपा कर एसे फोटो वाले ग्रीटींग कार्ड लाने लगे थे! अगर आपको चवन्नी में अमिताभ या माधुरी मील सकती हो तो क्या आप दिवाने नही हो जाओगे? उन दिनो मेगेझीन तो हर घर में होते नही थे, ले दे कर एक दिन समाचार पत्रों मे बोलिवुड की पुर्ति आती होगी। अखबार भी रोज़ थोडे ही मंगवाया जाता था!
यह मेरी अपनी सचीमुची की यादें है! यह मेरा सच है! आपको कैसा लगा यह पढ कर जरुर बताईगा और अपनी कोई पुरानी यादें हो तो जरुर साझा किजीएगा!
आगे पढें 90s का दशक
बर्फ का गोला
बर्फ का गोला.... चुस्की का प्रारंभिक स्वरुप, सबने जीवन में खाया ही होगा। बस, उसी की कुछ यादें लिख रहा हुं, कैसे पहली बार बर्फ का गोला खाने को मिला और फिर दोबारा उसके लिए क्या क्या पापड बेलने पडे!
मुझे बर्फ तो क्या, ठंडे पानी पीने की भी मनाही थी। वैसे तो घर में फ्रिज था ही नहीं, सिर्फ एक ही दोस्त के घर पर फ्रिज था। लेकिन मुझे टोंसिल्स हो जाते थे, अगर मैं आईस्क्रीम खाउं या ठंडा पानी पी लुं। मम्मी की डांट फिटकार से तो अच्छा था कि मैं एसी कोई चीज़ें खाउं ही ना।
एक बार मैं अपने दोस्त के घर खेलने के लिए गया था। वहां शाम के साड़े पांच बजे एक बर्फवाला निकला। मेरा दोस्त उसकी मम्मी से जिद्द करने लगा। मुझे अभी बर्फ के गोले के बारे में पता ही नहीं था। देखा था लेकिन कभी खाने को भी मिलेगा, कल्पना करना मुश्किल था!
दोस्त की मम्मी ने चवन्नी दी। हम दोनों एक एक प्लेट ले कर वहां गए और दोस्तने बिना पुछे ही ओरेन्ज रंग डलवा दिया। उन दिनों बर्फ के घिस-पिस कर हाथों से ही दबा कर गोल लड्डु सा बना दिया जाता था। फिर उस पर कोई एक रंग डाल कर दिया जाता था। दाएँ-बाएँ दो अलग अलग रंगो का चलन थोडी देर से शुरु हुआ।
फिर वापस घर आ कर हम बर्क के गोले की चुस्कीयां लेने लगे। तब क्या बताउं के कितना मज़ा आ गया!
फिर आधा गोला खत्म करने पर मेरे दोस्त ने कहा अब ईस पर थोड़ा नमक डाल कर खातें है, मज़ा आएगा। अब तक तो गोले का मज़ा आ ही रहा था, नमक छीडकने के बाद स्वाद बढ गया! फिर मेरे दोस्त ने बताया की अलग अलग रंगो का स्वाद अलग अलग होता है, अब अगली बार काला खट्टा रंग खाएंगे। मैं भी हां में हां मिलाता रह गया। उस दिन हम क्या खेले क्या नहीं, लेकिन क्रुतज्ञावश में उस दिन उसकी सारी बातें मानता रहा!
Sunday, 22 May 2022
चटर-पटर
हमारा स्कूल का समय सुबह का हुआ करता था 9:30 या 10:00 बजे हमारा ब्रेक टाइम हुआ करता था। इस रिसेस के टाइम पर हम लोग दोस्तों के साथ स्कूल के बाजू में रवि भैया की दुकान पर जमावड़ा कर देते थे। वहां से तरह-तरह की चीजें लेकर खाना या सिर्फ देखने जाना, यह हमारा रोज का कार्यक्रम हुआ करता था।
एक बच्चे के तौर पर यह स्कूल के पास की दुकान से ज्यादा आश्चर्यजनक सुपर मॉल और कोई नहीं है! उस समय में कुछ ठेले वाले और एक दो मौसी भी आती थी! चीनी बेर, बर्फ का गोला और दूसरी तरह तरह की चीजें मिलती थी।
लेकिन मैं अपनी चवन्नी रविभाई की दुकान पर ही खत्म कर देता था। क्योंकि मम्मी ने बाहर खाने का मना किया था!
