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Thursday, 15 September 2022

बच्चों की फिल्में

1995-96 के बाद शनिवार ग्यारह या बारह बजे बच्चों के लिए फिल्में प्रदर्शित होती थी। ईनमें से कई फिल्में तो प्रादेशिक भाषा की होती थी, जो हिंदी डब होती थी। ईन्हीं दिनों कई अच्छी फिल्में देखने को मिली। कुछ फिल्मे जो मुज़े याद रह गई,वह यह थी।

त्रियात्रीः ईस फिल्म में तीन टीनएज लडके कुच नया करने की धून में साईकिल पर निकल पड़ते है। यह एक प्रवास होता है जो ये लोग कुछ समय में पुरा करना चाहते है। फिर रास्ते में ईन्हें अलग अलग अनुभव होतें है, जिनसे यह तीनो जींदगी के बारे में अच्छा सबक लेते है। वैसे यह फिल्म के दौरान बिजली चली गई थी और फिल्म पुरा होने तक वापस आई थी।

अलबर्टः Advetnures of Albert नाम की एक अंग्रेजी फिल्म डब कर के 'अलबर्ट के कारनामे' या कुछ एसे ही मिलते ज़ुलते नाम से टेलिकास्ट की गई थी। आलबर्ट एक शैतानी करनेवाला बच्चा था। उसे माँ-बाप घर पर कई बार अकेला छोड कर चले जाते और आलबर्ट कुच ना कुछ कारनामे करता रहता। ईस फिल्म में आलबर्ट की छोटी लवस्टोरी भी थी! बच्चों की फिल्म में मैने पहली बार एसा कुछ देखा था। लेकिन फिल्म बहुत कोमेडी और मज़ेदार थी।

मैं फिर आउंगाः अभयम 1991 नाम की मलियालम फिल्म हिंदी में 'मैं फिर आउंगा' नाम से दिखाई गई थी। यह फिल्म की स्टार्टींग ही ईतनी बढिया थी की मैं पुरी फिल्म देखे बिना नहीं रह पाया था। एक बच्चा, जो अपने दादाजी को बहुत प्यार और याद करता है... वह अपने स्कूल से परेशान था। वह एक दिन किसी तरह घर छोड़ कर गांव अपने दादाजी के पास निकल पडा। उसे पता भी नहीं मालूम था। लेकिन फिल्म के अंत तक वह दादाजी तक पहुंच ही जाता है। लेकिन ईस दौरान ईसे कई बुरे और अच्छे अनुभव का सामना करना पडता है।

सुपरनोवा 459: स्पेस से सुपरनोवा के साथ आई हुई कोई किंमती और अजीब चीज़ के पीछे एलियन और दुनिया के कई लोग पडे थे। लेकिन वह चीज़ और एलियन ईन तीन बच्चों के हाथ लग जातें है। एक साउथ ईंडियन फिल्म को हिंदी में डब तो किया था लेकिन ईस फिल्म के गानें भी हिंदी वर्झन में काटे नहीं गए थे। उन्हें भी हिंदी में डब कर के शामिल किया गया था। फिल्म ठीक ठाक थी लेकिन Sci-Fi टच होने के कारण देखने में मज़ा आया था।

सफेद हाथीः यह फिल्म बाकी फिल्मों से थोडी पुरानी ज़रुर थी। लेकिन फिल्म युनिक होने के कारण देखने में अच्छी लगी थी। एक हाथी को शिकारी और माफिया द्वारा शिकार होने से बचाने के लिए एक बच्चा दुनिया से भीड जाता है। वह हाथी को रंग लगा कर उसे बदल देता है, कुछ ईस प्रकार की कहानी है।
ईसी तरह की एक फिल्म और भी थी, जिसका नाम याद नहीं आ रहा। ईसमें हाथी की जगह मगरमच्छ एक बच्चे का मित्र बन जाता है। लेकिन गांव के लोग मगरमच्छ को मार देना चाहते है। बच्चा रोज़ मगरमच्छ को कुछ ना कुछ खिलाने को आता है और मगरमच्छ भी उसे पहचानता है। आखिरकार बच्चा एक छोटी नहर खोद कर उस पाने के रास्ते मगरमच्छ को भगा देता है, ताकि गांववाले उसे मार न डाले।

हेलोः यह फिल्म तो बेस्टेस्ट लगी थी! राजकुमार संतोषी ने ईस फिल्म में एक्टीग की है! बाकायदा एक पिता का रोल निभाया है। फिल्म 1996 में बनी थी और गर्मागर्म दूरदर्शन पर परोसी गई थी। ईसका डाईरेक्शन, संगीत, डाईलोग्स सब कुछ नेक्स्ट लेवल था। ईस पर मैणे एक विडीयो ही बना डाला था, जो युट्युब पर सर्च करने से मिल जाएगा। Pet lovers को यह फिल्म बहुत पसंद आएगी और जिन्हें Doggies पसंद नहीं... उन्हें भी यह फिल्म ज़रुर पस्म्द आएगी।

खास बात। बच्चों के लिए आज की डेट में भी अच्छा कोंटेंट नहीं बन रहा है, जो उन्हें जीवन के रोचक अनुभवो के बारे में कुछ सीख दे जाए। पेरेंट्स का यह फर्ज है की एसी फिल्मे, कहानीयां और किस्से बच्चों को ज़रुर सुनाए। आप भी यह फिल्में अपने जरुर देखे और दिखाए। युट्युब पर यह फिल्में मिल ही जाएंगी।

#ods #Doordarshan #दूरदर्शन #old_doordarshan_serials

Sunday, 7 August 2022

क्या बनोगे मुन्ना - दूरदर्शन

'क्या बनोगे मुन्ना' नाम से एक धारावाहिक आता था। जिसमें एक बच्चे के घरवाले उस पर पढाई का बहुत दबाव डालते और किसी अच्छी लाईन में भेजने के सपने देखते। ईस धारावाहीक में दिखाया गया बच्चा (यमन कौशिक) वही है जो छोटा जादूगर टेलीफिल्म में मुख्य कलाकार था।
जहां तक मुज़े याद है क्या बनोगे मुन्ना दोपहर को दिखाया था। फिर शायद रात के समय भी ईसका रीपीट टेलिकास्ट हुआ था।
 
ईसका टाईटल सोंग कुछ एसा था....




