Tuesday, 28 June 2022

हमें Academy Award Oscar क्युं जीतना होगा?


हमें Academy Award Oscar क्युं जीतना होगा?
 
दुनिया की सबसे अधिक Films भारत में बनती है। ईसमें से बहुत कम Movies पुरे भारत के दर्शकगण पसंद कर पाते है। अधिकत्तर Bollywood Films बहुत पुरी तरह फ्लॉप हो जाती है। यह तो हुई कर्मर्शियल बात। दरअसल सिनेमा सिर्फ एंटरटेनमेंट नहीं है। वह एक आर्ट भी है। बहुत सी कलाओं का मिश्रित स्वरुप।

हम सिर्फ एंटरटेनमेंट के लेबल तले फिल्म देखना चाहते है। यह पुरी तरह गलत है। आप खुद भी एसा नहीं चाहते, यकीन मानिए! आईए, आपकी पसंद और नापसंद के बारे में चर्चा करतें है! 
 
हाल की मौजुदा परिस्थिति
 
दर्शकः
हमारी भारतीय फिल्मों के दर्शको के बारे में कहा जाता है की... जनता जनार्दन है, वही फिल्म का आखरी फैसला करती है। लेकिन क्या यह सच है? कौन सा डिरेक्टर या फिल्म मेकर आपसे पुछने आता है की, 'मालिक, आपके लिए अगली फिल्म कैसी बनाउं?'
 
फिल्म मेकर्स एसे प्रकार / जोनर की ही फिल्मे बनाते है जो पहले भारत या विदेश में हीट हो चूकी हो। अलग करने जाएंगे तो उनको अपने पैसे डूबने का ड़र रहता है। दुसरा डर यह भी है की, सिर्फ एक फिल्म फ्लॉप हो जाने पर भी बोलिवुड में अधित्तर रिश्ते बदल जाते है। दुसरी बार काम ढुंढना मुश्किल हो जाता है। ईसलिए वे बड़े प्रेक्टिकल तरीके से ईंडस्ट्री में बने रहेना चाह्तें है।
 
दर्शक सर्वोपरी नहीं है। अगर आपको एसा वहम है तो उसे दुर करो। सिर्फ आप ही दर्शक नहीं हो। फिल्म किसी और देश या प्रदेश में चलेगी तो भी फिल्ममेकर खुश है।अगर आप थियेटर में नहीं जाते तो फिल्म को ओटीटी पर बेच दी जाएगी, आप देखो या ना देखो। फिल्म का खर्चा और थोडा फायदा निकल गया वह भी कभी कभी बड़ी बात कहलाती है।खर्चा अगर निकल गया है फिर दर्शको को कौन पुछता है?
 
फिल्म मेकर्स
बहुत पापड बैलने के बाद फिल्म मेकर बना जा सकता है। फिल्म मेकींग को सीखना तो बहुत आसान लगेगा, जब ईंडस्ट्री में यह काम ढुंढने जाओगे। एक मेकअप आर्टिस्ट्स, लाईटमेन या क्लेपबोय भी एसा मिल जाएगा जो फिल्म मेकींग जानता हो!
 
लेकिन फिल्म एसे नहीं बनती। फिल्म प्रोड्युसर और फाईनांसर को कैसे अप्रोच किया जाता है, वह कैसे आपको प्रतिउत्तर देते है, फिर आप कैसे उनको मनाते हो ... ईन सब बातों से अधिक कठीन है रोज़ धक्के खाना, अपमानित होना, शहर में सर्वाईव करना, पर्सनल तकलीफों को भुला देना और सालों तक यही सब दौहराते रहना।
 
फिर जा के कुछ परिस्थितियां आपको अगर एक मौका देती है, फिर आप कोन सा कद्म उठाते हो? क्या आप एसी फिल्म बनाओगे जो फ्लॉप हो सकती है या वह फिल्म जो सभी लोग बना रहें है और अधित्तर हीट होती है?
 
ईस मुकाम पर सोचना, निर्णय करना बहुत कठिन है। अगर आप हीट हो गए फिर मौके ही मौके है, लेकिन अगर फ्लॉप हुए तो हंमेशा के लिए बोरिया बिस्तर बांध के वापस घर। अंत में यहां हो सकता है की आपके कनेक्शन या वंशवाद शायद काम आए और आपको फिर कुछ मौके मिल पाए।
 
 

ऑस्कार एवोर्ड
तो ईस सतही / ज़मीनी सच्चाईयों को ध्यान में रख कर फिल्म के एवोर्ड के बारे में लोग सोचतें है। ऑस्कर एवोर्ड एक पहेचान दिलाता है। उस से कोई सीधा पैसा नहीं मिलता। अगर एवोर्ड या अच्छे काम करने की लालसा हो वही लोग एवोर्ड के चक्कर में पड़ते है। दर्शको को भी एवोर्ड विनिंग फिल्में पसंद नहीं आती। बहुत कम एसी फिल्में है जिसे एवोर्ड भी मिला हो और फिल्म व्यावसायिक तौर पर सफल भी हुई हो। 
 
Oscar क्युं जीतना होगा? 
सम्मान
देखा जाए तो ऑस्कर सिर्फ एसी फिल्मों को मिलता है जो उसके अपने स्टांडर्ड से मेल खाते हो। वैसे ही फोरेन फिल्म केटेगरी में एक बेस्ट फोरेन लेंग्वेज फिल्म केटेगरी में भी ये एवोर्ड मिलता है। ब्रिटन और फ्रांस ने तो यह ईनाम कब से जीत रखें होंगे। लेकिन पिछले कुछ सालों से तुर्कीश, हंगेरी, चिले जैसे कई देश भी यह जीत चुके है। https://en.wikipedia.org/wiki/List_of_countries_by_number_of_Academy_Awards_for_Best_International_Feature_Film
 
 
भारत में जब दुनिया की सबसे अधिक संख्या फिल्म बन रही है, हम कई बार उस एवोर्ड में नोमिनेशन पाने के बाद भी जीतने से बाकी रह गए है। यह सिर्फ एक एवोर्ड नहीं रह गया है, हमारे लिए एक चुनौती बन गई है।  वैसे कईलोग निराश हो कर एस एवोर्ड को खट्टा अंगुर बताते हुए बारे में अलग अलग बात करते है!
 
लेकिन अगर होलिवुड फिल्मो का जनक है तो उसके द्वारा दिया जानेवाला एवोर्ड ही यह प्रामाणित करेगा की फिल्म वर्ल्ड क्लास है की नहीं। ईस चैलेंज को स्वीकार कर के कई देशों ने फोरेन लेंग्वेज की फिल्में सबमीट कर के यह एवोर्ड जीता है। हमें भी फिल्मों में अपनी दक्षता साबित करने के लिए यह एवोर्ड जीतना ही होगा।

क्या हमारी फिल्ममेकिंग दक्षता अभी भी कम है? ऑस्कार हमें कैसी फिल्में दिला सकती है? क्या हमें ऑस्कर जीतना चाहिए? एक दर्शक के तौर पर आप क्या सोचतें है, एक भारतीय के तौर पर आपके विचार क्या है, फिल्मों के चाहक की क्या राय होनी चाहिए?

अपने विचार कोमेंट जरुर करें।
 

Friday, 24 June 2022

शोले - दूरदर्शन पर



केबल टीवी, वी.सी.आर. ना होनें के कारण कई बच्चों ने शोले फिल्म नहीं देखी थी। फिर जब 26 जनवरी 1996 को दूरदर्शन पर शोले फिल्म के प्रसारण की बात चली... सभी लोग बहुत खुश हो गए। यह बहोत से लोग का आंकडों का अंदाज़ा भी नहीं लगाया जा सकता।
 
उस दिन सालों बाद ठीक वैसे ही स्वयुंभु कर्फ्यु लग गया था जैसा रामायण के प्रसारण समय में होता था। दूरदर्शन पर यह पहली बार हुआ की किसी फिल्म के बीच में बहुत सारे विज्ञापन दिखाए गए हो।
 
फिल्म शुरु होने पहले कई टीवीवाले घरों में भीड़ जम गई थी। हालांकि, बहुत सारे घरो में अब टीवी आ चुके थे। फिर जब फिल्म शुरु हुई तो उसे देखने का वही आनंद आया जो, उस समय शोले फिल्म को थियेटर में देखने से मिला होगा।
 
फिल्म वैसे तो मल्टीस्टारर है और पुरी कहानी देखने लायक है, फिर भी सभी को ईंतज़ार तो गब्बरसिंह का था। लेकिन, एक बात एसी हुई जिससे गब्बरसिंह की एंट्री का पुरा मज़ा मारा गया। दूरदर्शन पर गब्बर की एंट्री के ठीक पहले ही Glunose D का पुराना गब्बरसिंह वाला एडवर्टाईझमेंट चला दिया गया। सब को लगा की यही गब्बर की एंट्री है, लेकिन वह विज्ञापन था।
 
ईस बात की चर्चा लोकल न्यूझपेपर में भी आई थी! दुरदर्शन की टीआरपी (या उस वक्त जो भी स्केल चलता हो) भी उस दिन टॉप पर चला गया था। लेकिन वह दिन नहीं भुला जा सकता जब दूरदर्शन पर ईतनी बड़ी फिल्म को दिखाया गया और करोडों लोगों ने वह फिल्म देखी।
 
दुसरे दिन स्कूल जा कर पता चला की एक-दो कमनसीब दोस्तों के घर उस दिन लाईट चली गई थी! कम से कम चार-पांच दिन तक फिल्म की बातें होती रही। बचपन से शोले के कई डाईलोग लोगों के मुंह से सुने थे। कई मैगेझींस में फोटो और आर्टिकल पढे थे। यह सब देख-पढ के शोले फिल्म देखने के लिए ईच्छा तो जाने कब से दबी पडी थी। लेकिन तब ना कैबल टीवी था और ना वी.सी.आर. कोई शोले फिल्म के लिए लाता था। उसके डाईलोग की ऑडीयो कैसेट भी बाज़ार में मिला करती थी। लेकिन दो कैसेट का वह सैट तो मध्यमवर्गीय बच्चे के लिए पाना नामुमकीन सा था, क्युं की अठन्नी में से चौकलेट और स्कुल में रिसेस का खर्चा भी तो बचाना होता था!
 