वह जो ब्रेक होता था, वह मेरे लिए सबसे ज्यादा खूबसूरत समय हुआ करता था। वक्त - उससे ज्यादा फ्रेश मुझे कभी नहीं लगा। हां कभी-कभी होमवर्क का टेंशन रहता था या स्कूल में कभी डांट पड़ी होने की वजह से मूड खराब रहता था। फिर भी ब्रेक में मैं थोड़ी देर के लिए सब कुछ भूल जाता था।
तीसरी साइकिल
दसवीं क्लास में आने के बाद 3 महीने गुजर गए। फिर मेरे पापा ने हीरो रेंजर साइकिल खरीद कर दी। जिसको हम लोग सीधे हैंडल वाली साइकिल कह के बुलाते थे। यह साइकिल मैंने कम से कम से 8 से 10 साल तक चलाई होगी। हम लोग क्वार्टर में रहते थे और हमारा घर दूसरे माले पर था। हमारे यहां सब लोग चोरी के डर से अपनी अपनी साइकिल उठाकर ऊपर बरामदे में रखते थे! मेरा भी यही रूटीन रहा।
मैं अपनी साइकिल बहुत संभाल के रखता था। उसको घर पर ही रिपेयर और सर्विस करता था। और कई बार इसको बाहर भी देनी पड़ती। बहुत पुरानी हो जाने के बाद मैंने उसको एक दो बार कलर भी किया था।
इस साइकिल के पेडल प्लास्टिक के होने की वजह से बहुत जल्दी खराब हो जाते थे। तीन चार महीनों में एक नया पैडल का सेट डलवाना पड़ता था। फिर मैंने बोर होकर उसमें अपनी देसी साइकिल के पैडल डलवा दिए थे!
दोस्त लोग कहते थे कि अगर हाइट बढ़ानी हो तो साइकिल की सीट ऊंची करवा लेनी चाहिए। तो मैंने ऐसा भी करके देखा, लेकिन मेरी हाइट ज्यादा नहीं बढ़ी। क्योंकि मैं पहले से ही अपने क्लास में सबसे लंबा था!
मेरे पास जब दूसरे नंबर की सिंपल साइकिल थी, तब हमारा एक सरदार दोस्त हीरो रेंजर साइकिल लेकर आया था ऐसी हीरो रेंजर साइकिल मैं जब ब्रेक लगाते हैं तो "पों..." की आवाज आती थी। हम उसको बाहर बार साइकिल पास चला कर ब्रेक मारने को कहते थे। और उसकी आवाज सुनकर बहुत आश्चर्य होता था। लेकिन मेरे पास थी जबर हीरो रेंजर साइकिल आई, तब ऐसी आवाज मेरी साइकिल से नहीं आती थी।
उस साइकिल में मैंने थोड़े मॉडिफिकेशन भी करवाए थे। जैसे कि हैंडल भी यू शेप का डलवा कर देखा। आगे बास्केट भी डलवाई थी। सारी 'कार्टूनगिरी' मैंने इस साइकिल पर आजमा डाली! फिर सालों तक यह साइकिल वैसे ही पड़ी रही। और फिर मेरे पापा बोल कर उसे सस्ते में बेच डाला।
चौथी साईकिल
Saturday, 7 May 2022
बचपन की यादें
आज बहोत कुछ बदल गया है! श्री कृष्ण ने यह क्युं कह दिया...परिवर्तन संसार का नियम है? अगर वे यह नही कहेते तो कितना अच्छा होता! यह जगनिर्माण का हेतु अभी तक मुझे समझ नहीं आ रहा है! यह जग आगे विध्वंश की ओर बढ़ता ही जा रहा है, वह भी बडे गर्व या कभी लगता है बडा अंजान बन कर! फिर भी अंदर कहीं एक आस तो होती है, शायद वह दिन वापस आयेंगे....जैसे नदी के नीर उल्टे बहते है! मुझे फिर से उस जगह, उस काल में संजो दिया जायेगा...वही पुराने लोगों के बीच जो अब बुढे से दिखते है! मै फिर से जीना चाहूंगा बिलकुल यही जिंदगी....दोबारा....ईसी तरह!
स्कूल की यादें
तीसरी कक्षा से स्कुल का मुख्य दरवाजा सामने ही पडता था! हमारी मेडम स्कुल की घंटी बजने की राह देखने को कहती थी, और हम बैग तैयार कर के बैठ जाते थे! मेरी बेन्च दरवाजे से सटी होने के कारण मै ईसी प्रकार भाग कर स्कुल से सबसे पहेले निकल पडता था! बाहर मेरे पापा को साईकल ले कर मेरी राह देखते हुए देख कर कितनी खुशी मिलती थी!
मेरा घर मेईन रोड पर था...जहां दुर एक सरकारी स्कुल थी। शाम पांच बजे जब सब बच्चे छुट कर जाते तो कई लोग उन्हे बरामदे में खडे हो कर (चाय पीते पीते) उन्हे देखा करते। वे बच्चे भी खुब थे...जैसे कोई परेड चल रही हो, वे सब अपनी अपनी मस्ती मैं दोडते, भागते, चिल्लाते, बतियाते हुए चलते चलते घर जाते थे!
यह मेरी अपनी सचीमुची की यादें है! यह मेरा सच है! आपको कैसा लगा यह पढ कर जरुर बताईगा और अपनी कोई पुरानी यादें हो तो जरुर साझा किजीएगा!
आगे पढें.... बचपन की यादें | चटर पटर | 90s का दशक | स्कूल की यादें






























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