क्या बनोगे, क्या बनोगे, क्या बनोगे मुन्ना? - 2
मम्मी कहती बनो डॉक्टर, पापा कहते अफसर.
ईंन्जीनीयर बन जाओ भैया, बहना कहती अक्सर!
बच्चे के विकास में बोलो बच्चे का क्या हिस्सा?
(आखरी लाईन याद नही!)
 
ईस की कहानी अगर किसीको याद हो तो ज़रुर कोमेंट में बताए।
 
#kyabanogemunna #doordarshan #ods #old_doordarshan_serials

Tuesday, 2 August 2022

द ग्रेट एक्स्परीमेंट - दूरदर्शन सिरीयल


द ग्रेट एक्स्परीमेंट

दूरदर्शन पर २००० के बाद प्रसारित यह एक सायन्स फिक्शन धारावाहिक था। दोपहर को प्रसारित होनेवाले द ग्रेट एक्स्परीमेंट सिरीयल को देखने का एक अलग ही मज़ा था। हालां की यह स्पेस सीटी सिग्मा जैसा एक्शन पेक्ड नहीं था, फिर भी दुरदर्शन पर साई-फाई देखने का मज़ा बरकरार था।

यह कहानी आर्य नामक गेलेक्सी की है। जहां प्रोफेसर सत्येंदु बोस (विशाल शेंदे) दो बच्चे रीना (पामेला मुकर्जी) और राहुल (धनंजय मोटवानी) के साथ वायु 2050 नाम के यान में निकल पडे है। ईनके साथ ईनका एक रोबोट झिग्मोईड (राजेश जैस) भी है।

सन 2050, यानी की भविष्य में प्रुथ्वी पर टेक्नोलोजी हावी हो जाती है। प्रोफेसर ईन बच्चों को ले कर ईसलिए सफर पर निकलतें है ताकि बच्चों को प्रुथ्वी का महान ईतिहास बताया जा सके।

ईनके पास किसी भी ईन्सान को भुतकाल से बुलाने के लिए टाईमट्रावेल मशीन है। प्रोफेसर कई वैज्ञानिक और दुसरे महान शोधकर्ता ओं को एक एक करके बुलाते है और बच्चों से मिलवाते है। फिर वे उन लोगों से उनकी थियरी और प्रयोग के बारे में चर्चा करते और उनसे बहुत कुछ् सीख कर उन्हें फिर अपने समयकाल में विदा करते।

यही ईस धारावाहीक की मुख्य थीम थी। अंत में रोबोट झिग्मोईड उन्हें वही महेमान वैज्ञानिक का कोई छोटा सा प्रयोग वगैरह बच्चों को कर के दिखाता।

धारावाहीक़ का ईंट्रो म्युझिक बहुत अच्छा था और मुझे वह अच्छी तरह याद रह गया था। जब सिरियल प्रसारित होता, में टीवी का वोल्युम बहुत उंचा कर देता!

अगर आपने यह धारावाहीक़ देखा है, तो ईसके बारे में आगे और ज़रुर बताईए।

Tuesday, 5 July 2022

चित्रहार - दूरदर्शन

 


Chitrahar - Doordarshan
 
Filmy Songs, जिन्हें देखने का एक ही ज़रिया था, चित्रहार। लेकिन यह पहले एक ही दिन आता था - शुक्रवार को। उस दिन एक दो नए गाने और बाकी पुराने गाने देखने को मिलते।  कई बार एसा भी होता की एक ही गीत महीने में दो बार भी दिखाते। शायद लोग खत लिख कर फरमाईश करतें होंगे, एसा मुज़े लगता था। कई पुराने गाने एसे थे जो चित्रहार के कारण जरा जरा याद रह गए थे। Old songs को शुट अगर किसी गार्डन में किया होता था... मुझे लगता था की यह हमारे किसी शहर काही गार्डन है!
 
फिर अचानक साप्ताहीकी (Saptahiki) में दिखाया गया की चित्रहार अब बुधवार को भी आनेवाला है... बड़ों का तो पता नहीं, हम बच्चे स्कूल में डिस्कस कर के बहुत खुश हुए। जिन बेचारों को पता नहीं था, वे चोंके और मै डींगे हांकने लगा था! क्युं की हफ्ते में सिर्फ 6-7 गानों से क्या होता है! ठीक से याद नहीं लेकिन बुधवार को प्रसारित चित्रहार में अधिकत्तर नए गाने होते थे, शुक्रवार को पुराने। दो-दो बार चित्रहार का प्रसारित होना, डबल बोनस सा लगता था!

 
Rangoli - Doordarshan

कुछ समय बाद यह हुआ यह की, जैसे मैनें अपने स्कूली दोस्तों के सामने बुधवारवाले चित्रहार की डींगे हांकी थी... ठीक वैसे ही घर के पासवाले एक दोस्तने कहा की, "तुम्हें पता है रविवार को सुबह भी फिल्मी गाने आते है?" मैने ईनकार में सर हिलाया तो उसने बताया की एक नया प्रोग्राम शुरु हुआ है, जिसमें चित्रहार की तरह रविवार सुबह गाने दिखाए जाते है।
 
खुशी खुशी घरवालों को यह बात बताने के बाद रविवार को जब टीवी चालु कर के देखा, सचमुच! सचमुच फिल्मी गाने आ रहे थे! रंगोली का वह एपिसोड देख कर ईतनी खुशी मिली की क्या बताउं! क्युं की कभी कभी जब सुबह स्कूल जाने से पहले टीवी चालु कर के देखता तो उस में एसा कुछ होता ही नहीं था। सुबह में पहली बार फिल्मी गानें देखने का अवसर तो रंगोली ने ही दिया, जिससे रविवार के दिवस की बहुत शानदार शुरुआत होती थी!
 
खैर, अब तो एक क्लिक से दुनिया का कोई भी गाना देखा/सुना जा सकता है। यह भी कोई सुख है भला!!!
 
