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Thursday, 23 June 2022

स्कुल की प्रेमकहानीयां

विषय नाजूक है...जो किसी को पसंद या किसी को ना पसंद भी हो सकता है! पाठकों का सहयोग वांछित है।
लेकिन यह सच है की प्रेम स्कुलों में भी होता है! और यह मेरे ही अनुभव है, जो साझा कर रहा हुं। आपको अंत तक पता लग जाएगा की मेरे लिये यह कितना जरुरी था!

ईस से पहेले की आप अपनी भंवे उपर चढ़ा कर मुझे रोक लें....मै कहना चाहुंगा की यह कहानीयां सीधी-सादी और ईस फोरम में जारी करने योग्य ही है।
फिरभी, अगर किसी को आपत्ति हो तो मुझे अवज्ञत कराएं।

प्रकरण एक:

किसी महान लेखक ने कहा है की... हंमेशा एक लेखक की कहानी का नायक...स्वयं वह लेखक ही होता है!

आठवी कक्षा के शुरु हुए चार-पांच माह बीत चुके थे। मेरे लिए यह समय बहुत लंबा था। हम लोग सब अच्छे लडके गीने जाते थे। पढाई करते, होमवर्क करते, सारे सवालो के जवाब देते, लिमीट में मस्ती भी करते थे। हमारा गृप मतलब मुझे मिला कर चार से पांच लडके। सारी लडकीयां हमसे अच्छे से बाते करती थी। मजाक या मस्ती भी होती रहती थी। नोट्स एक्चेंन्ज होती थी, एक दुसरे को मदद करते रह्ते थे। या कमसे कम मै तो यही सोचता था!

ईन दिनो अजीब से बदलाव शरीर में आने लगे थे। आवाज़ बदलने लगी थी, हाईट बढ कर मम्मी जितनी हो गई थी। मेरा सारा ध्यान अब पढाई में कम लगने लगा था। और लड्कीयों से बात करना अच्छा लगने लगा था!

(प्रस्तुत चित्र प्रतिकात्मक है)

रेडियो पर बजते फिल्मी गाने और यहां स्कूल का माहोल मुझे दिवाना बना रहा था! यह कुछ केमिक्ल रीएक्शन जैसा था। एक नशा सा पुरे रात-दिन रहता था। अब यह हाल था की जब सन्डे आता तो मुझे सचमुच गुस्सा आता की यार यह सन्डे बीच में क्यों आ जाता है? मै बस कहीं उड़ रहा था...बस उडे जा रहा था! मुझे पता था की यह हकीकत है, कोई ख्वाब नही है। फिर भी....

लेकिन, लेकिन, लेकिन...मै जो था कभी ईश्क में नहि गिरा! ईसी तरह आठवीं से ले कर दसवीं कक्षा हंमेशा एक योग्य साथी के सपने ही देखता रह गया! कोई नही मिला...क्युं? नही पता! उन दिनो सुने गए गाने अब भी मुझे उसी माहोल में ले जाते है|

और मेरी कहानी यहीं समाप्त हो गई है!

और हां, याद आया...'लेखक ही नायक होता है' वाली महान उक्ति मेरे द्वारा ही लिखी गई है!

***


प्रकरण तीनः

प्रकरण दो के बाद मेरे पास शायद बताने को कुछ न होगा! क्यों के वही प्रकरण बहुत उलझा हुआ था और मै जल्दी जान नही पाया। ईसलिए अभी प्रस्तुत है प्रकरण नंबर तीन!

राधा और मनोज

राधा हमारे क्लास की शायद सबसे गरीब लड़की थी। आठवी कक्षा से वह हमारी स्कूल में पढ़ने आई। वह गोरी थी और एक दो विषयों को छोड़ पढ़ने में अच्छी ही थी। वह हमारे गृप में आते ही घुलमिल गई। उसका एक खास रोल था - सबको सलाह देना। वह सहेलीयों को बड़ी दीदी बन के सलाह देती। काजल. लक्ष्मी, अनु उसकी खास सहेलीयां थी।

मनोज एसा लड़का था जो हम में से किसी को जरा भी पसंद नहीं था। वह गाली-गलौंच करता था, लडाई करता था, पढ़ता नहीं था। शायद उसके वही गुण राधा को पसंद आ गए!


एक दिन रिसेस का समय था और क्लास में कुछ ही बच्चे थे। मनोज और उसका कोई फालतु दोस्त आपस में एक दुसरे को जोरो से गालिंया बके जा रहे थे। हम सबको सलाह देनी वाली हमारी 'दीदी' गैलेरी में खड़ी थी। वह खिडकी पर दोनो हाथ रख के क्लासरुम के अंदर देख रही थी। मैं दरवाजे पर ही खड़ा था, सो मैने राधा को देखा और उसके पास चला गया। वह मनोज को देखते हुए निराशा से बोली, "कितने बेशर्म है ये लड़के!"
मैने पुछा, "क्युं? तुमको तो पसंद है ना?"
वह मेरे सामने शांति से देख कर बोली , "हां।"

उसके बाद क्या हुआ पता नहीं। महिनों बाद एक बार मैं और मनोज स्कूल से छुट कर किसी काम से जा रहे थे। रास्ते में राधा का घर आता था, वो वहीं पर खडी कुछ काम कर रही थी। हम दोनो साईकल पर वहीं रुके और राधा से थोडी बातचीत कर के आगे निकल गए।
उसके कुछ महिनों बाद मै और मनोज साथ साथ घर तरफ जा रहे थे, मनोज का ओर एक दोस्त हमारे साथ था। वे दोनों पता नहीं क्युं लेकिन राधा के बारें मे गालियां दे-दे कर बातें कर रहे थे।

मुझे माजरा समज में नही आया, लेकिन गुस्सा आया, सोचा...ईस लड़के से दोस्ती रख कर राधा को क्या मिला?

***

प्रकरण चारः

अनु और विराट

राधा की एक सहेली काजल का भाई था विराट। वह हमसे एक कक्षा आगे मतलब की कक्षा नौ मे था। उसका गृप बडा और मज़बुत था। सब के सब लोग "भाई" थे। क्यों की काजल हमारे गृपमें थी, हमें भी विराट से हाथ मिलाने का मोका मिल जाता था जो बड़ी बात थी!


हमारी स्कूल में एक से सातवीं कक्षा का समय सुबह का था। हम लोग सातवी कक्षा से पास हो कर आठवी कक्षा में आए । हमारा स्कूल का समय अब बारह से साड़े पांच का हो चूका था। मै पहेले हफ्ते स्कूल गया ही नहीं।

मेरे बचपन का क्लासमेट राहुल अब मेरे घर के पास ही रहेने के लिए आ गया था। उसके साथ अब तक मेरी कबी बनती तो कभी बिगड़ती थी। लेकिन जब वह मेरे घर के पास आ गया हमारी गहरी दोस्ती हो गई....वो अब भी कायम है!

राहुल से बात कर के मुझे पता चला की एक से सात कक्षा में जो स्कुल है, वह आठवीं में एकदम बदल जाता है। सारे सर और मेडम का व्यवहार दोस्ताना है, हंसी मज़ाक भी चलता है। वे प्राथमिक कक्षाओं जैसे रुक्ष और कडक नहीं है!

(प्रस्तुत चित्र प्रतिकात्मक है)

उपर से समय में भी भारी बदलाव था। पहेले स्कुल जाने के लिए सुबह जल्दी उठना पड़ता था, अब जब चाहे उठो, खेलो, घुमो फिर स्कुल जाओ!

प्राथमिक कक्षा में एक ही रिसेस होती थी, लेकिन अब दो रिसेस...एक छोटी (दो पिरियड के बाद) और एक बडी (पांच पिरियड बाद)।

राहुल ने एक बात और बताई की कभी कभी फ्री पिरियड भी होते है, जब कोई शिक्षक पढाने नहीं आता।

ज्यादतर यह होता था की सातवीं कक्षा पुर्ण करने के बाद कई बच्चे स्कूल बदल देते थे। हमारा जो गृप था वह भी ईसी तरह बंट गया। आधे लोग दुसरी स्कूलों मे चले गए। उर्वशी, सिध्दार्थ...कई दोस्त छुट गए।

खेर, मुझे पता था की अब भी बहुत देखना बाकी है। दोपहर की स्कुल की का जो मज़ा था....वह वैसा ही था जैसा राहुल ने बताया था।

पहेले पहेले तो मुझे सेट होने में थोडा समय लगा, नए सर और मेडम जब हमें जान गए हमें सबसे आगे बैठाया। लेकिन ईस बार हम सच में पीछे बैठना चाहते थे....सातवीं कक्षा तक आगे बैठ बैठ के हम सब उकता चूके थे!