वैसे आपने यह फिल्म कब देखी थी? क्या मेरी तरह दूरदर्शन पर? अगर हां, तो ज़रुर बताईगा की आपका अनुभव कैसा रहा!
 

Thursday, 23 June 2022

थोडा सा रुमानी हो जाए


14 नवंबर 1992, शनिवार की शाम दूरदर्शन पर एक एसी फिल्म दिखाई थी, जिसका अर्थ मुझे तब जा कर समज आया... जब लगभग 2010 में जब ईस फिल्म की सीडी मेरे परममित्र ने मुझे भेंट में दी! देखिये ना, एक पंक्ति में कितने साल बित जातें है! मुझे एक प्लेटफोर्म चाहिए था जहां मन खोल कर ईस फिल्म के बारे में लिख सकुं।

आज २०२२, लगभग तीस सालों के बाद उसी फिल्म के बारे में, मै फिर से लिख रहा हुं! एसा नहीं है की पहले मैने ईस फिल्म के बारे में नहीं लिखा। बहुत से फोरम, सोशियल मिडीया, सवाल-जवाब के प्लेटफोर्म पर ईस फिल्म के बारे में मैने ढुंढा, लिखा और ईस फिल्म के बारे में सबको बताने का प्रयत्न किया।
ईस फिल्म का नाम है, 'थोडा सा रुमानी हो जाए'। मशहुर एक्टर अमोल पालेकरजी ने दूरदर्शन के साथ यह म्युझिकल फिल्म बनाई थी। म्युझिकल फिल्म का अर्थ है... कहीं भी-कभी भी संवाद गाने का रुप ले लेता हो।

यह फिल्म कई 4-5 फिल्मों पर आधारित है, जिनका क्रेडिट आखिर के आउट्रो टाईटल्स में दिया गया है।


 
पात्र परिचयः
कहानी की नायिका एक एसी लड़की है जिसकी शादी की उम्र बीती जा रही है। वह बिन माँ की लड़की 'बिन्नी', अपने पिता और दो भाएयों के साथ एक बहुत छोटे से शहर में रहती है। गर्मी का मौसम था और बारिश के कुछ आसार नहीं। बिन्नी अपने पिता और भाईयों की लाडली है। वे तीनों उसकी शादी की फिक्र करतें है। हालां कि, बिन्नी दिखने में साधारण है। अधिक गोरी नहीं, लड़कीयों जैसे नखरे नहीं। शायद, उसकी माँ होती तो उसका स्वभाव थोड़ा अलग हो सकता था।
 
 
बिन्नी के पिता खुद बहुत खुशमिजाज़ ईंसान है। वह अधिक फिक्र नहीं करते और बिन्नी की हर ईच्छा को मान देतें है। बिन्नी का छोटा भाई जिसका नाम 'बीम' है, वह अभी बच्चे से जवान हो रहा है। वह अपनी स्वतंत्रता चाहता है, और बड़ा दिखना चाहता है। लेकिन उसकी नादानी अभी जाने को है। ईन तीन पात्रों की आपस में एकदम एकदम बनती है।

बिन्नी के बड़े भैया, जो ईंजीनीयर भी है... वह घर में पैसे कमानेवाला ईंसान है। वही है जो घर को अपने कंट्रोल में रखना चाहता है। वह खुद को बहुत प्रेक्टीकल समजता है और बिलकुल एसे ही बातें भी करता है। वह बिन्नी को ले कर अपने पापा की तरह अधिक आशावादी नहीं है। वह सबको, वास्तविकता समझाना चाहता है, उसे स्वीकार करने को कहता रहता है।
 
कहानीः
बिन्नी की मुलाकात उस छोटे से शहेर के - नये मेयर से होती है। मेयर तलाकशुदा ईंसान है, धीर गंभीर विचार रखता है। जब बिन्नी के पापा और बीम की मुलाकात जब मेयर से होती है, उन्हें मेयर बहुत अच्छा ईंसान लगता है। वे सोचते है की  बिन्नी की शादी अगर मेयर से हो जाए...


लेकिन, मेयर शादी करना नहीं चाहता। बिन्नी अपने अकेलेपन से झूझ रही है। बीम भैया द्वारा अपने उपर हो रही सख्ती से परेशान है। बडे भैया सुखे की चिंता कर रहें है। बिन्नी के पिता अब कभी कभी बिन्नी की चिंता करने लगे है।
 

फिल्म  के मध्य हिस्से में एक और पात्र प्रविष्ट होता है। ईस पात्र के बारे में यहां उजागर करना ठीक नहीं रहेगा। हालांकि पोस्टर और कवर पर उसी को हीरो के तौर पर दिखाया जाता है। लेकिन मेरे विचार से ईस कहानी का कोई मुख्य पात्र नहीं है। बीम जैसा छोटा पात्र भी कहानी का महत्तम हिस्सा है। ईस तरह कहानी पुर्णतः सभी पात्रों और परिस्थितियो पर निर्भर है।
 
ईस बीच, भास्कर चंदावरकर द्वारा रचित कर्णप्रिय संगीत और गीत आतें है... जो कहानी के मुड को और प्रभावशाली बनातें है। एक शांत, गंभीर, अचानक हंसी की फुहार बरसानेवाली, आपको सुखे और बिन्नी की बीतती उम्र की चिंता देनेवाली यह फिल्म... आगे एसा मोड लेती है जो मै अच्छी तरह लिखना चाहता हुं। लेकिन यह फिल्म के साथ बेईमानी होगी!


लेकिन ईतना ज़रुर कहुंगा की, फिल्म के उस मोड़ पर ह्युमन बिहेवीयर की उस आदत को उजागर किया है... जहां कोई उम्मीद न होने पर लोग चमत्कार और जादु में कैसे विश्र्वास कर लेतें है! उस संवाद और परिस्थितियों का मिलन आप फिल्म के मध्य हिस्से में जरुर देखिए, बहुत मज़ेदार है!

यह फिल्म के बारे में पता चला की, यह फिल्म प्रदर्शित भी हुई थी और बुध्धीजीवी लोगों ने पसंद भी की थी। लेकिन एसी फिल्म जो मेन स्ट्रीम सिनेमा से अलग हो उसका प्रचलित या हीट हो पाना बहुत मुश्किल है। 1991 में बनी यह फिल्म 1993 में दुरदर्शन पर दिखाई गई ईसलिए उस वक्त सबको देखनी पडी होगी, एसा मै समजता हुं! दुरदर्शन पर ईस फिल्म के प्रसारण की तारीख ईस लिए ईतनी पक्की लिख पाया हुं, क्युं की बचपन में दुरदर्शन पर दिखानेवाली फिल्मों के नाम मुझे डायरी में नोट करने की आदत थी!
 
ईस फिल्म के पात्रों को किसी कॉलेज में ह्युमन बिहेवीयर के चेप्टर में शामिल किया गया है। सारे पात्रों की तटस्थता, एकदुसरे से मिल कर नीकल रहे प्रतिभाव वगैरह देखना बहुत रोमांचकारी है। सीधा सीधा एक सकारात्मक संदेश भी है, जो ईसके शीर्ष गीत में अच्छी तरह कहा गया है....
 
बादलों का नाम न हो, अंबर के गांव में।
जलता हो जंगल खुद, अपनी छांव में।
यही तो है मौसम (२)
आओ तुम और हम, बारिश के नग़्में गुनगुनाएं...
थोडा सा रुमानी हो जाए!
 
यही ईस फिल्म की मुख्य थीम / सीख है।  ईतनी तकलीफों में भी हमें उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए, तपती धुप में बारिश ना सही, बारिश के गीत तो गा ही सकतें है!