आगे पढे दुरदर्शन की और भी यादों के बारे में! शोले  ।  नटखट रानी बडी सयानी
 

Thursday, 30 June 2022

कच्चे रंग - दूरदर्शन

१९९७ या उसके बाद दूरदर्शन पर दोपहर एक नया धारावाहीक प्रसारित हुआ था। शायद उसका नाम 'कच्चे रंग' था। नाम मुज़े अच्छी तरह याद नहीं है, लेकिन फिल्म का टाईटल सोंग यही था.... क्च्चे रंग उतर जाएंगे, मौसम है गुज़र जाएंगे। जो गुलज़ार साहब द्वारा लिखीत था।

File:Gulzar.jpg - Wikimedia Commons

यह गाना फिर दो-तीन साल बाद सनसेट पोईंट नामक गुलज़ार जी के आल्बम में शामिल हुआ. कुछ बदलाव के सात। जो था, 'कच्चे रंग उतर जाने दो, मौसम है गुज़र जाने दो!' टीवी सीरियल और ओडीयो आलबम, दोनों में संगीत था विशाल भारद्वाज का। 

File:Vishal Bhardwaj 2017.jpg - Wikimedia Commons

सीरियल में दिखाया गया था की, एक बड़ी आलीशान हवेली या बंगला था।  जिसका मालिक के गुज़र जाने के बाद उनकी पत्नी अपनी दो-तीन बच्चॉं के साथ दुखी जीवन व्यतित कर रही थी। पैसो की ईंकम बंध हो जाने के बाद उनकी हालत खराब हो रही थी। उनसे कई लोग बंगला खरीदने की कोशिश करतें है। वह मां भी सोचती है की अगर बंगला बेच दिया जाए तो अच्छे पैसे मिल जाएंगे और बच्चीयों का जीवन संभल जाएगा।
 
बेहद उदास ईस धारावाहीक में हंसी / खुशी के द्रश्य बहुत कम थे। बेकग्राउंद संगीत बहुत ईमोशनल था और सिरीयल का ओवरओल फील बहुत अच्छा था। क्या आपने यह सीरियल देखा था?
अगर देखा हो तो ज़रुर कोमेंट कर के बताईए, जिस से कुछ मेरी भी यादें ताज़ा हो!
 
 

नटखट रानी बड़ी सयानी - दूरदर्शन


90s के दशक के दोपहर में बच्चों की एस सिरियल आई थी, 'नटखट रानी बड़ी सयानी'। कुछ लोगों ने यह फिल्म जरुर देखी होगी। ईस सिरियल में रानी नामकी लड़की दुसरे शहर से आती है या उसके माँ-बाप रानी का दाखिला बोर्डिंग स्कूल में कर देते है। वहां वह रानी को बिलकुल अच्छा नहीं लगता और काफी समय तक खुद को उस माहौल में ढाल नहीं पाती।

स्कूल में वह गुस्से से शैतानीयां करने लगती है। मन ही मन में दुखी रहनेवाली रानी सिनियर छात्राओसे झगडा भी कर लेती है। ईस तरह उसका एक ग़्रुप बन जाता है जो बाद में बहुत पोप्युलर हो जाता है और रानी को स्कूल अच्छा लगने लगता है!


वह उदास से चेहरे वाली लडकी एक क्लासमेट जैसी दिखने के कारण मुझे याद रह गई थी। मेरा भी स्कूल बदलने के कारण मैं उस सिरियल से और रानी के व्यवहार से पुर्णतः रिलेट कर पा रहा था। वह सिरियल मैने पुरी देखी थी।

ईन्टरनेट की सुविधा आने के बाद भी मैने वह सिरीयल के बारे में बहुत सर्च किया लेकिन कुछ मिल नहीं पाया। फिर एक बार नटखट रानी का टाईटल सोंग युट्युब पर अपलोड हुआ, जो देख कर बहुत अच्छा लगा।

फिर सालों बाद, किसी ने एक चौंकानेवाली (मेरे लिए) बात बताई की वह लड़की अब हैदराबाद की कलेक्टर बन गई है! फिर उन्हों ने वह कलेक्टर के फोटो भी शेर किए।  फिर उनका नाम भी पता चला - श्वेता मोहंती, IAS ।

 

 
हाला की उनके प्रोफाईल या बायो में ईस सीरियल का उल्लेख नहीं है, लेकिन नाम और चहेरा बिलकुल मेल खाता है। अगर आपने नटखट रानी बडी सयानी  देखी है तो आप क्या सोचतें है ईस के बारे में?
 
आगे पढें...

Friday, 24 June 2022

शोले - दूरदर्शन पर



केबल टीवी, वी.सी.आर. ना होनें के कारण कई बच्चों ने शोले फिल्म नहीं देखी थी। फिर जब 26 जनवरी 1996 को दूरदर्शन पर शोले फिल्म के प्रसारण की बात चली... सभी लोग बहुत खुश हो गए। यह बहोत से लोग का आंकडों का अंदाज़ा भी नहीं लगाया जा सकता।
 
उस दिन सालों बाद ठीक वैसे ही स्वयुंभु कर्फ्यु लग गया था जैसा रामायण के प्रसारण समय में होता था। दूरदर्शन पर यह पहली बार हुआ की किसी फिल्म के बीच में बहुत सारे विज्ञापन दिखाए गए हो।
 
फिल्म शुरु होने पहले कई टीवीवाले घरों में भीड़ जम गई थी। हालांकि, बहुत सारे घरो में अब टीवी आ चुके थे। फिर जब फिल्म शुरु हुई तो उसे देखने का वही आनंद आया जो, उस समय शोले फिल्म को थियेटर में देखने से मिला होगा।
 
फिल्म वैसे तो मल्टीस्टारर है और पुरी कहानी देखने लायक है, फिर भी सभी को ईंतज़ार तो गब्बरसिंह का था। लेकिन, एक बात एसी हुई जिससे गब्बरसिंह की एंट्री का पुरा मज़ा मारा गया। दूरदर्शन पर गब्बर की एंट्री के ठीक पहले ही Glunose D का पुराना गब्बरसिंह वाला एडवर्टाईझमेंट चला दिया गया। सब को लगा की यही गब्बर की एंट्री है, लेकिन वह विज्ञापन था।
 
ईस बात की चर्चा लोकल न्यूझपेपर में भी आई थी! दुरदर्शन की टीआरपी (या उस वक्त जो भी स्केल चलता हो) भी उस दिन टॉप पर चला गया था। लेकिन वह दिन नहीं भुला जा सकता जब दूरदर्शन पर ईतनी बड़ी फिल्म को दिखाया गया और करोडों लोगों ने वह फिल्म देखी।
 