(प्रस्तुत चित्र प्रतिकात्मक है) 

 
खैर अब वापिस अनु-विराट की कहानी पर आते है।
हमारी काजल और राधा के साथ अनु की खुब बनने लगी। यहां तक की काजल और अनु एक दुसरे को बहुत मानने लगे। शायद आपके नाक उपर की ओर चढ जाए...कि यह क्या बचपना है! लेकिन काजल अनु को कभी कभी भाभी कह कर बुलाती थी! आप सोचीए जरा..हम सब बच्चे आठवी कक्षा के थे!
अनु का का स्कूल के एकदम पास में था, ईसलिए अनु को रिसेस में घर जाना पडता था। सो रिसेस में कभी वह हमारे साथ नहीं होती थी और ना ही विराट से कभी मिल सकती थी। कभी फ्री पिरियड में या शनिवार को वे दोनो बातें करते पाए जाते थे।
लेकिन हाय, यह ज़ालिम जमाना, खुदगर्ज दुनिया को यह आंखो देखा गंवारा न था!

यह कहानी यूं ही आगे बढती रही, हम नौवीं कक्षा में आ गए। अब हम सभी स्कूल में अच्छी तरह सेट हो गए थे। राधा और काजल भी स्कूल से निकल चूके थे, राधा का पता नहीं लेकिन काजल किसी ओर स्कूल में जा चूकी थी।

विराट दसवीं कक्षा में था और स्कुल में कम दिखाई देता था। यह उन दिनों की बात है जब ट्युशन क्लासिस का दौर चल पडा था। स्कुली शिक्षक ही ट्युशन करवाया करते थे, जिनका फायदा उनके स्टुडन्ट को स्कूलों में मिलता था। ट्युशन जाने वाले बच्चे स्कुलों में कम आते थे या बड़ी रिसेस के बाद घर चले जाया करते थे।



एक बार बात यह हो गई की स्कूल में नए प्रिन्सीपल साहब आए थे। वे बड़े बदलाव करने की कोशिक करते थे। उनको यब बात पता चली। उन्हों ने दोनो को रंगे हाथ पकड़ना चाहा।
एक क्लास रुम में फ्री पिरियड चल रहा था। क्लास में बस चार-पांच बच्चे थे। वहां ये दोनो अनु और विराट पीछले बैन्च पर बैठ कर बतियाने लगे।

प्रिन्सिपाल जी वहां पहूंच गए और दोनो को डांटने लगे। दोनो अपने अपने क्लास में भाग आए। प्रिन्सिपल साहब क्लास में आए और अनु को खूब डांटा। उसे रोते हुए घर भेज दिया... पेरेन्ट्स को बुलवाने के लिए।
वह कहती रही के एसा मत करें...लिकिन साहब ने एक न सूनी।

फिर उसकी मम्मी आई...पुरे क्लास के सामन अनु को दो तमाचे मारे और घर ले गई।
अनु की फैशनेबल बाल दुसरे दिन से सीधे, चीपचीपे हो गए। वह एक साल अनु स्कुल में रही, उसके बाद उसे स्कूल से उठा लिया गया।

***


प्रकरण दोः

काजल-राज

यह वही प्रकरण है जिसने मेरे छोटे से दिमाग को उलझाए रखा। सातवीं कक्षा से काजल हमारे गृप में थी। लेकिन आठवीं में वह राधा, अनु, दीपक और संजय के साथ हो गई। उस गृप से जुड़ते जुड़ते दो तीन महिने निकल गए। मुझे अभी भी याद है ओगस्ट के महिना और बारिश वाले दिन थे। हम बैन्चीस पर उपर-नीचे बैठे थे और हंसी का जाने गुबारा फट पडा। मुझे लगा की यह गृप अब कभी नहीं तुटेगा। हम सब बहुत खुश थे, नया गृप बन चूका था!

(प्रस्तुत चित्र प्रतिकात्मक है)

एक दिन काजल उदास थी, हम सब के पुछने पर उसने बताया कि राज उससे बात नहीं कर रहा है। ईस कारण से वह उदास है। मै वाकई उल्लु था, रीसेस में मैने राधा से पुछा, "ईसका मतलब क्या है? राज अगर ना बोले तो काजल क्युं उदास है?"
राधा बोली, "क्युं के दोनो चालु है!"
"चालु मतलब?" मै ओर उलझा!
"उसी से पुछो।" राधा उकता कर नीचे चली गई।

रीसेस जब खत्म होने आई मै क्लास में आया, राधा काजल को कुछ समजा रही थी! हमारे गृप की सारी लड़कीयां और दो लड़के बैठे हुए थे।
मैने पुछा, "क्या हुआ?"
"कुछ नही" काजल बोली।
"एक बात बता तो जरा?" मुझे वाकई में उत्सुकता थी।
"क्या?" काजल बोली। अब वह स्वस्थ थी।
"क्या तुम और राज चालु हो?" मैने भोलेपन से सब के सामने पुछ लिया!
फिर जो हमारे गृप का ठहाका पुरी क्लास में गुंजा है!!!

काजल पहेले तो भौंचक्की रह गई थी...फिर वह भी ठहाके की गुंज में शामिल हो गई। मुझे पता चल गया, की बेटा आज फिर से कोई गलती हो गई।
काजल ने पुछा, "तुझे पता भी है, 'चालु' का मतलब?" मैने ईनकार में सर हिलाया।
वह बैन्च से खडी हो कर मेरे कान में फुसफुसाई, "ईसका मतलब, मै राज से प्यार करती हुं!"

यह सुनते ही मैरे तन-मन में जैसे बीजली सी दोड़ गई! मुझे पता थो था की एक बला है तो सही, जिसे लोग प्यार कहेतें है। टीवी और फिल्मी गानों में मैने देखा तो था यह सब कुछ। लेकिन क्या वह सच में होता है!!! वह भी उम्र के ईस दौर में? स्कूल में?

(प्रस्तुत चित्र प्रतिकात्मक है)

यह वाकई आपत्तिजनक था/है। स्कुलों मे शिक्षकों को भी पता होता है...बच्चें है, ईनमें उत्सुकता और बचपना होता ही है। वातावरण ही एसा कुछ हो जाता है की फिर मां-बाप के संस्कार ही कुछ कर सकते है। बच्चा अगर बिगड़ता नही है, फिर भी कहीं न कहीं उसे एसे वातावरण का सामना तो करना ही पडता है!

पहेले मुझे लगता था की हमारे स्कुल में क्या हो रहा है! फिर कोलेज जा कर पता चला की सभी स्कूलों मे यही हाल था!
एक बात अच्छी है कि हम ईस मामले में अमेरिका से पीछे है।

काजल राधा के साथ स्कुल से छुट कर एक-दो बार राज के घर भी गई थी। वहां जब वह राज की मम्मी-पापा से मिली तब उसे लगा की राज की मम्मी को ईन दोनो के बारे में पता है।
मैरे घर का भी रास्ता राज के घर से होता हुआ जाता था। उसके बाद मै कभी देख लिया करता था की काजल की खटारा साईकिल वहां है या नही!
बाद में पता चला कि काजल जी के लक्षण कुछ ठीक नहीं थे। उसको कई लड़कों ने पूछा था। और वह उलझतीं ही जा रही थी। राधा कभी कभार उसको यह सब चक्करों से बचने कि सलाह देती होगी, लेकिन अब वह वैशाली के साथ अधिक घुमने फिरने लगी थी।

मुझे और राहुल को भी ओर कोई टयूशन ठीक न लगा तो काजल के गृप के साथ एक जगह ट्युशन जाने लगे थे। एक बार ट्यूशन का एक ओर लड़का उसकी नोटबुक ले कर भागा। काजल उसके पीछे भागती रही लेकिन उसने बुक नहीं दी। रास्ते में वापस वे खडे रहे और फिरसे भागाभागी की। आखिर में उकता जाने के बाद ही काजल को वह नोटबुक वापस मीली।

मैने पता किया तो खबर मीली की वह लड़का भी काजल के पीछे पडा था। उसने अपने हाथों पर भी "टी" का टेटु बना रखा था!



मुझे अच्छी तरह याद है...काजल का एक लवलेटर भी हमारे हाथों लगा था। उसकी राईटींग बहोत ही ज्यादा खुबसुरत थी। उपर से रंगीन बॉलपेन से दो छोटे पेज भर के उसने लवलेटर लिखा था। जिसमें उसने राज को ढेर सारी हिदायतें दी थी। दो चार शायरीयां थी, शायद एक गीत की पंक्ति भी थी।

चीजें अगर बद से बदतर हो, उनमें से सीख लेना एक महान ईन्सान की निशानी है। अतः मैने उस लव लेटर से सीखा की धीरे धीरे और प्रेम से लिखने पर लिखाई और अक्षर दोनों सुधर सकते है।

मैने प्रथम तो अपनी कोपी पर नज़र डाली तो कुछएक वाक्य मेरे खुद के भी पढने में नहीं आ रहे थे। लेकिन मैने प्रेक्टिस चालु रखी। जब तक दो - तीन मित्रो ने और स्वयं हमारे क्लास टीचर ने मेरी लिखाई की प्रशंसा नहीं की, मैने अपनी प्रेक्टिस नहीं रोकी!!!