आशा है आप यह फिल्म ज़रुर देखेंगे। युट्युब पर फिल्म एक क्लिक में उपल्ब्ध है, और जिसे ढुंढने के लिए मेरे 6-7 साल गुज़र गए थे!



स्कुल की प्रेमकहानीयां

विषय नाजूक है...जो किसी को पसंद या किसी को ना पसंद भी हो सकता है! पाठकों का सहयोग वांछित है।
लेकिन यह सच है की प्रेम स्कुलों में भी होता है! और यह मेरे ही अनुभव है, जो साझा कर रहा हुं। आपको अंत तक पता लग जाएगा की मेरे लिये यह कितना जरुरी था!

ईस से पहेले की आप अपनी भंवे उपर चढ़ा कर मुझे रोक लें....मै कहना चाहुंगा की यह कहानीयां सीधी-सादी और ईस फोरम में जारी करने योग्य ही है।
फिरभी, अगर किसी को आपत्ति हो तो मुझे अवज्ञत कराएं।

प्रकरण एक:

किसी महान लेखक ने कहा है की... हंमेशा एक लेखक की कहानी का नायक...स्वयं वह लेखक ही होता है!

आठवी कक्षा के शुरु हुए चार-पांच माह बीत चुके थे। मेरे लिए यह समय बहुत लंबा था। हम लोग सब अच्छे लडके गीने जाते थे। पढाई करते, होमवर्क करते, सारे सवालो के जवाब देते, लिमीट में मस्ती भी करते थे। हमारा गृप मतलब मुझे मिला कर चार से पांच लडके। सारी लडकीयां हमसे अच्छे से बाते करती थी। मजाक या मस्ती भी होती रहती थी। नोट्स एक्चेंन्ज होती थी, एक दुसरे को मदद करते रह्ते थे। या कमसे कम मै तो यही सोचता था!

ईन दिनो अजीब से बदलाव शरीर में आने लगे थे। आवाज़ बदलने लगी थी, हाईट बढ कर मम्मी जितनी हो गई थी। मेरा सारा ध्यान अब पढाई में कम लगने लगा था। और लड्कीयों से बात करना अच्छा लगने लगा था!

(प्रस्तुत चित्र प्रतिकात्मक है)

रेडियो पर बजते फिल्मी गाने और यहां स्कूल का माहोल मुझे दिवाना बना रहा था! यह कुछ केमिक्ल रीएक्शन जैसा था। एक नशा सा पुरे रात-दिन रहता था। अब यह हाल था की जब सन्डे आता तो मुझे सचमुच गुस्सा आता की यार यह सन्डे बीच में क्यों आ जाता है? मै बस कहीं उड़ रहा था...बस उडे जा रहा था! मुझे पता था की यह हकीकत है, कोई ख्वाब नही है। फिर भी....

लेकिन, लेकिन, लेकिन...मै जो था कभी ईश्क में नहि गिरा! ईसी तरह आठवीं से ले कर दसवीं कक्षा हंमेशा एक योग्य साथी के सपने ही देखता रह गया! कोई नही मिला...क्युं? नही पता! उन दिनो सुने गए गाने अब भी मुझे उसी माहोल में ले जाते है|

और मेरी कहानी यहीं समाप्त हो गई है!

और हां, याद आया...'लेखक ही नायक होता है' वाली महान उक्ति मेरे द्वारा ही लिखी गई है!

***


प्रकरण तीनः

प्रकरण दो के बाद मेरे पास शायद बताने को कुछ न होगा! क्यों के वही प्रकरण बहुत उलझा हुआ था और मै जल्दी जान नही पाया। ईसलिए अभी प्रस्तुत है प्रकरण नंबर तीन!

राधा और मनोज

राधा हमारे क्लास की शायद सबसे गरीब लड़की थी। आठवी कक्षा से वह हमारी स्कूल में पढ़ने आई। वह गोरी थी और एक दो विषयों को छोड़ पढ़ने में अच्छी ही थी। वह हमारे गृप में आते ही घुलमिल गई। उसका एक खास रोल था - सबको सलाह देना। वह सहेलीयों को बड़ी दीदी बन के सलाह देती। काजल. लक्ष्मी, अनु उसकी खास सहेलीयां थी।

मनोज एसा लड़का था जो हम में से किसी को जरा भी पसंद नहीं था। वह गाली-गलौंच करता था, लडाई करता था, पढ़ता नहीं था। शायद उसके वही गुण राधा को पसंद आ गए!


एक दिन रिसेस का समय था और क्लास में कुछ ही बच्चे थे। मनोज और उसका कोई फालतु दोस्त आपस में एक दुसरे को जोरो से गालिंया बके जा रहे थे। हम सबको सलाह देनी वाली हमारी 'दीदी' गैलेरी में खड़ी थी। वह खिडकी पर दोनो हाथ रख के क्लासरुम के अंदर देख रही थी। मैं दरवाजे पर ही खड़ा था, सो मैने राधा को देखा और उसके पास चला गया। वह मनोज को देखते हुए निराशा से बोली, "कितने बेशर्म है ये लड़के!"
मैने पुछा, "क्युं? तुमको तो पसंद है ना?"
वह मेरे सामने शांति से देख कर बोली , "हां।"

उसके बाद क्या हुआ पता नहीं। महिनों बाद एक बार मैं और मनोज स्कूल से छुट कर किसी काम से जा रहे थे। रास्ते में राधा का घर आता था, वो वहीं पर खडी कुछ काम कर रही थी। हम दोनो साईकल पर वहीं रुके और राधा से थोडी बातचीत कर के आगे निकल गए।
उसके कुछ महिनों बाद मै और मनोज साथ साथ घर तरफ जा रहे थे, मनोज का ओर एक दोस्त हमारे साथ था। वे दोनों पता नहीं क्युं लेकिन राधा के बारें मे गालियां दे-दे कर बातें कर रहे थे।

मुझे माजरा समज में नही आया, लेकिन गुस्सा आया, सोचा...ईस लड़के से दोस्ती रख कर राधा को क्या मिला?

***

प्रकरण चारः

अनु और विराट

राधा की एक सहेली काजल का भाई था विराट। वह हमसे एक कक्षा आगे मतलब की कक्षा नौ मे था। उसका गृप बडा और मज़बुत था। सब के सब लोग "भाई" थे। क्यों की काजल हमारे गृपमें थी, हमें भी विराट से हाथ मिलाने का मोका मिल जाता था जो बड़ी बात थी!


हमारी स्कूल में एक से सातवीं कक्षा का समय सुबह का था। हम लोग सातवी कक्षा से पास हो कर आठवी कक्षा में आए । हमारा स्कूल का समय अब बारह से साड़े पांच का हो चूका था। मै पहेले हफ्ते स्कूल गया ही नहीं।

मेरे बचपन का क्लासमेट राहुल अब मेरे घर के पास ही रहेने के लिए आ गया था। उसके साथ अब तक मेरी कबी बनती तो कभी बिगड़ती थी। लेकिन जब वह मेरे घर के पास आ गया हमारी गहरी दोस्ती हो गई....वो अब भी कायम है!

राहुल से बात कर के मुझे पता चला की एक से सात कक्षा में जो स्कुल है, वह आठवीं में एकदम बदल जाता है। सारे सर और मेडम का व्यवहार दोस्ताना है, हंसी मज़ाक भी चलता है। वे प्राथमिक कक्षाओं जैसे रुक्ष और कडक नहीं है!

(प्रस्तुत चित्र प्रतिकात्मक है)

उपर से समय में भी भारी बदलाव था। पहेले स्कुल जाने के लिए सुबह जल्दी उठना पड़ता था, अब जब चाहे उठो, खेलो, घुमो फिर स्कुल जाओ!

प्राथमिक कक्षा में एक ही रिसेस होती थी, लेकिन अब दो रिसेस...एक छोटी (दो पिरियड के बाद) और एक बडी (पांच पिरियड बाद)।

राहुल ने एक बात और बताई की कभी कभी फ्री पिरियड भी होते है, जब कोई शिक्षक पढाने नहीं आता।

ज्यादतर यह होता था की सातवीं कक्षा पुर्ण करने के बाद कई बच्चे स्कूल बदल देते थे। हमारा जो गृप था वह भी ईसी तरह बंट गया। आधे लोग दुसरी स्कूलों मे चले गए। उर्वशी, सिध्दार्थ...कई दोस्त छुट गए।

खेर, मुझे पता था की अब भी बहुत देखना बाकी है। दोपहर की स्कुल की का जो मज़ा था....वह वैसा ही था जैसा राहुल ने बताया था।

पहेले पहेले तो मुझे सेट होने में थोडा समय लगा, नए सर और मेडम जब हमें जान गए हमें सबसे आगे बैठाया। लेकिन ईस बार हम सच में पीछे बैठना चाहते थे....सातवीं कक्षा तक आगे बैठ बैठ के हम सब उकता चूके थे!