दुसरे दिन स्कूल जा कर पता चला की एक-दो कमनसीब दोस्तों के घर उस दिन लाईट चली गई थी! कम से कम चार-पांच दिन तक फिल्म की बातें होती रही। बचपन से शोले के कई डाईलोग लोगों के मुंह से सुने थे। कई मैगेझींस में फोटो और आर्टिकल पढे थे। यह सब देख-पढ के शोले फिल्म देखने के लिए ईच्छा तो जाने कब से दबी पडी थी। लेकिन तब ना कैबल टीवी था और ना वी.सी.आर. कोई शोले फिल्म के लिए लाता था। उसके डाईलोग की ऑडीयो कैसेट भी बाज़ार में मिला करती थी। लेकिन दो कैसेट का वह सैट तो मध्यमवर्गीय बच्चे के लिए पाना नामुमकीन सा था, क्युं की अठन्नी में से चौकलेट और स्कुल में रिसेस का खर्चा भी तो बचाना होता था!
 
वैसे आपने यह फिल्म कब देखी थी? क्या मेरी तरह दूरदर्शन पर? अगर हां, तो ज़रुर बताईगा की आपका अनुभव कैसा रहा!
 

Thursday, 23 June 2022

थोडा सा रुमानी हो जाए


14 नवंबर 1992, शनिवार की शाम दूरदर्शन पर एक एसी फिल्म दिखाई थी, जिसका अर्थ मुझे तब जा कर समज आया... जब लगभग 2010 में जब ईस फिल्म की सीडी मेरे परममित्र ने मुझे भेंट में दी! देखिये ना, एक पंक्ति में कितने साल बित जातें है! मुझे एक प्लेटफोर्म चाहिए था जहां मन खोल कर ईस फिल्म के बारे में लिख सकुं।

आज २०२२, लगभग तीस सालों के बाद उसी फिल्म के बारे में, मै फिर से लिख रहा हुं! एसा नहीं है की पहले मैने ईस फिल्म के बारे में नहीं लिखा। बहुत से फोरम, सोशियल मिडीया, सवाल-जवाब के प्लेटफोर्म पर ईस फिल्म के बारे में मैने ढुंढा, लिखा और ईस फिल्म के बारे में सबको बताने का प्रयत्न किया।
ईस फिल्म का नाम है, 'थोडा सा रुमानी हो जाए'। मशहुर एक्टर अमोल पालेकरजी ने दूरदर्शन के साथ यह म्युझिकल फिल्म बनाई थी। म्युझिकल फिल्म का अर्थ है... कहीं भी-कभी भी संवाद गाने का रुप ले लेता हो।

यह फिल्म कई 4-5 फिल्मों पर आधारित है, जिनका क्रेडिट आखिर के आउट्रो टाईटल्स में दिया गया है।


 
पात्र परिचयः
कहानी की नायिका एक एसी लड़की है जिसकी शादी की उम्र बीती जा रही है। वह बिन माँ की लड़की 'बिन्नी', अपने पिता और दो भाएयों के साथ एक बहुत छोटे से शहर में रहती है। गर्मी का मौसम था और बारिश के कुछ आसार नहीं। बिन्नी अपने पिता और भाईयों की लाडली है। वे तीनों उसकी शादी की फिक्र करतें है। हालां कि, बिन्नी दिखने में साधारण है। अधिक गोरी नहीं, लड़कीयों जैसे नखरे नहीं। शायद, उसकी माँ होती तो उसका स्वभाव थोड़ा अलग हो सकता था।
 
 
बिन्नी के पिता खुद बहुत खुशमिजाज़ ईंसान है। वह अधिक फिक्र नहीं करते और बिन्नी की हर ईच्छा को मान देतें है। बिन्नी का छोटा भाई जिसका नाम 'बीम' है, वह अभी बच्चे से जवान हो रहा है। वह अपनी स्वतंत्रता चाहता है, और बड़ा दिखना चाहता है। लेकिन उसकी नादानी अभी जाने को है। ईन तीन पात्रों की आपस में एकदम एकदम बनती है।

बिन्नी के बड़े भैया, जो ईंजीनीयर भी है... वह घर में पैसे कमानेवाला ईंसान है। वही है जो घर को अपने कंट्रोल में रखना चाहता है। वह खुद को बहुत प्रेक्टीकल समजता है और बिलकुल एसे ही बातें भी करता है। वह बिन्नी को ले कर अपने पापा की तरह अधिक आशावादी नहीं है। वह सबको, वास्तविकता समझाना चाहता है, उसे स्वीकार करने को कहता रहता है।
 
कहानीः
बिन्नी की मुलाकात उस छोटे से शहेर के - नये मेयर से होती है। मेयर तलाकशुदा ईंसान है, धीर गंभीर विचार रखता है। जब बिन्नी के पापा और बीम की मुलाकात जब मेयर से होती है, उन्हें मेयर बहुत अच्छा ईंसान लगता है। वे सोचते है की  बिन्नी की शादी अगर मेयर से हो जाए...


लेकिन, मेयर शादी करना नहीं चाहता। बिन्नी अपने अकेलेपन से झूझ रही है। बीम भैया द्वारा अपने उपर हो रही सख्ती से परेशान है। बडे भैया सुखे की चिंता कर रहें है। बिन्नी के पिता अब कभी कभी बिन्नी की चिंता करने लगे है।
 

फिल्म  के मध्य हिस्से में एक और पात्र प्रविष्ट होता है। ईस पात्र के बारे में यहां उजागर करना ठीक नहीं रहेगा। हालांकि पोस्टर और कवर पर उसी को हीरो के तौर पर दिखाया जाता है। लेकिन मेरे विचार से ईस कहानी का कोई मुख्य पात्र नहीं है। बीम जैसा छोटा पात्र भी कहानी का महत्तम हिस्सा है। ईस तरह कहानी पुर्णतः सभी पात्रों और परिस्थितियो पर निर्भर है।
 
ईस बीच, भास्कर चंदावरकर द्वारा रचित कर्णप्रिय संगीत और गीत आतें है... जो कहानी के मुड को और प्रभावशाली बनातें है। एक शांत, गंभीर, अचानक हंसी की फुहार बरसानेवाली, आपको सुखे और बिन्नी की बीतती उम्र की चिंता देनेवाली यह फिल्म... आगे एसा मोड लेती है जो मै अच्छी तरह लिखना चाहता हुं। लेकिन यह फिल्म के साथ बेईमानी होगी!