वह पैसे भी एसे उडाती थी मानो उसके पास पैसे छापने की मशीन हो। दिन के दस-बीस रुपये तो यूं ही खर्च कर देती थी। कभी हम सब मिल के पांच रुपये का नमकीन खरीदते थे, काजल अकेले ही पुरा पेकेट खरीद लाती थी। फिर सब मिल कर खाते थे। रोजाना चोकलेट, च्यूंईंगम खाना और खिलाना उसका शौक था।

काजल अपनी एक कोपी के पीछले पन्नों पर अपने फेवरेट गानें लिखती थी। कभी वह रेडियो से सुन कर सीधा ही लिख लेती थी...वह भी सुंदर अक्षरों से।
उसको देख कर हम में से कई लोग एसा करने लगे, हमारी कोपी के पिछले पन्ने गीतो से भरने लगे!

उसने राज का परिचय हम सब से भी करवाया । हमने सबने मिल कर एक गृप फोटो खींचने का सोचा...जो कभी हो न पाया । मैने वह प्लान के लिए पैसे भी जमा कर लिए थे, वह फिर नोटबुक खरीदने में खर्च हो गए।



ईस दौरान एक बडा ही फिल्मी टाईप का किस्सा हो गया। एसा तो कोई सोच भी नहीं सकता।
हमारा क्लासरुम सबसे उपर के फ्लोर पर था। वहां से नीचे आने जाने की सीडीयां थी। वहीं सबसे उपर की दीवार पर कीसी ने एकदम बडे अक्षरों मे "आई लव यु काजल" लिख दिया था!!!
हम सब समज नहीं पा रहे थे की क्या कहें, क्या करें। लेकिन काजल एकदम शांत नज़र आई। फिर हम सब ने मिल कर एक उंचे लडके को कहा की भाई तुम कैसे भी कर के उस दिवार तक चढ़ो, हो सके तो वह लिखाई साफ कर दो बाबा!
ईस दौरान दो पिरियड भी बीत चुके थे। एक टीचर भी उपर आ कर, पढा कर गई थी। फिर रीसेस के समय वह साफ कर दिया गया। फिर भी थोडा-थोडा दिख रहा था।

जैसे की अनु (प्रकरण चार वाली) का हाल अगले साल में होने वाला था, काजल का ईसी साल हो गया। उसका भाई जो राज के क्लास में ही था और उसे यह सब पता चला। दुसरे दिन बात आई की आज दोनो लड़ने वाले है।
काजल उस दिन आई नहीं थी। हम सभी नीचे खड़े हो गए, यह देखने की क्या होता है।

स्कूल के सामने ही दो गुट आमने सामने आ कर बैठे हुए थे। राज वहीं पर था और सब विराट की राह देख रहे थे। जैसे ही विराट आया दोनो भीडे-न भीडे सब लोगो ने उन दोनों को पकड लिया। स्कूल का प्यून भी बीच में आया और विराट को समज़ा कर बाजु में ले गया।

आठवीं खतम होते ही उसकी स्कुल बदलवा दी गई! आगे की कहानी फिर किसी को नही मालुम। दो साल बाद फिर से वह एक बार मुझे अचानक मिल गई। थोडी बातें की, दोस्तों को याद किया। लेकिन उनकी प्रेमकहानी के बारे में मैने पुछना उचित नहीं समझा।

***


आप भी सोचतें होंगे की कैसा होगा यह स्कूल!! लेकिन मैने हंमेशा देखा है की कई स्कुली बच्चे जीनकी आयु १२-१३ वर्ष की या १३-१४ वर्ष की होती है वे भी ईस प्यार नामके खतरनाक वाईरस का शिकार हो जाते है! मेरे स्कुल में भी उसके बाद कई किस्से हुए। दुसरी बड़ी स्कुलों के भी किस्से वहां पढ़नेवाले दोस्तों से सुने।

तो एसा रहा मेरा ८ वीं से १० वीं का सफर! एसी बातें आप कहीं शेयर भी नहीं कर सकते। ब्लोग या फेसबुक पर तो बिलकुल नहीं। हां उस वक्त एक - दो बार दोस्तो से शेयर की थी लेकिन ईससे मन को तसल्ली कैसे हो सकती है? जब बारिश होती है या बारह बजे की धुप में पुराने रास्तों पर जाना होता है स्कुल बहुत याद आती है। उस दौर का कोई गीत सुनने को मिले या फिल्म देखने को मिले तो लगता है की वे दिन अब कभी नहीं आएगें।

लेकिन यहां एक अन्जान बन के बेझीझक पुरानी यादें शेयर कर के सुकून मील रहा है....जो बयां करना भी मुश्किल है।

अस्तु! (सभी पात्रों के नाम बदलें हुए है एवं, सभी प्रस्तुत चित्र प्रतिकात्मक है) 

Wednesday, 22 June 2022

स्कूल की यादें


तीसरी कक्षा से School का मुख्य दरवाजा सामने ही पडता था! हमारी मेडम स्कुल की घंटी बजने की राह देखने को कहती थी, और हम school bag तैयार कर के बैठ जाते थे! मेरी बेन्च दरवाजे से सटी होने के कारण मै ईसी प्रकार भाग कर स्कुल से सबसे पहेले निकल पडता था! बाहर मेरे पापा को साईकल ले कर मेरी राह देखते हुए देख कर कितनी खुशी मिलती थी! मेरा घर मेईन रोड पर था...जहां दुर एक सरकारी स्कुल थी। शाम पांच बजे जब सब बच्चे छुट कर जाते तो कई लोग उन्हे बरामदे में खडे हो कर (चाय पीते पीते) उन्हे देखा करते। वे बच्चे भी खुब थे...जैसे कोई परेड चल रही हो, वे सब अपनी अपनी मस्ती मैं दोडते, भागते, चिल्लाते, बतियाते हुए चलते चलते घर जाते थे!

और हम सोचते रहेते की हम कितने अमीर है! हमारे पास तो अब साईकिल भी है! जब आठवीं तक आएंगे तब हम भी साईकल ले कर स्कुल जाया करेंगे.... क्या ख्वाब था! कितनी राह देखी गई थी! कुछ एसे बच्चे भी हुआ करते थे जिनका मक्सद सिर्फ और सिर्फ धमाल मचाना था। प्रायः मे जिन्हे बहादुर समझता रहा उनको रोते हुए देख कर अचंबित रह गया! हमारी स्कुल में फ्री पिरियड ज्यादा होते थे! या कभी मेडम को कुछ काम रहेता था....तो वह अपना काम करती थी। कुछ उनकी मुंहफट चमचीयां भी हुआ करती थी जो उनको कहती थी की दुसरे सर का होमवर्क बाकी है तो क्या वह हम कर सकते है? और एसे हमे फ्री पिरियड मिल जाते थे! मेरा होमवर्क ज्यादातर कंप्लीट होता था....और में एसे फ्री टाईम में यह करते हुए पाया जाता था! 

 


मेरे हिसाब से हमे खुब सारा होमवर्क दिया जाता था जो कम से कम एक-देढ घंटा चला करता था। यह तो बच्चो के साथ सरासर अन्याय था! फिर जब शाम पांच बजे 'राजकुमार जी' खेलने को निकलते.... कंप्युटर तो बहोत दुर की बात है! हमारे स्कुल मे पंखे भी ठीक से नही चलते थे! दो पंखो में से एक तो बस यूं ही चमगादड़ की तरह लटके रहा करता था! सात दिन की सात अलग अलग प्रार्थनाएं माईक पर ७वीं कक्षा की लडकीयां गाती थी! घर के पास वाले कीसी कीसी दोस्त की एसी भी स्कुल थी जहां टाई पहेनी जाती थी। आज कल जैसे रंगबेरंगी युनिफोर्म चलन में है, वैसे तो हम सोच भी नही सकते थे! हमारे पास सफेस शर्ट और ब्लु चड्डी हुआ करती थी सभी दोस्तो की ब्लु चड्डी के भी पचास शेड्स हुआ करते थे....ध फीफ्टी शेड्स ओफ ब्लु एक दोर एसा भी था...जब आस पडोस तक खबर पहुंच गई थी की मैं गोपीयो से घिरा रहेता हुं....सिर्फ मुझे ही पता था की में कितना तन्हा हुं...