(प्रस्तुत चित्र प्रतिकात्मक है) 

 
खैर अब वापिस अनु-विराट की कहानी पर आते है।
हमारी काजल और राधा के साथ अनु की खुब बनने लगी। यहां तक की काजल और अनु एक दुसरे को बहुत मानने लगे। शायद आपके नाक उपर की ओर चढ जाए...कि यह क्या बचपना है! लेकिन काजल अनु को कभी कभी भाभी कह कर बुलाती थी! आप सोचीए जरा..हम सब बच्चे आठवी कक्षा के थे!
अनु का का स्कूल के एकदम पास में था, ईसलिए अनु को रिसेस में घर जाना पडता था। सो रिसेस में कभी वह हमारे साथ नहीं होती थी और ना ही विराट से कभी मिल सकती थी। कभी फ्री पिरियड में या शनिवार को वे दोनो बातें करते पाए जाते थे।
लेकिन हाय, यह ज़ालिम जमाना, खुदगर्ज दुनिया को यह आंखो देखा गंवारा न था!

यह कहानी यूं ही आगे बढती रही, हम नौवीं कक्षा में आ गए। अब हम सभी स्कूल में अच्छी तरह सेट हो गए थे। राधा और काजल भी स्कूल से निकल चूके थे, राधा का पता नहीं लेकिन काजल किसी ओर स्कूल में जा चूकी थी।

विराट दसवीं कक्षा में था और स्कुल में कम दिखाई देता था। यह उन दिनों की बात है जब ट्युशन क्लासिस का दौर चल पडा था। स्कुली शिक्षक ही ट्युशन करवाया करते थे, जिनका फायदा उनके स्टुडन्ट को स्कूलों में मिलता था। ट्युशन जाने वाले बच्चे स्कुलों में कम आते थे या बड़ी रिसेस के बाद घर चले जाया करते थे।



एक बार बात यह हो गई की स्कूल में नए प्रिन्सीपल साहब आए थे। वे बड़े बदलाव करने की कोशिक करते थे। उनको यब बात पता चली। उन्हों ने दोनो को रंगे हाथ पकड़ना चाहा।
एक क्लास रुम में फ्री पिरियड चल रहा था। क्लास में बस चार-पांच बच्चे थे। वहां ये दोनो अनु और विराट पीछले बैन्च पर बैठ कर बतियाने लगे।

प्रिन्सिपाल जी वहां पहूंच गए और दोनो को डांटने लगे। दोनो अपने अपने क्लास में भाग आए। प्रिन्सिपल साहब क्लास में आए और अनु को खूब डांटा। उसे रोते हुए घर भेज दिया... पेरेन्ट्स को बुलवाने के लिए।
वह कहती रही के एसा मत करें...लिकिन साहब ने एक न सूनी।

फिर उसकी मम्मी आई...पुरे क्लास के सामन अनु को दो तमाचे मारे और घर ले गई।
अनु की फैशनेबल बाल दुसरे दिन से सीधे, चीपचीपे हो गए। वह एक साल अनु स्कुल में रही, उसके बाद उसे स्कूल से उठा लिया गया।

***


प्रकरण दोः

काजल-राज

यह वही प्रकरण है जिसने मेरे छोटे से दिमाग को उलझाए रखा। सातवीं कक्षा से काजल हमारे गृप में थी। लेकिन आठवीं में वह राधा, अनु, दीपक और संजय के साथ हो गई। उस गृप से जुड़ते जुड़ते दो तीन महिने निकल गए। मुझे अभी भी याद है ओगस्ट के महिना और बारिश वाले दिन थे। हम बैन्चीस पर उपर-नीचे बैठे थे और हंसी का जाने गुबारा फट पडा। मुझे लगा की यह गृप अब कभी नहीं तुटेगा। हम सब बहुत खुश थे, नया गृप बन चूका था!

(प्रस्तुत चित्र प्रतिकात्मक है)

एक दिन काजल उदास थी, हम सब के पुछने पर उसने बताया कि राज उससे बात नहीं कर रहा है। ईस कारण से वह उदास है। मै वाकई उल्लु था, रीसेस में मैने राधा से पुछा, "ईसका मतलब क्या है? राज अगर ना बोले तो काजल क्युं उदास है?"
राधा बोली, "क्युं के दोनो चालु है!"
"चालु मतलब?" मै ओर उलझा!
"उसी से पुछो।" राधा उकता कर नीचे चली गई।

रीसेस जब खत्म होने आई मै क्लास में आया, राधा काजल को कुछ समजा रही थी! हमारे गृप की सारी लड़कीयां और दो लड़के बैठे हुए थे।
मैने पुछा, "क्या हुआ?"
"कुछ नही" काजल बोली।
"एक बात बता तो जरा?" मुझे वाकई में उत्सुकता थी।
"क्या?" काजल बोली। अब वह स्वस्थ थी।
"क्या तुम और राज चालु हो?" मैने भोलेपन से सब के सामने पुछ लिया!
फिर जो हमारे गृप का ठहाका पुरी क्लास में गुंजा है!!!

काजल पहेले तो भौंचक्की रह गई थी...फिर वह भी ठहाके की गुंज में शामिल हो गई। मुझे पता चल गया, की बेटा आज फिर से कोई गलती हो गई।
काजल ने पुछा, "तुझे पता भी है, 'चालु' का मतलब?" मैने ईनकार में सर हिलाया।
वह बैन्च से खडी हो कर मेरे कान में फुसफुसाई, "ईसका मतलब, मै राज से प्यार करती हुं!"

यह सुनते ही मैरे तन-मन में जैसे बीजली सी दोड़ गई! मुझे पता थो था की एक बला है तो सही, जिसे लोग प्यार कहेतें है। टीवी और फिल्मी गानों में मैने देखा तो था यह सब कुछ। लेकिन क्या वह सच में होता है!!! वह भी उम्र के ईस दौर में? स्कूल में?

(प्रस्तुत चित्र प्रतिकात्मक है)

यह वाकई आपत्तिजनक था/है। स्कुलों मे शिक्षकों को भी पता होता है...बच्चें है, ईनमें उत्सुकता और बचपना होता ही है। वातावरण ही एसा कुछ हो जाता है की फिर मां-बाप के संस्कार ही कुछ कर सकते है। बच्चा अगर बिगड़ता नही है, फिर भी कहीं न कहीं उसे एसे वातावरण का सामना तो करना ही पडता है!

पहेले मुझे लगता था की हमारे स्कुल में क्या हो रहा है! फिर कोलेज जा कर पता चला की सभी स्कूलों मे यही हाल था!
एक बात अच्छी है कि हम ईस मामले में अमेरिका से पीछे है।

काजल राधा के साथ स्कुल से छुट कर एक-दो बार राज के घर भी गई थी। वहां जब वह राज की मम्मी-पापा से मिली तब उसे लगा की राज की मम्मी को ईन दोनो के बारे में पता है।
मैरे घर का भी रास्ता राज के घर से होता हुआ जाता था। उसके बाद मै कभी देख लिया करता था की काजल की खटारा साईकिल वहां है या नही!
बाद में पता चला कि काजल जी के लक्षण कुछ ठीक नहीं थे। उसको कई लड़कों ने पूछा था। और वह उलझतीं ही जा रही थी। राधा कभी कभार उसको यह सब चक्करों से बचने कि सलाह देती होगी, लेकिन अब वह वैशाली के साथ अधिक घुमने फिरने लगी थी।

मुझे और राहुल को भी ओर कोई टयूशन ठीक न लगा तो काजल के गृप के साथ एक जगह ट्युशन जाने लगे थे। एक बार ट्यूशन का एक ओर लड़का उसकी नोटबुक ले कर भागा। काजल उसके पीछे भागती रही लेकिन उसने बुक नहीं दी। रास्ते में वापस वे खडे रहे और फिरसे भागाभागी की। आखिर में उकता जाने के बाद ही काजल को वह नोटबुक वापस मीली।

मैने पता किया तो खबर मीली की वह लड़का भी काजल के पीछे पडा था। उसने अपने हाथों पर भी "टी" का टेटु बना रखा था!



मुझे अच्छी तरह याद है...काजल का एक लवलेटर भी हमारे हाथों लगा था। उसकी राईटींग बहोत ही ज्यादा खुबसुरत थी। उपर से रंगीन बॉलपेन से दो छोटे पेज भर के उसने लवलेटर लिखा था। जिसमें उसने राज को ढेर सारी हिदायतें दी थी। दो चार शायरीयां थी, शायद एक गीत की पंक्ति भी थी।

चीजें अगर बद से बदतर हो, उनमें से सीख लेना एक महान ईन्सान की निशानी है। अतः मैने उस लव लेटर से सीखा की धीरे धीरे और प्रेम से लिखने पर लिखाई और अक्षर दोनों सुधर सकते है।

मैने प्रथम तो अपनी कोपी पर नज़र डाली तो कुछएक वाक्य मेरे खुद के भी पढने में नहीं आ रहे थे। लेकिन मैने प्रेक्टिस चालु रखी। जब तक दो - तीन मित्रो ने और स्वयं हमारे क्लास टीचर ने मेरी लिखाई की प्रशंसा नहीं की, मैने अपनी प्रेक्टिस नहीं रोकी!!!