लेकिन ईतना ज़रुर कहुंगा की, फिल्म के उस मोड़ पर ह्युमन बिहेवीयर की उस आदत को उजागर किया है... जहां कोई उम्मीद न होने पर लोग चमत्कार और जादु में कैसे विश्र्वास कर लेतें है! उस संवाद और परिस्थितियों का मिलन आप फिल्म के मध्य हिस्से में जरुर देखिए, बहुत मज़ेदार है!

यह फिल्म के बारे में पता चला की, यह फिल्म प्रदर्शित भी हुई थी और बुध्धीजीवी लोगों ने पसंद भी की थी। लेकिन एसी फिल्म जो मेन स्ट्रीम सिनेमा से अलग हो उसका प्रचलित या हीट हो पाना बहुत मुश्किल है। 1991 में बनी यह फिल्म 1993 में दुरदर्शन पर दिखाई गई ईसलिए उस वक्त सबको देखनी पडी होगी, एसा मै समजता हुं! दुरदर्शन पर ईस फिल्म के प्रसारण की तारीख ईस लिए ईतनी पक्की लिख पाया हुं, क्युं की बचपन में दुरदर्शन पर दिखानेवाली फिल्मों के नाम मुझे डायरी में नोट करने की आदत थी!
 
ईस फिल्म के पात्रों को किसी कॉलेज में ह्युमन बिहेवीयर के चेप्टर में शामिल किया गया है। सारे पात्रों की तटस्थता, एकदुसरे से मिल कर नीकल रहे प्रतिभाव वगैरह देखना बहुत रोमांचकारी है। सीधा सीधा एक सकारात्मक संदेश भी है, जो ईसके शीर्ष गीत में अच्छी तरह कहा गया है....
 
बादलों का नाम न हो, अंबर के गांव में।
जलता हो जंगल खुद, अपनी छांव में।
यही तो है मौसम (२)
आओ तुम और हम, बारिश के नग़्में गुनगुनाएं...
थोडा सा रुमानी हो जाए!
 
यही ईस फिल्म की मुख्य थीम / सीख है।  ईतनी तकलीफों में भी हमें उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए, तपती धुप में बारिश ना सही, बारिश के गीत तो गा ही सकतें है!

आशा है आप यह फिल्म ज़रुर देखेंगे। युट्युब पर फिल्म एक क्लिक में उपल्ब्ध है, और जिसे ढुंढने के लिए मेरे 6-7 साल गुज़र गए थे!



Saturday, 7 May 2022

बचपन की यादें



नमस्ते, आपका स्वागत है!
यहां मै कुछ अपने बारे में बताना चाहूंगा। बचपन से मेरी दुनिया बहोत सीमटी हुई है। हमारे वक्त में ईलेक्ट्रोनिग गेज़ेट्स, विडीओ गेम्स आदी बहोत कम हुआ करते थे....बिलकुल ना के बराबर। फिर जो बच्चे मेरे जैसे थे, जिनके ज्यादा दोस्त न हो या कम हो, वे अपना समय व्यतीत करने के लिए दूरदर्शन, कहानीयां, चित्रकारी आदी के 'व्यसनी' हुआ करते थे!
ईस तरह का 'टाईमपास' (टीवी को छोड के) बाकी बच्चो के लिए बहोत क्रिएटीव माना जाता है। कहेते है कि ईससे बच्चो की चीज़ो को समझने की शक्ति बढ़ती है। जो आगे बहोत काम लगती है!
हाला की अभी पीछले महिने अमेरीका से यह रिपोर्ट आई थी की मीकी माउस जैसे केरेक्टर्स, जिसमें प्राणी को ईन्सानो की तरह कपड़े पहने हुए और बाते करते हुए दीखाया जाता है....उससे बच्चो में मुर्खता बढ़ती है! यह मैने अब जाना.....जब मेरा पूरा बचपन चंपक जैसे मेगेझीन पढ़ते हुए बीता! अब मैं सोच रहा हुं की अगर मैने यह सब नहिं पढ़ा होता तो आज कोई बड़ा ईन्सान होता? कुछ यह भी मेरी आदत रही है...वक्त बेवक्त खो जाता हुं! खिडकी/बरामदे से बाहर झांकते रहेना, भींतो की पपडीयों में चहेरे देखना, छत या पंखे को ताड़ कर सोचते रहेना वगेरह मेरी बचपन की बिमारींया है! किताबों मे खोये रहेना, डायरीयों मे डुबे रहेना मेरा शौख रहा है। फिर भी....फिर भी कुछ खास याद नहीं है जो मैने कभी पढ़ा था। बस बच्चोंवाली कहानियां, मेगेझीन्स, कोमिक्स वगेरह। लेकिन वह कहानियां, मेगेझीन्स, कोमिक्स वगेरह उस खिडकी या बरामदे से कम नहीं थीं। मुझे वही जिंदगी, वही कुदरत, वही मौसम दिखते थे! समय कभी साथ नही देता....वह बह जाता है जब उसे थम जाना चाहीए था.....वह रुक जाता है जब उसे जल्दी गुज़र जाना चाहीए था! मेरा बचपन, मेरे प्यारे दिन वह कहां ले गया होगा? क्या वह भी मेरी उन किताबों की तरहा पीले पड गए होंगे? क्या उनसे भी वह पुराने सामान जैसी गंध आ रही होगी? या वह अभी भी रुक कर मेरी राह देख रहे होगें? बिलकुल वैसे ही जैसे पहेले थे! भीगे भीगे से...

आज बहोत कुछ बदल गया है! श्री कृष्ण ने यह क्युं कह दिया...परिवर्तन संसार का नियम है? अगर वे यह नही कहेते तो कितना अच्छा होता! यह जगनिर्माण का हेतु अभी तक मुझे समझ नहीं आ रहा है! यह जग आगे विध्वंश की ओर बढ़ता ही जा रहा है, वह भी बडे गर्व या कभी लगता है बडा अंजान बन कर! फिर भी अंदर कहीं एक आस तो होती है, शायद वह दिन वापस आयेंगे....जैसे नदी के नीर उल्टे बहते है! मुझे फिर से उस जगह, उस काल में संजो दिया जायेगा...वही पुराने लोगों के बीच जो अब बुढे से दिखते है! मै फिर से जीना चाहूंगा बिलकुल यही जिंदगी....दोबारा....ईसी तरह!