 


उन दिनो मैने सोच लिया था की २५-५० पैसे हफ्ते में खर्च नही किए तो क्या किया? अपनी कीसी नोटबुक में चवन्नी, पचास पैसे के सिक्के ले जाया करता था। जो चाहे चोकलेट, स्टीकर, रीफिल वगेरह....खरिद लिया! क्या एश थी! 


एक बार एसा भी हुआ था...स्कुल छुट चुका था। दो पहर साडे बारह-एक का समय होगा। हम सब एक पुल के नीचे खडे थे, जोरो की बारिश हो रही थी। आज मैने सोच लिया के भले गीला हो जाउं लेकिन घर जल्दी पहुंच जाना है। सो मैने साईकिल आगे बढ़ा ली। गीला होते होते घर तक पहूंचा जो लगभग आघे घंटे की दूरी पर था। लेकिन यह क्या?! यहां तो बारिश की बुंद भी नही गिरी थी, रोड सारे सुखे थे और सुरज भी चमक रहा था! रस्ते में लोग मुझे चोंक कर देख रहे थे, मै पुरी तरह पानी में तर था! मेरे घर तरफ उस दिन बारिश हुई ही नही और मै असमंजस मे बार बार आकाश की और देखता रहा था!
मै पहली कक्षा में पढ़ता था। शनिवार की सुबह सुबह सब बच्चों को स्कुल के बाहर ले जा कर लाईन में खडा कर दिया गया था। मुझे हर बार की तरह कुछ समझ नहीं आ रहा था की क्या हो रहा है। एक से सात कक्षा के सभी छात्रों को स्कुल के बाहर एक कतार में चलने की सुचना दे कर प्रिन्सीपल साहब स्कुल के पीछे की तरफ जाने वाले रास्ते पर चल दिए। मैं डर के अपने किसी दोस्त को पुछ रहा था की क्या होने वाला है.... हमारी बटालियन धीरे धीरे आगे चल रही थी। हमने स्कुल के थोडे पीछे जा कर देखा तो एक विशाल मेदान था....जिसके दुसरे छोर तक नज़र भी नहीं पहूंचती थी! दरअसल बात यह थी वह ग्राउन्ड एसआरपी का था। शायद कीसी की दरखास्त पर हम बच्चों को वहां खेलने की ईजाज़त मील गई थी। हम एक से सात कक्षा के बच्चों को वहां खडा कर के थोडी सुचनाएं देने के बाद हमे खेलने को छोड दिया! यह हमारा सब से बडा उपहार था। शनिवार को स्कुल में पुरे पांच पिरियड होते थे...हम सिर्फ खेलते ही रहे....खेलते ही रहे! मेरे मन में एक और खुशी/बेताबी बढ़ रही थी। कल ईतवार जो था! सातवीं कक्षा में अचानक हम दोस्तो ने हररोज रिसेस में वही पुराने ग्राउन्ड में जाने का सोचा। लगभग एक माह तक हम रोज मस्ती, खेलकुद से दुर कुदरती वातावरण का आनंद लेते थे....उन दिनो मेरे लंचबोक्स में क्या होता था पता है?
सातवी कक्षा के बाद स्कूल का समय १२ बजे से ५.३० का होने वाला था.....सुना था की दो रिसेस मीलने वाली है, बडी रिसेस में कुछ बच्चे घर भाग जाते है! बहोत सारे फ्री पिरियड होते है और आप क्लास में सो भी सकते हो! ४-५ कक्षा में कुछ एसे भी दिन थे जब मुझे स्कूल वाकई अच्छा लगने लगा था! में सोचता था कि 'बचपन' मे मै कितना पागल था क्युं की २-३ कक्षा में मुझे स्कुल जाना अच्छा ही नहि लगता था। लेकिन अब यहां मेरे दोस्त बनने लगे थे। स्कूल १२ बजे छुट जाया करता था। अब मै पहली बेन्च पर बेठने के बावजुद सबसे आखिर में क्लास से नीकलता था। शायद ईस लिए की खाली क्लास को देखना मुझे अच्छा लगता था। कभी कभी वह घर जैसा दिखता था। कुछ एसा ही होता था मेरा क्लास रुम...बस उस वक्त एसी प्लास्टिक की कुर्सीयां नहि होती थी!
हर एक बैंच की अपनी एक कहानी होती होगी । हर एक बच्चा अपनी कोई न कोई निशानी बैंच पर छोड ही जाता है। बैंच पर अपना नाम खुरदना, या बोलपेन से मोटे मोटे अक्षरों से लिख देना। कोई बच्चा मेरी तरहा तबले की थाप दे कर ज़ोरो से गीत भी गाता होगा। क्या बैंच को यह सब पसंद होगा? फिर स्कुल में दिवाली के समय कुछ दोस्त छुपा कर एसे फोटो वाले ग्रीटींग कार्ड लाने लगे थे! अगर आपको चवन्नी में अमिताभ या माधुरी मील सकती हो तो क्या आप दिवाने नही हो जाओगे? उन दिनो मेगेझीन तो हर घर में होते नही थे, ले दे कर एक दिन समाचार पत्रों मे बोलिवुड की पुर्ति आती होगी। अखबार भी रोज़ थोडे ही मंगवाया जाता था!
 
 
 
हम तो पोस्टकार्ड साईज रंगीन फोटो देख कर दंग रह गये थे। फिर जो आपको वह चवन्नीयों वाला किस्सा सुनाया था न? उन से देढ रुपये जमा कर मैने ६ ग्रीटींग कार्ड्स खरीदे! उन ६ कार्ड्स में एक तो अमिताभ जी का था। एक नये एक्शन हीरो अजय देवगन का था। बाकी चार खुबसुरत फुलो के थे....जी नही सही में फुलो वाले कार्ड्स थे| कार्ड में सिलवटें न हो जाए इस लिए एक नोटबुक में उन्हे रख दिया था। दो चार दिन तो सब को कार्ड दिखाता रहा, लेकिन एक दीन रीसेस टाईम में किसी एक लडकी ने वह कार्ड्स ले कर सहेलींयो को दे दिए। मेरे क्लास में वापस आने पर वे सब मुझे कार्ड दिखा कर चिढ़ाने लगी। मै हरएक कार्ड उनसे छीन लाया....लेकिन सब में सिलवटें पड चूकी थे!
 
 
स्कूल मे हम बच्चों की जो बातें होती थी...क्या बताउं। यहां-वहां, ईधर-उधर, दुनिया भर की बातें! लेकिन उनमें से आधी बाते भी हमारे काम की नही होती थी। बाकी आधी जो काम की होती थी उनमें भी कोई तुक वगेरह नही हुआ करता था! लेकिन बातें करने का मज़ा ही कुछ और था। यह ओर हाल है की आज लोग मुझे कहते है तुम बहुत कम बोलते हो!
 
 
क्लास में कभी कभी नई नई चीजें भी आती रहती थी, जिनमें पेन सबसे ज्यादा चर्चामें रहता था । चोथी कक्षा तक तो हम पेन्सिल का ही उपयोग करते थे। बार बार उसे छीलने के बहाने क्लासरुम के बाहर निकलते थे! कुछ एसे बच्चे भी थे जो शार्पनर की बजाए ब्लेड का उपयोग करते थे। मुझे तो उंगली कटने का डर लगता था लेकिन मेरा शार्पनर बार-बार गुम होजाने के कारण मै भी ब्लेड का ईस्तमाल करने लगा था।
 