वह पैसे भी एसे उडाती थी मानो उसके पास पैसे छापने की मशीन हो। दिन के दस-बीस रुपये तो यूं ही खर्च कर देती थी। कभी हम सब मिल के पांच रुपये का नमकीन खरीदते थे, काजल अकेले ही पुरा पेकेट खरीद लाती थी। फिर सब मिल कर खाते थे। रोजाना चोकलेट, च्यूंईंगम खाना और खिलाना उसका शौक था।

काजल अपनी एक कोपी के पीछले पन्नों पर अपने फेवरेट गानें लिखती थी। कभी वह रेडियो से सुन कर सीधा ही लिख लेती थी...वह भी सुंदर अक्षरों से।
उसको देख कर हम में से कई लोग एसा करने लगे, हमारी कोपी के पिछले पन्ने गीतो से भरने लगे!

उसने राज का परिचय हम सब से भी करवाया । हमने सबने मिल कर एक गृप फोटो खींचने का सोचा...जो कभी हो न पाया । मैने वह प्लान के लिए पैसे भी जमा कर लिए थे, वह फिर नोटबुक खरीदने में खर्च हो गए।



ईस दौरान एक बडा ही फिल्मी टाईप का किस्सा हो गया। एसा तो कोई सोच भी नहीं सकता।
हमारा क्लासरुम सबसे उपर के फ्लोर पर था। वहां से नीचे आने जाने की सीडीयां थी। वहीं सबसे उपर की दीवार पर कीसी ने एकदम बडे अक्षरों मे "आई लव यु काजल" लिख दिया था!!!
हम सब समज नहीं पा रहे थे की क्या कहें, क्या करें। लेकिन काजल एकदम शांत नज़र आई। फिर हम सब ने मिल कर एक उंचे लडके को कहा की भाई तुम कैसे भी कर के उस दिवार तक चढ़ो, हो सके तो वह लिखाई साफ कर दो बाबा!
ईस दौरान दो पिरियड भी बीत चुके थे। एक टीचर भी उपर आ कर, पढा कर गई थी। फिर रीसेस के समय वह साफ कर दिया गया। फिर भी थोडा-थोडा दिख रहा था।

जैसे की अनु (प्रकरण चार वाली) का हाल अगले साल में होने वाला था, काजल का ईसी साल हो गया। उसका भाई जो राज के क्लास में ही था और उसे यह सब पता चला। दुसरे दिन बात आई की आज दोनो लड़ने वाले है।
काजल उस दिन आई नहीं थी। हम सभी नीचे खड़े हो गए, यह देखने की क्या होता है।

स्कूल के सामने ही दो गुट आमने सामने आ कर बैठे हुए थे। राज वहीं पर था और सब विराट की राह देख रहे थे। जैसे ही विराट आया दोनो भीडे-न भीडे सब लोगो ने उन दोनों को पकड लिया। स्कूल का प्यून भी बीच में आया और विराट को समज़ा कर बाजु में ले गया।

आठवीं खतम होते ही उसकी स्कुल बदलवा दी गई! आगे की कहानी फिर किसी को नही मालुम। दो साल बाद फिर से वह एक बार मुझे अचानक मिल गई। थोडी बातें की, दोस्तों को याद किया। लेकिन उनकी प्रेमकहानी के बारे में मैने पुछना उचित नहीं समझा।

***


आप भी सोचतें होंगे की कैसा होगा यह स्कूल!! लेकिन मैने हंमेशा देखा है की कई स्कुली बच्चे जीनकी आयु १२-१३ वर्ष की या १३-१४ वर्ष की होती है वे भी ईस प्यार नामके खतरनाक वाईरस का शिकार हो जाते है! मेरे स्कुल में भी उसके बाद कई किस्से हुए। दुसरी बड़ी स्कुलों के भी किस्से वहां पढ़नेवाले दोस्तों से सुने।

तो एसा रहा मेरा ८ वीं से १० वीं का सफर! एसी बातें आप कहीं शेयर भी नहीं कर सकते। ब्लोग या फेसबुक पर तो बिलकुल नहीं। हां उस वक्त एक - दो बार दोस्तो से शेयर की थी लेकिन ईससे मन को तसल्ली कैसे हो सकती है? जब बारिश होती है या बारह बजे की धुप में पुराने रास्तों पर जाना होता है स्कुल बहुत याद आती है। उस दौर का कोई गीत सुनने को मिले या फिल्म देखने को मिले तो लगता है की वे दिन अब कभी नहीं आएगें।

लेकिन यहां एक अन्जान बन के बेझीझक पुरानी यादें शेयर कर के सुकून मील रहा है....जो बयां करना भी मुश्किल है।

अस्तु! (सभी पात्रों के नाम बदलें हुए है एवं, सभी प्रस्तुत चित्र प्रतिकात्मक है) 

Wednesday, 22 June 2022

स्कूल की यादें


तीसरी कक्षा से School का मुख्य दरवाजा सामने ही पडता था! हमारी मेडम स्कुल की घंटी बजने की राह देखने को कहती थी, और हम school bag तैयार कर के बैठ जाते थे! मेरी बेन्च दरवाजे से सटी होने के कारण मै ईसी प्रकार भाग कर स्कुल से सबसे पहेले निकल पडता था! बाहर मेरे पापा को साईकल ले कर मेरी राह देखते हुए देख कर कितनी खुशी मिलती थी! मेरा घर मेईन रोड पर था...जहां दुर एक सरकारी स्कुल थी। शाम पांच बजे जब सब बच्चे छुट कर जाते तो कई लोग उन्हे बरामदे में खडे हो कर (चाय पीते पीते) उन्हे देखा करते। वे बच्चे भी खुब थे...जैसे कोई परेड चल रही हो, वे सब अपनी अपनी मस्ती मैं दोडते, भागते, चिल्लाते, बतियाते हुए चलते चलते घर जाते थे!

और हम सोचते रहेते की हम कितने अमीर है! हमारे पास तो अब साईकिल भी है! जब आठवीं तक आएंगे तब हम भी साईकल ले कर स्कुल जाया करेंगे.... क्या ख्वाब था! कितनी राह देखी गई थी! कुछ एसे बच्चे भी हुआ करते थे जिनका मक्सद सिर्फ और सिर्फ धमाल मचाना था। प्रायः मे जिन्हे बहादुर समझता रहा उनको रोते हुए देख कर अचंबित रह गया! हमारी स्कुल में फ्री पिरियड ज्यादा होते थे! या कभी मेडम को कुछ काम रहेता था....तो वह अपना काम करती थी। कुछ उनकी मुंहफट चमचीयां भी हुआ करती थी जो उनको कहती थी की दुसरे सर का होमवर्क बाकी है तो क्या वह हम कर सकते है? और एसे हमे फ्री पिरियड मिल जाते थे! मेरा होमवर्क ज्यादातर कंप्लीट होता था....और में एसे फ्री टाईम में यह करते हुए पाया जाता था! 

 


मेरे हिसाब से हमे खुब सारा होमवर्क दिया जाता था जो कम से कम एक-देढ घंटा चला करता था। यह तो बच्चो के साथ सरासर अन्याय था! फिर जब शाम पांच बजे 'राजकुमार जी' खेलने को निकलते.... कंप्युटर तो बहोत दुर की बात है! हमारे स्कुल मे पंखे भी ठीक से नही चलते थे! दो पंखो में से एक तो बस यूं ही चमगादड़ की तरह लटके रहा करता था! सात दिन की सात अलग अलग प्रार्थनाएं माईक पर ७वीं कक्षा की लडकीयां गाती थी! घर के पास वाले कीसी कीसी दोस्त की एसी भी स्कुल थी जहां टाई पहेनी जाती थी। आज कल जैसे रंगबेरंगी युनिफोर्म चलन में है, वैसे तो हम सोच भी नही सकते थे! हमारे पास सफेस शर्ट और ब्लु चड्डी हुआ करती थी सभी दोस्तो की ब्लु चड्डी के भी पचास शेड्स हुआ करते थे....ध फीफ्टी शेड्स ओफ ब्लु एक दोर एसा भी था...जब आस पडोस तक खबर पहुंच गई थी की मैं गोपीयो से घिरा रहेता हुं....सिर्फ मुझे ही पता था की में कितना तन्हा हुं...

 


उन दिनो मैने सोच लिया था की २५-५० पैसे हफ्ते में खर्च नही किए तो क्या किया? अपनी कीसी नोटबुक में चवन्नी, पचास पैसे के सिक्के ले जाया करता था। जो चाहे चोकलेट, स्टीकर, रीफिल वगेरह....खरिद लिया! क्या एश थी! 