स्कूल की यादें

तीसरी कक्षा से स्कुल का मुख्य दरवाजा सामने ही पडता था! हमारी मेडम स्कुल की घंटी बजने की राह देखने को कहती थी, और हम बैग तैयार कर के बैठ जाते थे! मेरी बेन्च दरवाजे से सटी होने के कारण मै ईसी प्रकार भाग कर स्कुल से सबसे पहेले निकल पडता था! बाहर मेरे पापा को साईकल ले कर मेरी राह देखते हुए देख कर कितनी खुशी मिलती थी! मेरा घर मेईन रोड पर था...जहां दुर एक सरकारी स्कुल थी। शाम पांच बजे जब सब बच्चे छुट कर जाते तो कई लोग उन्हे बरामदे में खडे हो कर (चाय पीते पीते) उन्हे देखा करते। वे बच्चे भी खुब थे...जैसे कोई परेड चल रही हो, वे सब अपनी अपनी मस्ती मैं दोडते, भागते, चिल्लाते, बतियाते हुए चलते चलते घर जाते थे!

और हम सोचते रहेते की हम कितने अमीर है! हमारे पास तो अब साईकिल भी है! जब आठवीं तक आएंगे तब हम भी साईकल ले कर स्कुल जाया करेंगे.... क्या ख्वाब था! कितनी राह देखी गई थी! कुछ एसे बच्चे भी हुआ करते थे जिनका मक्सद सिर्फ और सिर्फ धमाल मचाना था। प्रायः मे जिन्हे बहादुर समझता रहा उनको रोते हुए देख कर अचंबित रह गया! हमारी स्कुल में फ्री पिरियड ज्यादा होते थे! या कभी मेडम को कुछ काम रहेता था....तो वह अपना काम करती थी। कुछ उनकी मुंहफट चमचीयां भी हुआ करती थी जो उनको कहती थी की दुसरे सर का होमवर्क बाकी है तो क्या वह हम कर सकते है? और एसे हमे फ्री पिरियड मिल जाते थे! मेरा होमवर्क ज्यादातर कंप्लीट होता था....और में एसे फ्री टाईम में यह करते हुए पाया जाता था!
मेरे हिसाब से हमे खुब सारा होमवर्क दिया जाता था जो कम से कम एक-देढ घंटा चला करता था। यह तो बच्चो के साथ सरासर अन्याय था! फिर जब शाम पांच बजे 'राजकुमार जी' खेलने को निकलते.... कंप्युटर तो बहोत दुर की बात है! हमारे स्कुल मे पंखे भी ठीक से नही चलते थे! दो पंखो में से एक तो बस यूं ही चमगादड़ की तरह लटके रहा करता था! सात दिन की सात अलग अलग प्रार्थनाएं माईक पर ७वीं कक्षा की लडकीयां गाती थी! घर के पास वाले कीसी कीसी दोस्त की एसी भी स्कुल थी जहां टाई पहेनी जाती थी। आज कल जैसे रंगबेरंगी युनिफोर्म चलन में है, वैसे तो हम सोच भी नही सकते थे! हमारे पास सफेस शर्ट और ब्लु चड्डी हुआ करती थी सभी दोस्तो की ब्लु चड्डी के भी पचास शेड्स हुआ करते थे....ध फीफ्टी शेड्स ओफ ब्लु एक दोर एसा भी था...जब आस पडोस तक खबर पहुंच गई थी की मैं गोपीयो से घिरा रहेता हुं....सिर्फ मुझे ही पता था की में कितना तन्हा हुं...
उन दिनो मैने सोच लिया था की २५-५० पैसे हफ्ते में खर्च नही किए तो क्या किया? अपनी कीसी नोटबुक में चवन्नी, पचास पैसे के सिक्के ले जाया करता था। जो चाहे चोकलेट, स्टीकर, रीफिल वगेरह....खरिद लिया! क्या एश थी!
एक बार एसा भी हुआ था...स्कुल छुट चुका था। दो पहर साडे बारह-एक का समय होगा। हम सब एक पुल के नीचे खडे थे, जोरो की बारिश हो रही थी। आज मैने सोच लिया के भले गीला हो जाउं लेकिन घर जल्दी पहुंच जाना है। सो मैने साईकिल आगे बढ़ा ली। गीला होते होते घर तक पहूंचा जो लगभग आघे घंटे की दूरी पर था। लेकिन यह क्या?! यहां तो बारिश की बुंद भी नही गिरी थी, रोड सारे सुखे थे और सुरज भी चमक रहा था! रस्ते में लोग मुझे चोंक कर देख रहे थे, मै पुरी तरह पानी में तर था! मेरे घर तरफ उस दिन बारिश हुई ही नही और मै असमंजस मे बार बार आकाश की और देखता रहा था!
मै पहली कक्षा में पढ़ता था। शनिवार की सुबह सुबह सब बच्चों को स्कुल के बाहर ले जा कर लाईन में खडा कर दिया गया था। मुझे हर बार की तरह कुछ समझ नहीं आ रहा था की क्या हो रहा है। एक से सात कक्षा के सभी छात्रों को स्कुल के बाहर एक कतार में चलने की सुचना दे कर प्रिन्सीपल साहब स्कुल के पीछे की तरफ जाने वाले रास्ते पर चल दिए। मैं डर के अपने किसी दोस्त को पुछ रहा था की क्या होने वाला है.... हमारी बटालियन धीरे धीरे आगे चल रही थी। हमने स्कुल के थोडे पीछे जा कर देखा तो एक विशाल मेदान था....जिसके दुसरे छोर तक नज़र भी नहीं पहूंचती थी! दरअसल बात यह थी वह ग्राउन्ड एसआरपी का था। शायद कीसी की दरखास्त पर हम बच्चों को वहां खेलने की ईजाज़त मील गई थी। हम एक से सात कक्षा के बच्चों को वहां खडा कर के थोडी सुचनाएं देने के बाद हमे खेलने को छोड दिया! यह हमारा सब से बडा उपहार था। शनिवार को स्कुल में पुरे पांच पिरियड होते थे...हम सिर्फ खेलते ही रहे....खेलते ही रहे! मेरे मन में एक और खुशी/बेताबी बढ़ रही थी। कल ईतवार जो था! सातवीं कक्षा में अचानक हम दोस्तो ने हररोज रिसेस में वही पुराने ग्राउन्ड में जाने का सोचा। लगभग एक माह तक हम रोज मस्ती, खेलकुद से दुर कुदरती वातावरण का आनंद लेते थे....उन दिनो मेरे लंचबोक्स में क्या होता था पता है?