 
पांचवी कक्षा की पहले या दुसरे ही दिन हमारी सबसे खतरनाक शिक्षिका ने (जो ईग्लिश पढ़ाया करती थी) एलान किया की कल से आप अपना पेन ले कर के आओगे। वैसे हमे तो पता ही था की पांचवी कक्षा में, ईग्लिश विषय में, आपको पेन से ही लिखना पड़ता है। लेकिन फिर भी....मुझे लगा कि मै बहुत बड़ा हो गया हुं। पापा की तरह मै अब पेन से लिखुंगा! यह बहूत बड़ी बात थी मेरे लिए! पेन में उन दिनों आज की तरह ज्यादा वेराईटीझ नहीं हुआ करती थी। ओप्शन जो उपल्बध होते थे...एक रूपयेवाली या ज्यादा से ज्यादा दो रुपएवाली। सादी या नुकीला पोईंट। बस। ईतना ही। अगर रीफील खत्म हो जाए तो बाकाईदा नई रीफील ली जाती थी। ये नही के रीफील खतम तो नया पेन। हां एसा हो सकता था की आपको क्लास में या स्कुल के ग्राउन्ड से कीसीका गीरा हुआ पेन मिल जाए। जब आप नए पेन से या उस मिले हुए पेन से लिखना शुरू करो....तुरंत बाजुवाल मित्र आपको पुछता भी था (सभी एक दुसरे के पेन के बारे में जानते ही थे।) की..."नया पेन लाया? दिखा दिखा!" मतलब के कोन से मित्र के पास कोन सा पेन है यह सभी को पता होता था। पेन की सबकी अपनी अपनी मनपसंद ब्रान्ड हुआ करती थी। स्टीक मतलब पुष्पा, रेनोल्ड मतलब तेजल। कभी कभी पापा की ओफिस में पेन दिए जाते तो वह पेन मुझे देते। लेकिन वह पेन मुझे पसंद ही नही था...बिना ढक्कन वाला मोटा सा पेन। मैने पापा के पुराने पेन को काट कर एक एसा पेन बनाया था जीससे लिखा भी जा सकता था और, पीछे फुंक मारने से सीटी बजती थी! मैने अपने एक पुराने खिलौने की सीटी उसमें डाल दी थी! आठवी कक्षा में एक वैशाली नाम की लड़की एक पैन लाई थी, उससे लिखने कागज़ से खुश्बु आती थी! उस पेन का आकार गोल सिलिन्डर नही लेकिन चोकोर सिलिन्डर था। सफेद, लाल, हरा, गुलाबी, सायन जैसे मनमोही देशी-विदेशी रंगो में यह पेन उपलब्ध था। किंमत थोडी सी ज्यादा थी - पांच रुपये। छठी कक्षा मैं तो एसे पेश आते थे मानो हम बारहवीं कक्षा में आ गए हो, या उतने ही मेच्योर हो गए हो। झगड़े भी बढ़ गए थे। मुझे जो लगता था कि पुरा क्लास मेरे साथ है, वह अब गलत साबित हो रहा था। खेल-कुद, हाजरजवाबी, कपडेलत्ते, ग्रूप और शेखी मारने वाली बातों में मै पीछे रह गया था। मेरा अब तक जो पढ़ाई में अव्व्ल रहने का रेकोर्ड था वह तुट चुका था। पिछले साल मेरा पांचवा नंबर आया था। ईस साल मेरा लड़कीयों वाला ग्रूप भी तुट चुका था। सो मै पुरा ध्यान पढाई में लगा रहा था। अपने बचपन और पुराने दिन एसे याद करता था जैसे में अब कर रहा हुं! ईस बात से अंजान की ईस साल की तीनों परीक्षा में मेरा अव्व्ल नंबर आनेवाला था और मुझे सर्टिफीकेट भी मिलनेवाला था! ईसका मतलब यह नहीं की मैं बहुत ही ज्यादा होशियारचंद हुं। बल्कि मेरे कोम्पेटीटर को अब पहला नंबर लाने की कोई पड़ी न थी। वे सब अपनी धुन में मस्त थे!
मुझे हाल ही में मिले उस स्कुलमेट का जिसने मुझे यह 'प्लास्टिक बैग्स' की याद दिलवाई। यह बैग्स बुक्स निकालते वख्त आवाज़ बहुत करते थे। हम हंमेशा सर-मैडम को आवाज कर कर के चिढाते थे! कीतनी बार यह प्लास्टिक बैग्स ने धोका दिया है । फट के पुरी किताबें बिखेर दी है। अधिक वजन रखने से ईनके हैन्डल भी तुट जाते थे। लेकिन बरसात में यही सबसे ज्यादा भरोसेमंद रहे थे। बारिश के दिनों में स्कुल बैग्स में प्लास्टिक बैग रख कर उनमें किताबें रखी जाती थी। ८ वीं कक्षा से स्कूल बैग का खर्चा बच गया। उन दिनों कोलेस स्टुडन्ट सिर्फ एक नोट ले कर कोलेज में जाते थे। आप ९० के दशक की कोई फिल्म देख लो....अक्षय या आमिर की! सिर्फ एक नोट में सारे विषयों का समावेश हो जाता था! हालां की कुछ स्टुडन्ट्स प्लास्टिक बैग युझ करते थे। यही ट्रेन्ड था उस समय का। हम भी ८ वीं कक्षा से तरह तरह के प्लास्टिक बैग्स ले कर स्कूल जाने लगे। यह बेग एक-देढ महिने साथ निभाता था। स्कुल के ईस आठवीं क्लास के ख़तम हुए दायके ग़ुजर गए है! ईस दौरान दो-तीन दोस्त कभी-कभार मिल गए। बातें हुई। एक बात वे खास बोले...पुरानी बातें है, ईनमें अब क्या रखा है? तब हम छोटे थे और नासमज थे...वगैरह। सही है....अतीत को साथ ले कर कौन पागल जीता है भाई? लेकिन मेरे दिमाग में जैसे की कहा था की कुछ केमिलल रीकेशन का लोचा है! कुछ ना होते हुए भी वह दीन एसे महसुस होते है जैसे शाम को किसी सड़क पर पीछे छोड़ा हुआ कोई एसा चौराहा जहां थोड़ी सी रोशनी थी। सब कुछ भुल कर कुछ साल जिंदगी के जद्दोजहद में बीततें है। फिर कोई तराना, कोई खुश्बु, कोई त्यौहार या बरसात, फिर से पुरा स्कूल सामने ला कर रख देती है! यह पागलपन नहीं तो ओर क्या है?
उन दिनो विडीओ गेम आदि तो होते नही थे, ट्युशन का भी नामोनिशान नहीं था। स्कुल में जो पढ़ा वही साल भर बाद परीक्षा में लिखना पड़ता था। ईसलिए हमारे पास तो फालतु समय खुब हुआ करता था। आप खेल कुद् करके थक जाओ फिर भी दिन खत्म नही होता था! फिर रात को टीवी चालु कर के बैठ जाते थे। पांच-दस मिनट के बाद कोई प्रोग्राम दिखाई देता था, वरना युं ही झरमर झरमर बारीश सा स्क्रीन सब देखा करते थे। आस पास से महेमान भी वक्त गुज़ारने आ जाते थे, वरना हम कहीं चले जाते थे। समय बहुत था, जो धीरे धीरे गुज़रता था, अच्छा गुज़रता था!
यह मेरी अपनी सचीमुची की यादें है! यह मेरा सच है! आपको कैसा लगा यह पढ कर जरुर बताईगा और अपनी कोई पुरानी यादें हो तो जरुर साझा किजीएगा!


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Sunday, 22 May 2022

चटर-पटर


हमारा स्कूल का समय सुबह का हुआ करता था 9:30 या 10:00 बजे हमारा ब्रेक टाइम हुआ करता था। इस रिसेस के टाइम पर  हम लोग दोस्तों के साथ स्कूल के बाजू में रवि भैया की दुकान पर जमावड़ा कर देते थे। वहां से तरह-तरह की चीजें लेकर खाना या सिर्फ देखने जाना, यह हमारा रोज का कार्यक्रम हुआ करता था।

एक बच्चे के तौर पर यह स्कूल के पास की दुकान से ज्यादा आश्चर्यजनक सुपर मॉल और कोई नहीं है! उस समय में कुछ ठेले वाले और एक दो मौसी भी आती थी! चीनी बेर, बर्फ का गोला और दूसरी तरह तरह की चीजें मिलती थी।

लेकिन मैं अपनी चवन्नी रविभाई की दुकान पर ही खत्म कर देता था। क्योंकि मम्मी ने बाहर खाने का मना किया था!

वह जो ब्रेक होता था, वह मेरे लिए सबसे ज्यादा खूबसूरत समय हुआ करता था। वक्त - उससे ज्यादा फ्रेश मुझे कभी नहीं लगा। हां कभी-कभी होमवर्क का टेंशन रहता था या स्कूल में कभी डांट पड़ी होने की वजह से मूड खराब रहता था। फिर भी ब्रेक में मैं थोड़ी देर के लिए सब कुछ भूल जाता था।

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Saturday, 21 May 2022

दूसरी साइकिल

टोबू साइकिल के बाद मेरे पापा ने जो मुझे दो पहिए वाली साइकिल खरीद कर दी थी... उसे 'हीरो जेट'कहा जाता था। तो ऐसा नहीं था कि मुझे साइकिल स्टोर पर ले जाया गया था, बल्कि मेरे पापा खुद एक साईकिल लेकर के आए थे - जो साइज में अपनी बड़ीवाली साइकिल से थोड़ी छोटी थी। और वह डार्क ब्राउन कलर की थी। एक-दो सालों बाद मुझे पता चला कि यह एक लेडीस साइकिल है!!!