एक बार एसा भी हुआ था...स्कुल छुट चुका था। दो पहर साडे बारह-एक का समय होगा। हम सब एक पुल के नीचे खडे थे, जोरो की बारिश हो रही थी। आज मैने सोच लिया के भले गीला हो जाउं लेकिन घर जल्दी पहुंच जाना है। सो मैने साईकिल आगे बढ़ा ली। गीला होते होते घर तक पहूंचा जो लगभग आघे घंटे की दूरी पर था। लेकिन यह क्या?! यहां तो बारिश की बुंद भी नही गिरी थी, रोड सारे सुखे थे और सुरज भी चमक रहा था! रस्ते में लोग मुझे चोंक कर देख रहे थे, मै पुरी तरह पानी में तर था! मेरे घर तरफ उस दिन बारिश हुई ही नही और मै असमंजस मे बार बार आकाश की और देखता रहा था!
मै पहली कक्षा में पढ़ता था। शनिवार की सुबह सुबह सब बच्चों को स्कुल के बाहर ले जा कर लाईन में खडा कर दिया गया था। मुझे हर बार की तरह कुछ समझ नहीं आ रहा था की क्या हो रहा है। एक से सात कक्षा के सभी छात्रों को स्कुल के बाहर एक कतार में चलने की सुचना दे कर प्रिन्सीपल साहब स्कुल के पीछे की तरफ जाने वाले रास्ते पर चल दिए। मैं डर के अपने किसी दोस्त को पुछ रहा था की क्या होने वाला है.... हमारी बटालियन धीरे धीरे आगे चल रही थी। हमने स्कुल के थोडे पीछे जा कर देखा तो एक विशाल मेदान था....जिसके दुसरे छोर तक नज़र भी नहीं पहूंचती थी! दरअसल बात यह थी वह ग्राउन्ड एसआरपी का था। शायद कीसी की दरखास्त पर हम बच्चों को वहां खेलने की ईजाज़त मील गई थी। हम एक से सात कक्षा के बच्चों को वहां खडा कर के थोडी सुचनाएं देने के बाद हमे खेलने को छोड दिया! यह हमारा सब से बडा उपहार था। शनिवार को स्कुल में पुरे पांच पिरियड होते थे...हम सिर्फ खेलते ही रहे....खेलते ही रहे! मेरे मन में एक और खुशी/बेताबी बढ़ रही थी। कल ईतवार जो था! सातवीं कक्षा में अचानक हम दोस्तो ने हररोज रिसेस में वही पुराने ग्राउन्ड में जाने का सोचा। लगभग एक माह तक हम रोज मस्ती, खेलकुद से दुर कुदरती वातावरण का आनंद लेते थे....उन दिनो मेरे लंचबोक्स में क्या होता था पता है?
सातवी कक्षा के बाद स्कूल का समय १२ बजे से ५.३० का होने वाला था.....सुना था की दो रिसेस मीलने वाली है, बडी रिसेस में कुछ बच्चे घर भाग जाते है! बहोत सारे फ्री पिरियड होते है और आप क्लास में सो भी सकते हो! ४-५ कक्षा में कुछ एसे भी दिन थे जब मुझे स्कूल वाकई अच्छा लगने लगा था! में सोचता था कि 'बचपन' मे मै कितना पागल था क्युं की २-३ कक्षा में मुझे स्कुल जाना अच्छा ही नहि लगता था। लेकिन अब यहां मेरे दोस्त बनने लगे थे। स्कूल १२ बजे छुट जाया करता था। अब मै पहली बेन्च पर बेठने के बावजुद सबसे आखिर में क्लास से नीकलता था। शायद ईस लिए की खाली क्लास को देखना मुझे अच्छा लगता था। कभी कभी वह घर जैसा दिखता था। कुछ एसा ही होता था मेरा क्लास रुम...बस उस वक्त एसी प्लास्टिक की कुर्सीयां नहि होती थी!
हर एक बैंच की अपनी एक कहानी होती होगी । हर एक बच्चा अपनी कोई न कोई निशानी बैंच पर छोड ही जाता है। बैंच पर अपना नाम खुरदना, या बोलपेन से मोटे मोटे अक्षरों से लिख देना। कोई बच्चा मेरी तरहा तबले की थाप दे कर ज़ोरो से गीत भी गाता होगा। क्या बैंच को यह सब पसंद होगा? फिर स्कुल में दिवाली के समय कुछ दोस्त छुपा कर एसे फोटो वाले ग्रीटींग कार्ड लाने लगे थे! अगर आपको चवन्नी में अमिताभ या माधुरी मील सकती हो तो क्या आप दिवाने नही हो जाओगे? उन दिनो मेगेझीन तो हर घर में होते नही थे, ले दे कर एक दिन समाचार पत्रों मे बोलिवुड की पुर्ति आती होगी। अखबार भी रोज़ थोडे ही मंगवाया जाता था!
 
 
 
हम तो पोस्टकार्ड साईज रंगीन फोटो देख कर दंग रह गये थे। फिर जो आपको वह चवन्नीयों वाला किस्सा सुनाया था न? उन से देढ रुपये जमा कर मैने ६ ग्रीटींग कार्ड्स खरीदे! उन ६ कार्ड्स में एक तो अमिताभ जी का था। एक नये एक्शन हीरो अजय देवगन का था। बाकी चार खुबसुरत फुलो के थे....जी नही सही में फुलो वाले कार्ड्स थे| कार्ड में सिलवटें न हो जाए इस लिए एक नोटबुक में उन्हे रख दिया था। दो चार दिन तो सब को कार्ड दिखाता रहा, लेकिन एक दीन रीसेस टाईम में किसी एक लडकी ने वह कार्ड्स ले कर सहेलींयो को दे दिए। मेरे क्लास में वापस आने पर वे सब मुझे कार्ड दिखा कर चिढ़ाने लगी। मै हरएक कार्ड उनसे छीन लाया....लेकिन सब में सिलवटें पड चूकी थे!
 
 
स्कूल मे हम बच्चों की जो बातें होती थी...क्या बताउं। यहां-वहां, ईधर-उधर, दुनिया भर की बातें! लेकिन उनमें से आधी बाते भी हमारे काम की नही होती थी। बाकी आधी जो काम की होती थी उनमें भी कोई तुक वगेरह नही हुआ करता था! लेकिन बातें करने का मज़ा ही कुछ और था। यह ओर हाल है की आज लोग मुझे कहते है तुम बहुत कम बोलते हो!
 
 
क्लास में कभी कभी नई नई चीजें भी आती रहती थी, जिनमें पेन सबसे ज्यादा चर्चामें रहता था । चोथी कक्षा तक तो हम पेन्सिल का ही उपयोग करते थे। बार बार उसे छीलने के बहाने क्लासरुम के बाहर निकलते थे! कुछ एसे बच्चे भी थे जो शार्पनर की बजाए ब्लेड का उपयोग करते थे। मुझे तो उंगली कटने का डर लगता था लेकिन मेरा शार्पनर बार-बार गुम होजाने के कारण मै भी ब्लेड का ईस्तमाल करने लगा था।
 