सातवी कक्षा के बाद स्कूल का समय १२ बजे से ५.३० का होने वाला था.....सुना था की दो रिसेस मीलने वाली है, बडी रिसेस में कुछ बच्चे घर भाग जाते है! बहोत सारे फ्री पिरियड होते है और आप क्लास में सो भी सकते हो! ४-५ कक्षा में कुछ एसे भी दिन थे जब मुझे स्कूल वाकई अच्छा लगने लगा था! में सोचता था कि 'बचपन' मे मै कितना पागल था क्युं की २-३ कक्षा में मुझे स्कुल जाना अच्छा ही नहि लगता था। लेकिन अब यहां मेरे दोस्त बनने लगे थे। स्कूल १२ बजे छुट जाया करता था। अब मै पहली बेन्च पर बेठने के बावजुद सबसे आखिर में क्लास से नीकलता था। शायद ईस लिए की खाली क्लास को देखना मुझे अच्छा लगता था। कभी कभी वह घर जैसा दिखता था। कुछ एसा ही होता था मेरा क्लास रुम...बस उस वक्त एसी प्लास्टिक की कुर्सीयां नहि होती थी!
हर एक बैंच की अपनी एक कहानी होती होगी । हर एक बच्चा अपनी कोई न कोई निशानी बैंच पर छोड ही जाता है। बैंच पर अपना नाम खुरदना, या बोलपेन से मोटे मोटे अक्षरों से लिख देना। कोई बच्चा मेरी तरहा तबले की थाप दे कर ज़ोरो से गीत भी गाता होगा। क्या बैंच को यह सब पसंद होगा? फिर स्कुल में दिवाली के समय कुछ दोस्त छुपा कर एसे फोटो वाले ग्रीटींग कार्ड लाने लगे थे! अगर आपको चवन्नी में अमिताभ या माधुरी मील सकती हो तो क्या आप दिवाने नही हो जाओगे? उन दिनो मेगेझीन तो हर घर में होते नही थे, ले दे कर एक दिन समाचार पत्रों मे बोलिवुड की पुर्ति आती होगी। अखबार भी रोज़ थोडे ही मंगवाया जाता था!
हम तो पोस्टकार्ड साईज रंगीन फोटो देख कर दंग रह गये थे। फिर जो आपको वह चवन्नीयों वाला किस्सा सुनाया था न? उन से देढ रुपये जमा कर मैने ६ ग्रीटींग कार्ड्स खरीदे! उन ६ कार्ड्स में एक तो अमिताभ जी का था। एक नये एक्शन हीरो अजय देवगन का था। बाकी चार खुबसुरत फुलो के थे....जी नही सही में फुलो वाले कार्ड्स थे| कार्ड में सिलवटें न हो जाए इस लिए एक नोटबुक में उन्हे रख दिया था। दो चार दिन तो सब को कार्ड दिखाता रहा, लेकिन एक दीन रीसेस टाईम में किसी एक लडकी ने वह कार्ड्स ले कर सहेलींयो को दे दिए। मेरे क्लास में वापस आने पर वे सब मुझे कार्ड दिखा कर चिढ़ाने लगी। मै हरएक कार्ड उनसे छीन लाया....लेकिन सब में सिलवटें पड चूकी थे! स्कूल मे हम बच्चों की जो बातें होती थी...क्या बताउं। यहां-वहां, ईधर-उधर, दुनिया भर की बातें! लेकिन उनमें से आधी बाते भी हमारे काम की नही होती थी। बाकी आधी जो काम की होती थी उनमें भी कोई तुक वगेरह नही हुआ करता था! लेकिन बातें करने का मज़ा ही कुछ और था। यह ओर हाल है की आज लोग मुझे कहते है तुम बहुत कम बोलते हो! क्लास में कभी कभी नई नई चीजें भी आती रहती थी, जिनमें पेन सबसे ज्यादा चर्चामें रहता था । चोथी कक्षा तक तो हम पेन्सिल का ही उपयोग करते थे। बार बार उसे छीलने के बहाने क्लासरुम के बाहर निकलते थे! कुछ एसे बच्चे भी थे जो शार्पनर की बजाए ब्लेड का उपयोग करते थे। मुझे तो उंगली कटने का डर लगता था लेकिन मेरा शार्पनर बार-बार गुम होजाने के कारण मै भी ब्लेड का ईस्तमाल करने लगा था। पांचवी कक्षा की पहले या दुसरे ही दिन हमारी सबसे खतरनाक शिक्षिका ने (जो ईग्लिश पढ़ाया करती थी) एलान किया की कल से आप अपना पेन ले कर के आओगे। वैसे हमे तो पता ही था की पांचवी कक्षा में, ईग्लिश विषय में, आपको पेन से ही लिखना पड़ता है। लेकिन फिर भी....मुझे लगा कि मै बहुत बड़ा हो गया हुं। पापा की तरह मै अब पेन से लिखुंगा! यह बहूत बड़ी बात थी मेरे लिए! पेन में उन दिनों आज की तरह ज्यादा वेराईटीझ नहीं हुआ करती थी। ओप्शन जो उपल्बध होते थे...एक रूपयेवाली या ज्यादा से ज्यादा दो रुपएवाली। सादी या नुकीला पोईंट। बस। ईतना ही। अगर रीफील खत्म हो जाए तो बाकाईदा नई रीफील ली जाती थी। ये नही के रीफील खतम तो नया पेन। हां एसा हो सकता था की आपको क्लास में या स्कुल के ग्राउन्ड से कीसीका गीरा हुआ पेन मिल जाए। जब आप नए पेन से या उस मिले हुए पेन से लिखना शुरू करो....तुरंत बाजुवाल मित्र आपको पुछता भी था (सभी एक दुसरे के पेन के बारे में जानते ही थे।) की..."