मैसेज अच्छा वैसे इसमें शर्माने जैसी कोई बात नहीं थी, क्योंकि मेरे स्कूल में मेरे क्लास में बहुत से बच्चे ऐसे ही साईकिल युज़ करते थे। यह साइकिल मैं स्कूल में ले जाने की हिम्मत नहीं कर पाया था क्योंकि मेरा कोई साथ ही नहीं था जो मेरे घर से स्कूल तक साइकिल पर जाता हो।

सातवीं कक्षा तक मैंने अपने एक दोस्त को पीछे बैठा कर डबल सवारी चलाना सीख लिया था। फिर मैं उसी दोस्त को बैठा कर पहली बार स्कूल में अपनी साइकिल ले जा पाया। भले उसको पीछे बिठाना पड़ा और डबल सवारी जाना पड़ा, लेकिन साइकिल को 'पहली बार' स्कूल में ले जाने की खुशी बहुत ज्यादा थी!

इस साइकिल से मैं कई बार गिरा था, और घुटनों में चोट लगी थी। कई बार इस पर मैंने अलग-अलग छोटे स्टीकर लगाएं  एक बार काले ऑयल पेंट से नाम भी लिखा। इसके लिए साइकिल का पंप भी मंगवाया और इसका पंचर बनाना भी सीख लिया!यह साइकिल में ज्यादा नहीं चला पाया  सातवीं से दसवीं की शुरूआत तक यह साइकिल स्कूल लेकर गया।

उसके बाद मैंने तीसरी साइकिल खरीदी जिसकी कहानी में आगे आपको सुना रहा हूं।

तीसरी साईकिल

पहली साइकिल


पहली साइकिल तो तीन पहियों वाली होती है ना? मेरे पास भी वैसी साइकिल थी, लेकिन वह पूरी तरह प्लास्टिक से बनी हुई। मैं जब 5 वर्ष का हुआ तब तक वह टूट चुकी थी। उसके दो-तीन साल तक मैं साइकिल चला नहीं पाया।
फिर घर से थोड़ी दूर एक परिवार ने भाड़े पर साइकिल देने का व्यवसाय शुरू किया। उन्होंने 5 से 6 छोटी दो पहिए वाली साइकिल भाड़े पर देना शुरू किया था। आधे घंटे के 50 पैसे और 1 घंटे का ₹1! मैं तो खुद को अमीरों में गिनता था, तो मैं 1 घंटे के लिए साइकिल लेता था!
मुझे साइकिल मांगने में शर्म आती थी। तो पापा को लेकर जाता था। ज्यादातर वहां पर राह देखनी पड़ती थी क्योंकि सारी साइकिल खत्म हो जाती थी। आधे घंटे के बाद मेरा नंबर आता था और पापा पीछे से साइकिल पकड़ते और मैं उनको दौडता रेहता। फिर एक बार मैंने पीछे मुड़ कर देखा तो पापा नहीं थे, और मैंने साइकिल चलाना सीख लिया था!
उसके बाद भी मैंने भाड़े से साइकिल चलाई क्योंकि खुद की साइकिल मुझे बहुत देर से मिली। तब मैं शायद पांचवी या छठवीं कक्षा में पढ़ता था। और मुझे कोई ज्यादा शौक भी नहीं था कि साइकिल लेकर स्कूल जाऊं, क्योंकि स्कूल में मुझे एसटी बस से जाना अच्छा लगता था! यह बस वाली कहानी मै आपको बाद में बताऊंगा।

इन भाड़े के साइकिल में कभी भी ब्रेक नहीं होते थे! अगर का साइकिल आधे घंटे के लिए नहीं है, तो डर रहता था कि समय आधे घंटे से अधिक ना हो जाए। नहीं तो 1 घंटे का किराया देना पड़ता था। इसलिए साइकिल 5 मिनट जल्दी ही दे दी जाती थी।
यह तो पहली साइकिल की बात जो मैंने सीखी थी लेकिन जो मुझे पापा ने खरीद कर दी उसी बातें करनी अभी बाकी है!
 

Saturday, 7 May 2022

बचपन की यादें



नमस्ते, आपका स्वागत है!
यहां मै कुछ अपने बारे में बताना चाहूंगा। बचपन से मेरी दुनिया बहोत सीमटी हुई है। हमारे वक्त में ईलेक्ट्रोनिग गेज़ेट्स, विडीओ गेम्स आदी बहोत कम हुआ करते थे....बिलकुल ना के बराबर। फिर जो बच्चे मेरे जैसे थे, जिनके ज्यादा दोस्त न हो या कम हो, वे अपना समय व्यतीत करने के लिए दूरदर्शन, कहानीयां, चित्रकारी आदी के 'व्यसनी' हुआ करते थे!
ईस तरह का 'टाईमपास' (टीवी को छोड के) बाकी बच्चो के लिए बहोत क्रिएटीव माना जाता है। कहेते है कि ईससे बच्चो की चीज़ो को समझने की शक्ति बढ़ती है। जो आगे बहोत काम लगती है!
हाला की अभी पीछले महिने अमेरीका से यह रिपोर्ट आई थी की मीकी माउस जैसे केरेक्टर्स, जिसमें प्राणी को ईन्सानो की तरह कपड़े पहने हुए और बाते करते हुए दीखाया जाता है....उससे बच्चो में मुर्खता बढ़ती है! यह मैने अब जाना.....जब मेरा पूरा बचपन चंपक जैसे मेगेझीन पढ़ते हुए बीता! अब मैं सोच रहा हुं की अगर मैने यह सब नहिं पढ़ा होता तो आज कोई बड़ा ईन्सान होता? कुछ यह भी मेरी आदत रही है...वक्त बेवक्त खो जाता हुं! खिडकी/बरामदे से बाहर झांकते रहेना, भींतो की पपडीयों में चहेरे देखना, छत या पंखे को ताड़ कर सोचते रहेना वगेरह मेरी बचपन की बिमारींया है! किताबों मे खोये रहेना, डायरीयों मे डुबे रहेना मेरा शौख रहा है। फिर भी....फिर भी कुछ खास याद नहीं है जो मैने कभी पढ़ा था। बस बच्चोंवाली कहानियां, मेगेझीन्स, कोमिक्स वगेरह। लेकिन वह कहानियां, मेगेझीन्स, कोमिक्स वगेरह उस खिडकी या बरामदे से कम नहीं थीं। मुझे वही जिंदगी, वही कुदरत, वही मौसम दिखते थे! समय कभी साथ नही देता....वह बह जाता है जब उसे थम जाना चाहीए था.....वह रुक जाता है जब उसे जल्दी गुज़र जाना चाहीए था! मेरा बचपन, मेरे प्यारे दिन वह कहां ले गया होगा? क्या वह भी मेरी उन किताबों की तरहा पीले पड गए होंगे? क्या उनसे भी वह पुराने सामान जैसी गंध आ रही होगी? या वह अभी भी रुक कर मेरी राह देख रहे होगें? बिलकुल वैसे ही जैसे पहेले थे! भीगे भीगे से...

आज बहोत कुछ बदल गया है! श्री कृष्ण ने यह क्युं कह दिया...परिवर्तन संसार का नियम है? अगर वे यह नही कहेते तो कितना अच्छा होता! यह जगनिर्माण का हेतु अभी तक मुझे समझ नहीं आ रहा है! यह जग आगे विध्वंश की ओर बढ़ता ही जा रहा है, वह भी बडे गर्व या कभी लगता है बडा अंजान बन कर! फिर भी अंदर कहीं एक आस तो होती है, शायद वह दिन वापस आयेंगे....जैसे नदी के नीर उल्टे बहते है! मुझे फिर से उस जगह, उस काल में संजो दिया जायेगा...वही पुराने लोगों के बीच जो अब बुढे से दिखते है! मै फिर से जीना चाहूंगा बिलकुल यही जिंदगी....दोबारा....ईसी तरह!

स्कूल की यादें

तीसरी कक्षा से स्कुल का मुख्य दरवाजा सामने ही पडता था! हमारी मेडम स्कुल की घंटी बजने की राह देखने को कहती थी, और हम बैग तैयार कर के बैठ जाते थे! मेरी बेन्च दरवाजे से सटी होने के कारण मै ईसी प्रकार भाग कर स्कुल से सबसे पहेले निकल पडता था! बाहर मेरे पापा को साईकल ले कर मेरी राह देखते हुए देख कर कितनी खुशी मिलती थी! मेरा घर मेईन रोड पर था...जहां दुर एक सरकारी स्कुल थी। शाम पांच बजे जब सब बच्चे छुट कर जाते तो कई लोग उन्हे बरामदे में खडे हो कर (चाय पीते पीते) उन्हे देखा करते। वे बच्चे भी खुब थे...जैसे कोई परेड चल रही हो, वे सब अपनी अपनी मस्ती मैं दोडते, भागते, चिल्लाते, बतियाते हुए चलते चलते घर जाते थे!