 
पांचवी कक्षा की पहले या दुसरे ही दिन हमारी सबसे खतरनाक शिक्षिका ने (जो ईग्लिश पढ़ाया करती थी) एलान किया की कल से आप अपना पेन ले कर के आओगे। वैसे हमे तो पता ही था की पांचवी कक्षा में, ईग्लिश विषय में, आपको पेन से ही लिखना पड़ता है। लेकिन फिर भी....मुझे लगा कि मै बहुत बड़ा हो गया हुं। पापा की तरह मै अब पेन से लिखुंगा! यह बहूत बड़ी बात थी मेरे लिए! पेन में उन दिनों आज की तरह ज्यादा वेराईटीझ नहीं हुआ करती थी। ओप्शन जो उपल्बध होते थे...एक रूपयेवाली या ज्यादा से ज्यादा दो रुपएवाली। सादी या नुकीला पोईंट। बस। ईतना ही। अगर रीफील खत्म हो जाए तो बाकाईदा नई रीफील ली जाती थी। ये नही के रीफील खतम तो नया पेन। हां एसा हो सकता था की आपको क्लास में या स्कुल के ग्राउन्ड से कीसीका गीरा हुआ पेन मिल जाए। जब आप नए पेन से या उस मिले हुए पेन से लिखना शुरू करो....तुरंत बाजुवाल मित्र आपको पुछता भी था (सभी एक दुसरे के पेन के बारे में जानते ही थे।) की..."नया पेन लाया? दिखा दिखा!" मतलब के कोन से मित्र के पास कोन सा पेन है यह सभी को पता होता था। पेन की सबकी अपनी अपनी मनपसंद ब्रान्ड हुआ करती थी। स्टीक मतलब पुष्पा, रेनोल्ड मतलब तेजल। कभी कभी पापा की ओफिस में पेन दिए जाते तो वह पेन मुझे देते। लेकिन वह पेन मुझे पसंद ही नही था...बिना ढक्कन वाला मोटा सा पेन। मैने पापा के पुराने पेन को काट कर एक एसा पेन बनाया था जीससे लिखा भी जा सकता था और, पीछे फुंक मारने से सीटी बजती थी! मैने अपने एक पुराने खिलौने की सीटी उसमें डाल दी थी! आठवी कक्षा में एक वैशाली नाम की लड़की एक पैन लाई थी, उससे लिखने कागज़ से खुश्बु आती थी! उस पेन का आकार गोल सिलिन्डर नही लेकिन चोकोर सिलिन्डर था। सफेद, लाल, हरा, गुलाबी, सायन जैसे मनमोही देशी-विदेशी रंगो में यह पेन उपलब्ध था। किंमत थोडी सी ज्यादा थी - पांच रुपये। छठी कक्षा मैं तो एसे पेश आते थे मानो हम बारहवीं कक्षा में आ गए हो, या उतने ही मेच्योर हो गए हो। झगड़े भी बढ़ गए थे। मुझे जो लगता था कि पुरा क्लास मेरे साथ है, वह अब गलत साबित हो रहा था। खेल-कुद, हाजरजवाबी, कपडेलत्ते, ग्रूप और शेखी मारने वाली बातों में मै पीछे रह गया था। मेरा अब तक जो पढ़ाई में अव्व्ल रहने का रेकोर्ड था वह तुट चुका था। पिछले साल मेरा पांचवा नंबर आया था। ईस साल मेरा लड़कीयों वाला ग्रूप भी तुट चुका था। सो मै पुरा ध्यान पढाई में लगा रहा था। अपने बचपन और पुराने दिन एसे याद करता था जैसे में अब कर रहा हुं! ईस बात से अंजान की ईस साल की तीनों परीक्षा में मेरा अव्व्ल नंबर आनेवाला था और मुझे सर्टिफीकेट भी मिलनेवाला था! ईसका मतलब यह नहीं की मैं बहुत ही ज्यादा होशियारचंद हुं। बल्कि मेरे कोम्पेटीटर को अब पहला नंबर लाने की कोई पड़ी न थी। वे सब अपनी धुन में मस्त थे!
मुझे हाल ही में मिले उस स्कुलमेट का जिसने मुझे यह 'प्लास्टिक बैग्स' की याद दिलवाई। यह बैग्स बुक्स निकालते वख्त आवाज़ बहुत करते थे। हम हंमेशा सर-मैडम को आवाज कर कर के चिढाते थे! कीतनी बार यह प्लास्टिक बैग्स ने धोका दिया है । फट के पुरी किताबें बिखेर दी है। अधिक वजन रखने से ईनके हैन्डल भी तुट जाते थे। लेकिन बरसात में यही सबसे ज्यादा भरोसेमंद रहे थे। बारिश के दिनों में स्कुल बैग्स में प्लास्टिक बैग रख कर उनमें किताबें रखी जाती थी। ८ वीं कक्षा से स्कूल बैग का खर्चा बच गया। उन दिनों कोलेस स्टुडन्ट सिर्फ एक नोट ले कर कोलेज में जाते थे। आप ९० के दशक की कोई फिल्म देख लो....अक्षय या आमिर की! सिर्फ एक नोट में सारे विषयों का समावेश हो जाता था! हालां की कुछ स्टुडन्ट्स प्लास्टिक बैग युझ करते थे। यही ट्रेन्ड था उस समय का। हम भी ८ वीं कक्षा से तरह तरह के प्लास्टिक बैग्स ले कर स्कूल जाने लगे। यह बेग एक-देढ महिने साथ निभाता था। स्कुल के ईस आठवीं क्लास के ख़तम हुए दायके ग़ुजर गए है! ईस दौरान दो-तीन दोस्त कभी-कभार मिल गए। बातें हुई। एक बात वे खास बोले...पुरानी बातें है, ईनमें अब क्या रखा है? तब हम छोटे थे और नासमज थे...वगैरह। सही है....अतीत को साथ ले कर कौन पागल जीता है भाई? लेकिन मेरे दिमाग में जैसे की कहा था की कुछ केमिलल रीकेशन का लोचा है! कुछ ना होते हुए भी वह दीन एसे महसुस होते है जैसे शाम को किसी सड़क पर पीछे छोड़ा हुआ कोई एसा चौराहा जहां थोड़ी सी रोशनी थी। सब कुछ भुल कर कुछ साल जिंदगी के जद्दोजहद में बीततें है। फिर कोई तराना, कोई खुश्बु, कोई त्यौहार या बरसात, फिर से पुरा स्कूल सामने ला कर रख देती है! यह पागलपन नहीं तो ओर क्या है?
उन दिनो विडीओ गेम आदि तो होते नही थे, ट्युशन का भी नामोनिशान नहीं था। स्कुल में जो पढ़ा वही साल भर बाद परीक्षा में लिखना पड़ता था। ईसलिए हमारे पास तो फालतु समय खुब हुआ करता था। आप खेल कुद् करके थक जाओ फिर भी दिन खत्म नही होता था! फिर रात को टीवी चालु कर के बैठ जाते थे। पांच-दस मिनट के बाद कोई प्रोग्राम दिखाई देता था, वरना युं ही झरमर झरमर बारीश सा स्क्रीन सब देखा करते थे। आस पास से महेमान भी वक्त गुज़ारने आ जाते थे, वरना हम कहीं चले जाते थे। समय बहुत था, जो धीरे धीरे गुज़रता था, अच्छा गुज़रता था!
यह मेरी अपनी सचीमुची की यादें है! यह मेरा सच है! आपको कैसा लगा यह पढ कर जरुर बताईगा और अपनी कोई पुरानी यादें हो तो जरुर साझा किजीएगा!


आगे पढें 90s का दशक

बर्फ का गोला


बर्फ का गोला.... चुस्की का प्रारंभिक स्वरुप, सबने जीवन में खाया ही होगा। बस, उसी की कुछ यादें लिख रहा हुं, कैसे पहली बार बर्फ का गोला खाने को मिला और फिर दोबारा उसके लिए क्या क्या पापड बेलने पडे!
मुझे बर्फ तो क्या, ठंडे पानी पीने की भी मनाही थी। वैसे तो घर में फ्रिज था ही नहीं, सिर्फ एक ही दोस्त के घर पर फ्रिज था। लेकिन मुझे टोंसिल्स हो जाते थे, अगर मैं आईस्क्रीम खाउं या ठंडा पानी पी लुं। मम्मी की डांट फिटकार से तो अच्छा था कि मैं एसी कोई चीज़ें खाउं ही ना।

एक बार मैं अपने दोस्त के घर खेलने के लिए गया था। वहां शाम के साड़े पांच बजे एक बर्फवाला निकला। मेरा दोस्त उसकी मम्मी से जिद्द करने लगा। मुझे अभी बर्फ के गोले के बारे में पता ही नहीं था। देखा था लेकिन कभी खाने को भी मिलेगा, कल्पना करना मुश्किल था!

दोस्त की मम्मी ने चवन्नी दी। हम दोनों एक एक प्लेट ले कर वहां गए और दोस्तने बिना पुछे ही ओरेन्ज रंग डलवा दिया। उन दिनों बर्फ के घिस-पिस कर हाथों से ही दबा कर गोल लड्डु सा बना दिया जाता था। फिर उस पर कोई एक रंग डाल कर दिया जाता था। दाएँ-बाएँ दो अलग अलग रंगो का चलन थोडी देर से शुरु हुआ।
फिर वापस घर आ कर हम बर्क के गोले की चुस्कीयां लेने लगे। तब क्या बताउं के कितना मज़ा आ गया!

फिर आधा गोला खत्म करने पर मेरे दोस्त ने कहा अब ईस पर थोड़ा नमक डाल कर खातें है, मज़ा आएगा। अब तक तो गोले का मज़ा आ ही रहा था, नमक छीडकने के बाद स्वाद बढ गया! फिर मेरे दोस्त ने बताया की अलग अलग रंगो का स्वाद अलग अलग होता है, अब अगली बार काला खट्टा रंग खाएंगे। मैं भी हां में हां मिलाता रह गया। उस दिन हम क्या खेले क्या नहीं, लेकिन क्रुतज्ञावश में उस दिन उसकी सारी बातें मानता रहा!

तो एसा था मेरा पहला अनुभव बर्फ के गोले खाने का।
 
थोड़ा बडा हो जाने के बाद तो मैं घर से बाकायदा पैसे ले कर गोला खाने के लिए जाता। लेकिन एसा बहुत कम बार होता, क्युं की बर्फ खाने की घर से मंजुरी नहीं मिलती थी। हर बार 'ना' सुनना पडता था। फिर मुझे एक और मित्र मिला। 
 
उसके पास पता नहीं कैसे, हंमेशा पैसे होते थे। वह शायद मम्मी-पापा और बड़े भाई से अलग अलग पैसे लेता होगा। लेकिन जो भी हो, वह दिलदार दोस्त कम से कम... तीन-चार लोगों को बर्फ जरुर खिलाता था! यानि एक अठन्नी तो वह खर्च कर ही देता था। कभी कभी जब तीन-चार की जगह हम दो लोग ही मौजुद होते तो हम दो बार भी बर्फ खा लेते! मुझे बोनस का मतलब बचपन से ही पता था!
 