नया पेन लाया? दिखा दिखा!" मतलब के कोन से मित्र के पास कोन सा पेन है यह सभी को पता होता था। पेन की सबकी अपनी अपनी मनपसंद ब्रान्ड हुआ करती थी। स्टीक मतलब पुष्पा, रेनोल्ड मतलब तेजल। कभी कभी पापा की ओफिस में पेन दिए जाते तो वह पेन मुझे देते। लेकिन वह पेन मुझे पसंद ही नही था...बिना ढक्कन वाला मोटा सा पेन। मैने पापा के पुराने पेन को काट कर एक एसा पेन बनाया था जीससे लिखा भी जा सकता था और, पीछे फुंक मारने से सीटी बजती थी! मैने अपने एक पुराने खिलौने की सीटी उसमें डाल दी थी! आठवी कक्षा में एक वैशाली नाम की लड़की एक पैन लाई थी, उससे लिखने कागज़ से खुश्बु आती थी! उस पेन का आकार गोल सिलिन्डर नही लेकिन चोकोर सिलिन्डर था। सफेद, लाल, हरा, गुलाबी, सायन जैसे मनमोही देशी-विदेशी रंगो में यह पेन उपलब्ध था। किंमत थोडी सी ज्यादा थी - पांच रुपये। छठी कक्षा मैं तो एसे पेश आते थे मानो हम बारहवीं कक्षा में आ गए हो, या उतने ही मेच्योर हो गए हो। झगड़े भी बढ़ गए थे। मुझे जो लगता था कि पुरा क्लास मेरे साथ है, वह अब गलत साबित हो रहा था। खेल-कुद, हाजरजवाबी, कपडेलत्ते, ग्रूप और शेखी मारने वाली बातों में मै पीछे रह गया था। मेरा अब तक जो पढ़ाई में अव्व्ल रहने का रेकोर्ड था वह तुट चुका था। पिछले साल मेरा पांचवा नंबर आया था। ईस साल मेरा लड़कीयों वाला ग्रूप भी तुट चुका था। सो मै पुरा ध्यान पढाई में लगा रहा था। अपने बचपन और पुराने दिन एसे याद करता था जैसे में अब कर रहा हुं! ईस बात से अंजान की ईस साल की तीनों परीक्षा में मेरा अव्व्ल नंबर आनेवाला था और मुझे सर्टिफीकेट भी मिलनेवाला था! ईसका मतलब यह नहीं की मैं बहुत ही ज्यादा होशियारचंद हुं। बल्कि मेरे कोम्पेटीटर को अब पहला नंबर लाने की कोई पड़ी न थी। वे सब अपनी धुन में मस्त थे!
मुझे हाल ही में मिले उस स्कुलमेट का जिसने मुझे यह 'प्लास्टिक बैग्स' की याद दिलवाई। यह बैग्स बुक्स निकालते वख्त आवाज़ बहुत करते थे। हम हंमेशा सर-मैडम को आवाज कर कर के चिढाते थे! कीतनी बार यह प्लास्टिक बैग्स ने धोका दिया है । फट के पुरी किताबें बिखेर दी है। अधिक वजन रखने से ईनके हैन्डल भी तुट जाते थे। लेकिन बरसात में यही सबसे ज्यादा भरोसेमंद रहे थे। बारिश के दिनों में स्कुल बैग्स में प्लास्टिक बैग रख कर उनमें किताबें रखी जाती थी। ८ वीं कक्षा से स्कूल बैग का खर्चा बच गया। उन दिनों कोलेस स्टुडन्ट सिर्फ एक नोट ले कर कोलेज में जाते थे। आप ९० के दशक की कोई फिल्म देख लो....अक्षय या आमिर की! सिर्फ एक नोट में सारे विषयों का समावेश हो जाता था! हालां की कुछ स्टुडन्ट्स प्लास्टिक बैग युझ करते थे। यही ट्रेन्ड था उस समय का। हम भी ८ वीं कक्षा से तरह तरह के प्लास्टिक बैग्स ले कर स्कूल जाने लगे। यह बेग एक-देढ महिने साथ निभाता था। स्कुल के ईस आठवीं क्लास के ख़तम हुए दायके ग़ुजर गए है! ईस दौरान दो-तीन दोस्त कभी-कभार मिल गए। बातें हुई। एक बात वे खास बोले...पुरानी बातें है, ईनमें अब क्या रखा है? तब हम छोटे थे और नासमज थे...वगैरह। सही है....अतीत को साथ ले कर कौन पागल जीता है भाई? लेकिन मेरे दिमाग में जैसे की कहा था की कुछ केमिलल रीकेशन का लोचा है! कुछ ना होते हुए भी वह दीन एसे महसुस होते है जैसे शाम को किसी सड़क पर पीछे छोड़ा हुआ कोई एसा चौराहा जहां थोड़ी सी रोशनी थी। सब कुछ भुल कर कुछ साल जिंदगी के जद्दोजहद में बीततें है। फिर कोई तराना, कोई खुश्बु, कोई त्यौहार या बरसात, फिर से पुरा स्कूल सामने ला कर रख देती है! यह पागलपन नहीं तो ओर क्या है?
उन दिनो विडीओ गेम आदि तो होते नही थे, ट्युशन का भी नामोनिशान नहीं था। स्कुल में जो पढ़ा वही साल भर बाद परीक्षा में लिखना पड़ता था। ईसलिए हमारे पास तो फालतु समय खुब हुआ करता था। आप खेल कुद् करके थक जाओ फिर भी दिन खत्म नही होता था! फिर रात को टीवी चालु कर के बैठ जाते थे। पांच-दस मिनट के बाद कोई प्रोग्राम दिखाई देता था, वरना युं ही झरमर झरमर बारीश सा स्क्रीन सब देखा करते थे। आस पास से महेमान भी वक्त गुज़ारने आ जाते थे, वरना हम कहीं चले जाते थे। समय बहुत था, जो धीरे धीरे गुज़रता था, अच्छा गुज़रता था!
यह मेरी अपनी सचीमुची की यादें है! यह मेरा सच है! आपको कैसा लगा यह पढ कर जरुर बताईगा और अपनी कोई पुरानी यादें हो तो जरुर साझा किजीएगा!

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