और हम सोचते रहेते की हम कितने अमीर है! हमारे पास तो अब साईकिल भी है! जब आठवीं तक आएंगे तब हम भी साईकल ले कर स्कुल जाया करेंगे.... क्या ख्वाब था! कितनी राह देखी गई थी! कुछ एसे बच्चे भी हुआ करते थे जिनका मक्सद सिर्फ और सिर्फ धमाल मचाना था। प्रायः मे जिन्हे बहादुर समझता रहा उनको रोते हुए देख कर अचंबित रह गया! हमारी स्कुल में फ्री पिरियड ज्यादा होते थे! या कभी मेडम को कुछ काम रहेता था....तो वह अपना काम करती थी। कुछ उनकी मुंहफट चमचीयां भी हुआ करती थी जो उनको कहती थी की दुसरे सर का होमवर्क बाकी है तो क्या वह हम कर सकते है? और एसे हमे फ्री पिरियड मिल जाते थे! मेरा होमवर्क ज्यादातर कंप्लीट होता था....और में एसे फ्री टाईम में यह करते हुए पाया जाता था!
मेरे हिसाब से हमे खुब सारा होमवर्क दिया जाता था जो कम से कम एक-देढ घंटा चला करता था। यह तो बच्चो के साथ सरासर अन्याय था! फिर जब शाम पांच बजे 'राजकुमार जी' खेलने को निकलते.... कंप्युटर तो बहोत दुर की बात है! हमारे स्कुल मे पंखे भी ठीक से नही चलते थे! दो पंखो में से एक तो बस यूं ही चमगादड़ की तरह लटके रहा करता था! सात दिन की सात अलग अलग प्रार्थनाएं माईक पर ७वीं कक्षा की लडकीयां गाती थी! घर के पास वाले कीसी कीसी दोस्त की एसी भी स्कुल थी जहां टाई पहेनी जाती थी। आज कल जैसे रंगबेरंगी युनिफोर्म चलन में है, वैसे तो हम सोच भी नही सकते थे! हमारे पास सफेस शर्ट और ब्लु चड्डी हुआ करती थी सभी दोस्तो की ब्लु चड्डी के भी पचास शेड्स हुआ करते थे....ध फीफ्टी शेड्स ओफ ब्लु एक दोर एसा भी था...जब आस पडोस तक खबर पहुंच गई थी की मैं गोपीयो से घिरा रहेता हुं....सिर्फ मुझे ही पता था की में कितना तन्हा हुं...
उन दिनो मैने सोच लिया था की २५-५० पैसे हफ्ते में खर्च नही किए तो क्या किया? अपनी कीसी नोटबुक में चवन्नी, पचास पैसे के सिक्के ले जाया करता था। जो चाहे चोकलेट, स्टीकर, रीफिल वगेरह....खरिद लिया! क्या एश थी!
एक बार एसा भी हुआ था...स्कुल छुट चुका था। दो पहर साडे बारह-एक का समय होगा। हम सब एक पुल के नीचे खडे थे, जोरो की बारिश हो रही थी। आज मैने सोच लिया के भले गीला हो जाउं लेकिन घर जल्दी पहुंच जाना है। सो मैने साईकिल आगे बढ़ा ली। गीला होते होते घर तक पहूंचा जो लगभग आघे घंटे की दूरी पर था। लेकिन यह क्या?! यहां तो बारिश की बुंद भी नही गिरी थी, रोड सारे सुखे थे और सुरज भी चमक रहा था! रस्ते में लोग मुझे चोंक कर देख रहे थे, मै पुरी तरह पानी में तर था! मेरे घर तरफ उस दिन बारिश हुई ही नही और मै असमंजस मे बार बार आकाश की और देखता रहा था!
मै पहली कक्षा में पढ़ता था। शनिवार की सुबह सुबह सब बच्चों को स्कुल के बाहर ले जा कर लाईन में खडा कर दिया गया था। मुझे हर बार की तरह कुछ समझ नहीं आ रहा था की क्या हो रहा है। एक से सात कक्षा के सभी छात्रों को स्कुल के बाहर एक कतार में चलने की सुचना दे कर प्रिन्सीपल साहब स्कुल के पीछे की तरफ जाने वाले रास्ते पर चल दिए। मैं डर के अपने किसी दोस्त को पुछ रहा था की क्या होने वाला है.... हमारी बटालियन धीरे धीरे आगे चल रही थी। हमने स्कुल के थोडे पीछे जा कर देखा तो एक विशाल मेदान था....जिसके दुसरे छोर तक नज़र भी नहीं पहूंचती थी! दरअसल बात यह थी वह ग्राउन्ड एसआरपी का था। शायद कीसी की दरखास्त पर हम बच्चों को वहां खेलने की ईजाज़त मील गई थी। हम एक से सात कक्षा के बच्चों को वहां खडा कर के थोडी सुचनाएं देने के बाद हमे खेलने को छोड दिया! यह हमारा सब से बडा उपहार था। शनिवार को स्कुल में पुरे पांच पिरियड होते थे...हम सिर्फ खेलते ही रहे....खेलते ही रहे! मेरे मन में एक और खुशी/बेताबी बढ़ रही थी। कल ईतवार जो था! सातवीं कक्षा में अचानक हम दोस्तो ने हररोज रिसेस में वही पुराने ग्राउन्ड में जाने का सोचा। लगभग एक माह तक हम रोज मस्ती, खेलकुद से दुर कुदरती वातावरण का आनंद लेते थे....उन दिनो मेरे लंचबोक्स में क्या होता था पता है?
सातवी कक्षा के बाद स्कूल का समय १२ बजे से ५.३० का होने वाला था.....सुना था की दो रिसेस मीलने वाली है, बडी रिसेस में कुछ बच्चे घर भाग जाते है! बहोत सारे फ्री पिरियड होते है और आप क्लास में सो भी सकते हो! ४-५ कक्षा में कुछ एसे भी दिन थे जब मुझे स्कूल वाकई अच्छा लगने लगा था! में सोचता था कि 'बचपन' मे मै कितना पागल था क्युं की २-३ कक्षा में मुझे स्कुल जाना अच्छा ही नहि लगता था। लेकिन अब यहां मेरे दोस्त बनने लगे थे। स्कूल १२ बजे छुट जाया करता था। अब मै पहली बेन्च पर बेठने के बावजुद सबसे आखिर में क्लास से नीकलता था। शायद ईस लिए की खाली क्लास को देखना मुझे अच्छा लगता था। कभी कभी वह घर जैसा दिखता था। कुछ एसा ही होता था मेरा क्लास रुम...बस उस वक्त एसी प्लास्टिक की कुर्सीयां नहि होती थी!
हर एक बैंच की अपनी एक कहानी होती होगी । हर एक बच्चा अपनी कोई न कोई निशानी बैंच पर छोड ही जाता है। बैंच पर अपना नाम खुरदना, या बोलपेन से मोटे मोटे अक्षरों से लिख देना। कोई बच्चा मेरी तरहा तबले की थाप दे कर ज़ोरो से गीत भी गाता होगा। क्या बैंच को यह सब पसंद होगा? फिर स्कुल में दिवाली के समय कुछ दोस्त छुपा कर एसे फोटो वाले ग्रीटींग कार्ड लाने लगे थे! अगर आपको चवन्नी में अमिताभ या माधुरी मील सकती हो तो क्या आप दिवाने नही हो जाओगे? उन दिनो मेगेझीन तो हर घर में होते नही थे, ले दे कर एक दिन समाचार पत्रों मे बोलिवुड की पुर्ति आती होगी। अखबार भी रोज़ थोडे ही मंगवाया जाता था!
हम तो पोस्टकार्ड साईज रंगीन फोटो देख कर दंग रह गये थे। फिर जो आपको वह चवन्नीयों वाला किस्सा सुनाया था न? उन से देढ रुपये जमा कर मैने ६ ग्रीटींग कार्ड्स खरीदे! उन ६ कार्ड्स में एक तो अमिताभ जी का था। एक नये एक्शन हीरो अजय देवगन का था। बाकी चार खुबसुरत फुलो के थे....जी नही सही में फुलो वाले कार्ड्स थे| कार्ड में सिलवटें न हो जाए इस लिए एक नोटबुक में उन्हे रख दिया था। दो चार दिन तो सब को कार्ड दिखाता रहा, लेकिन एक दीन रीसेस टाईम में किसी एक लडकी ने वह कार्ड्स ले कर सहेलींयो को दे दिए। मेरे क्लास में वापस आने पर वे सब मुझे कार्ड दिखा कर चिढ़ाने लगी। मै हरएक कार्ड उनसे छीन लाया....लेकिन सब में सिलवटें पड चूकी थे! स्कूल मे हम बच्चों की जो बातें होती थी...क्या बताउं। यहां-वहां, ईधर-उधर, दुनिया भर की बातें! लेकिन उनमें से आधी बाते भी हमारे काम की नही होती थी। बाकी आधी जो काम की होती थी उनमें भी कोई तुक वगेरह नही हुआ करता था! लेकिन बातें करने का मज़ा ही कुछ और था। यह ओर हाल है की आज लोग मुझे कहते है तुम बहुत कम बोलते हो! क्लास में कभी कभी नई नई चीजें भी आती रहती थी, जिनमें पेन सबसे ज्यादा चर्चामें रहता था । चोथी कक्षा तक तो हम पेन्सिल का ही उपयोग करते थे। बार बार उसे छीलने के बहाने क्लासरुम के बाहर निकलते थे! कुछ एसे बच्चे भी थे जो शार्पनर की बजाए ब्लेड का उपयोग करते थे। मुझे तो उंगली कटने का डर लगता था लेकिन मेरा शार्पनर बार-बार गुम होजाने के कारण मै भी ब्लेड का ईस्तमाल करने लगा था। पांचवी कक्षा की पहले या दुसरे ही दिन हमारी सबसे खतरनाक शिक्षिका ने (जो ईग्लिश पढ़ाया करती थी) एलान किया की कल से आप अपना पेन ले कर के आओगे। वैसे हमे तो पता ही था की पांचवी कक्षा में, ईग्लिश विषय में, आपको पेन से ही लिखना पड़ता है। लेकिन फिर भी....मुझे लगा कि मै बहुत बड़ा हो गया हुं। पापा की तरह मै अब पेन से लिखुंगा! यह बहूत बड़ी बात थी मेरे लिए! पेन में उन दिनों आज की तरह ज्यादा वेराईटीझ नहीं हुआ करती थी। ओप्शन जो उपल्बध होते थे...एक रूपयेवाली या ज्यादा से ज्यादा दो रुपएवाली। सादी या नुकीला पोईंट। बस। ईतना ही। अगर रीफील खत्म हो जाए तो बाकाईदा नई रीफील ली जाती थी। ये नही के रीफील खतम तो नया पेन। हां एसा हो सकता था की आपको क्लास में या स्कुल के ग्राउन्ड से कीसीका गीरा हुआ पेन मिल जाए। जब आप नए पेन से या उस मिले हुए पेन से लिखना शुरू करो....तुरंत बाजुवाल मित्र आपको पुछता भी था (सभी एक दुसरे के पेन के बारे में जानते ही थे।) की..."नया पेन लाया? दिखा दिखा!" मतलब के कोन से मित्र के पास कोन सा पेन है यह सभी को पता होता था। पेन की सबकी अपनी अपनी मनपसंद ब्रान्ड हुआ करती थी। स्टीक मतलब पुष्पा, रेनोल्ड मतलब तेजल। कभी कभी पापा की ओफिस में पेन दिए जाते तो वह पेन मुझे देते। लेकिन वह पेन मुझे पसंद ही नही था...बिना ढक्कन वाला मोटा सा पेन। मैने पापा के पुराने पेन को काट कर एक एसा पेन बनाया था जीससे लिखा भी जा सकता था और, पीछे फुंक मारने से सीटी बजती थी! मैने अपने एक पुराने खिलौने की सीटी उसमें डाल दी थी! आठवी कक्षा में एक वैशाली नाम की लड़की एक पैन लाई थी, उससे लिखने कागज़ से खुश्बु आती थी! उस पेन का आकार गोल सिलिन्डर नही लेकिन चोकोर सिलिन्डर था। सफेद, लाल, हरा, गुलाबी, सायन जैसे मनमोही देशी-विदेशी रंगो में यह पेन उपलब्ध था। किंमत थोडी सी ज्यादा थी - पांच रुपये। छठी कक्षा मैं तो एसे पेश आते थे मानो हम बारहवीं कक्षा में आ गए हो, या उतने ही मेच्योर हो गए हो। झगड़े भी बढ़ गए थे। मुझे जो लगता था कि पुरा क्लास मेरे साथ है, वह अब गलत साबित हो रहा था। खेल-कुद, हाजरजवाबी, कपडेलत्ते, ग्रूप और शेखी मारने वाली बातों में मै पीछे रह गया था। मेरा अब तक जो पढ़ाई में अव्व्ल रहने का रेकोर्ड था वह तुट चुका था। पिछले साल मेरा पांचवा नंबर आया था। ईस साल मेरा लड़कीयों वाला ग्रूप भी तुट चुका था। सो मै पुरा ध्यान पढाई में लगा रहा था। अपने बचपन और पुराने दिन एसे याद करता था जैसे में अब कर रहा हुं! ईस बात से अंजान की ईस साल की तीनों परीक्षा में मेरा अव्व्ल नंबर आनेवाला था और मुझे सर्टिफीकेट भी मिलनेवाला था! ईसका मतलब यह नहीं की मैं बहुत ही ज्यादा होशियारचंद हुं। बल्कि मेरे कोम्पेटीटर को अब पहला नंबर लाने की कोई पड़ी न थी। वे सब अपनी धुन में मस्त थे!
मुझे हाल ही में मिले उस स्कुलमेट का जिसने मुझे यह 'प्लास्टिक बैग्स' की याद दिलवाई। यह बैग्स बुक्स निकालते वख्त आवाज़ बहुत करते थे। हम हंमेशा सर-मैडम को आवाज कर कर के चिढाते थे! कीतनी बार यह प्लास्टिक बैग्स ने धोका दिया है । फट के पुरी किताबें बिखेर दी है। अधिक वजन रखने से ईनके हैन्डल भी तुट जाते थे। लेकिन बरसात में यही सबसे ज्यादा भरोसेमंद रहे थे। बारिश के दिनों में स्कुल बैग्स में प्लास्टिक बैग रख कर उनमें किताबें रखी जाती थी। ८ वीं कक्षा से स्कूल बैग का खर्चा बच गया। उन दिनों कोलेस स्टुडन्ट सिर्फ एक नोट ले कर कोलेज में जाते थे। आप ९० के दशक की कोई फिल्म देख लो....अक्षय या आमिर की! सिर्फ एक नोट में सारे विषयों का समावेश हो जाता था! हालां की कुछ स्टुडन्ट्स प्लास्टिक बैग युझ करते थे। यही ट्रेन्ड था उस समय का। हम भी ८ वीं कक्षा से तरह तरह के प्लास्टिक बैग्स ले कर स्कूल जाने लगे। यह बेग एक-देढ महिने साथ निभाता था। स्कुल के ईस आठवीं क्लास के ख़तम हुए दायके ग़ुजर गए है! ईस दौरान दो-तीन दोस्त कभी-कभार मिल गए। बातें हुई। एक बात वे खास बोले...पुरानी बातें है, ईनमें अब क्या रखा है? तब हम छोटे थे और नासमज थे...वगैरह। सही है....अतीत को साथ ले कर कौन पागल जीता है भाई? लेकिन मेरे दिमाग में जैसे की कहा था की कुछ केमिलल रीकेशन का लोचा है! कुछ ना होते हुए भी वह दीन एसे महसुस होते है जैसे शाम को किसी सड़क पर पीछे छोड़ा हुआ कोई एसा चौराहा जहां थोड़ी सी रोशनी थी। सब कुछ भुल कर कुछ साल जिंदगी के जद्दोजहद में बीततें है। फिर कोई तराना, कोई खुश्बु, कोई त्यौहार या बरसात, फिर से पुरा स्कूल सामने ला कर रख देती है! यह पागलपन नहीं तो ओर क्या है?
उन दिनो विडीओ गेम आदि तो होते नही थे, ट्युशन का भी नामोनिशान नहीं था। स्कुल में जो पढ़ा वही साल भर बाद परीक्षा में लिखना पड़ता था। ईसलिए हमारे पास तो फालतु समय खुब हुआ करता था। आप खेल कुद् करके थक जाओ फिर भी दिन खत्म नही होता था! फिर रात को टीवी चालु कर के बैठ जाते थे। पांच-दस मिनट के बाद कोई प्रोग्राम दिखाई देता था, वरना युं ही झरमर झरमर बारीश सा स्क्रीन सब देखा करते थे। आस पास से महेमान भी वक्त गुज़ारने आ जाते थे, वरना हम कहीं चले जाते थे। समय बहुत था, जो धीरे धीरे गुज़रता था, अच्छा गुज़रता था!
यह मेरी अपनी सचीमुची की यादें है! यह मेरा सच है! आपको कैसा लगा यह पढ कर जरुर बताईगा और अपनी कोई पुरानी यादें हो तो जरुर साझा किजीएगा!

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