जब हम बर्फ खरीदते तो उसे छुप कर खाते. ताकि अधिक बच्चें हमें देख न लें और सबको या घरवालों को पता ना लगे। झाडीयों के पीछे बैठ कर हम आराम से बर्फ खाते और होठों के बदले हुए रंग को वापस सामान्य होने पोंछते रहते!

ईस तरह बर्फ के गोले का जादू बहुत लंबा चला।
 
हां, बर्फवाला गर्मीयों की सीझन में आता था। मतलब जब हम बर्फ खा रहे थे उन दिनों वेकेशन होता था या उसकी तैयारी होती थी। ईसलिए वेकेशन का मज़ा और बर्फ़ का गोला .... ईन दोनों की मिश्रीत यादें बहुत ही बढिया बनी!
 
वैसे, आठवीं कक्षा में जब स्कूल के पास एक बर्फवाला लड़का अपना ठेला ले कर आता... उस पर मुज़े गुस्सा आता था। हमारी स्क़ुल का रिसेस समय दोपहर तीन या साड़े तीन बज़े हुआ करता था। वह गोलेवाला लड़का बिलकुल टाईम पर आ के अपना ठेला लगा देता था। उसकी उम्र भी अधिक तो नहीं थी, शायद दो-तीन साल बड़ा होगा।  
 

 
उस समय वह एक टोपी खास पहनता, वैसी ही जैसी आमिरखान ने फिल्म दिल है की मानता नहीं में पहनी थी। पता नहीं, एसी कैप उसे कहां से मिल गई थी। गोराचीट्टा और भुरी आंखो के कारण वह कैप उस पर जंचती भी थी।
 
वहां हमारे और बाकी क्लास की लड़कीयां भीड़ जमा देती थी। वह बर्फवाला खुद को हीरो समजने लगा था। हमारे क्लास की एक लड़की को बिना पैसे भी गोला दे देता था। हमारे लिए बात बहुत संदेहास्पद थी। हम जब बर्फ लेने जाते तो हमे वह देर से ही बर्फ देता, पहले वह सारी लड़कीयों को ही बर्फ खिलाता। बहुत गुस्सा आता था उस पर... लेकिन खैर!
 

चौथी साईकिल



अभी आप सोचने लगोगे.... यार यह गरीब और कितनी साईकिल लेगा? वैस, गलत नहीं सोच रहे आप!
तीसरी साईकिल बेची उसके बाद मुझे कॉलेज जाना था। मेरे पास वाकई बाईक आए, एसी कोई भी संभावना नहीं थी। वैसे बाईक का शौक तो मुझे कम था, लेकिन था! वह स्प्लेंडर याद है ना? वही मुझे अच्छी लगती थी। मैने दोस्तो से पुछ भी रखा था कि, गियर आगे होतें है या पीछे? लेकिन यह तो कोई योग्यता नहीं हुई बाईक धारक की! सो मैनें अपने अठराह साल पुरे होने के तीसरे माह ही पक्का लाईसन्स ले लिया... एक रिश्तेदार के उधार के स्कूटर की मदद से! आपको जान कर हंसी आएगी.... जिस दिन में लाईसंस के लिए स्कूटर ले कर जा रहा था, तभी ट्राफिक पुलिस द्वारा पकडा गया! चालान भी कटा, लेकिन लाईंसस की परीक्षा पास करने की खुशी दो गुनी थी।
 
खैर, बाईक तो फिर भी नहीं मिली... सो मैं मेरे हाथो एक पुरानी स्पोर्ट साईकिल हाथ में आई। जिसका हैंडल गोल घुमा हुआ होता है और टायर पतले होतें है। कॉलेज पुर्ण कर के भी वही साईकिल मै एक छोटी नौकरी के लिए उपयोग करता रहा। वैसे यकिन मानिए. मेरी जीवनकहानी उतनी बोरिंग नहीं है जितना आप समज़ रहे हो!
 
फिर वह साईकिल छूटी और मेरे पास वही स्प्लेंडर है... जिसका मैं बचपन से सपना देखा करता था! हाला की इसके दो तीन सालों बाद... एक पांचवी साईकिल भी ली गई! वह मैने पता नहीं क्युं खरीदी....लेकिन स्प्लेडर के साथ वह भी पार्क रहती है। कभी कभी सुबह या शाम को सैर कर लेता हुं! 
 
और फिक्र मत किजीये, उस पर लेख नहीं आएगा!

Monday, 20 June 2022

गुलज़ार कौन है?

गुलज़ार कौन है?
सिर्फ गीतकार? या फिर लेखक? या फिर उमदा फिल्म दिग्दर्शक?

गुलज़ार साहब की जीवनी तो उनके प्रसंशक जानते ही है । लेकिन मुझे उनके रचनाएं प्रायः प्रेरणा देती रहीं है। उन दिनों (९० के दशक में) मेरे पास न थो ईन्टरनेट था या न तो फिल्मी मेगझीन्स खरीदने की 'लक्झ्युरी'। लेकिन फिल्म सत्या के बाद मैनें उनको 'फोलो' करना शुरु कर दिया था। बड़ी उम्र के मित्रों से पता चला की उनके कई गीत बहुत प्रसिद्ध है जैसे की 'मासुम' के।

फिर क्या है! हमने उन दिनों के जेब खर्च से जैसे तैसे ३० रुपये ज़मा कर के मासुम की ओडियो केसैट लिया। उस केसैट की दुसरी साईट फिल्म 'घर' के गाने थे । जैसे फिटकरी और चोखा रंग वाला मुहावरा । मुझे तो घर के गाने भी बहुत अच्छे लगे ! लेकिन एक बात ध्यान में आई की 'मासुम' का 'लकडी की काठी' वाला गाना अगर गुलज़ारजी लिखतें है तो उन्हों ने कई गीत बच्चों के भी लिखें होंगे?

फिर कुछ समय शनैः शनैः बाद कहीं कहीं से पता चला । लकडी की काठी, जंगल जंगल बात चली है, टप टप टोपी टोपी, पोटलीवाले बाबा, चुपडी चुपडी चाची वगैरह गीत उनके ही है । फिर किसी अख़बार में पढने मिला की हम जो प्रार्थना बचपन से स्कूलों में हररोज करते थी, वह भी उनकी लिखी हुई है - हमको मन की शक्ति देना!

फिर उनका लिखने का अंदाज़ समज में आने लगा और गुलज़ार सा'ब के हम 'फैन' होते गए! उस दौरान दो और ओडीयो केसैट खरीदे गए । एक था 'सनसेट पोईन्ट' और दुसरा 'अब के सावन' । 'कच्चे रंग उतर जाने दो' गीत कहीं सुना लगता था जो एक सिरीयल का टाईटल सोंग भी था । लेकिन 'अब के सावन' जिसके गीतकार पसून जोशी थे, उनकी स्टाईल मुझे गुलज़ार सा'ब की लगी और ठीक वही बात प्रसून जोशीजी ने कहीं कोई आर्टीकल में पुष्टी भी की!

तब तक सब कुछ ठीक था। अगर कोई पुछे की मेरा पसंदीदा गीतकार कौन हे तो एक ठोस जवाब मेरे पास था । लेकिन फिर दूरदर्शन पर पुरानी फिल्म देख कर पता चला की ईन्हों ने तो फिल्म भी डाईरेक्ट कर के रखी है! उन दिनों 'माचिस' भी आनेवाली थी। फिर अखबार या मेगेझीनों से पता चला उनकी 'परिचय' फिल्म के बारे में । उन दिनों केबल टीवी चलता था लेकिन मेरे घर पर उसका मना था । सोचता था शायद 'परिचय' देखने को मिल जाए । लेकिन सपना अगले ४-५ साल पुरा नहिं हुआ ।

फिर धीरे धीरे आया डीजिटल युग - फिल्मों का, गानों का ! अब उंट पहाड के नीचे आ चुका था । 'परिचय' की एसी डीवीडी मिली जिसमें गुलज़ार की दो ओर फिल्में थी । ईन्टरनेट भी पधार चूका था और सारी जानकारी जो मुझे जानने को बरसों लगे थे, एक ही क्लिक में पुख़्ता हो गई! वाह!

अब जब मैं उनकी परिचय, खुश्बु जैसे फिल्में देखता हुं तो उनकी स्टोरी टेलिंग बहुत भाती है । 'परिचय' में जम्पींग जैक जितेन्द्र को अतिगंभीर भूमिका देना वही मानों RGV जैसी सोच थी। 'खुशबु' कहानी की परतें एक के बाद एक खुलना भी रोमांचकारी है । फिर खुश्बु की ही एक कहानी पर से पुरी 'नमकीन' फिल्म बना देना भी एक सुंदर कला थी ! 

गुलज़ार साहब के लिखे गीत मुझे बहुत पसंद है….

  • मुसाफिर हुं यारो
  • आनेवाला पल
  • ओ माझी रे
  • ईस मोड से जाते है
  • तुम आ गए हो
  • हज़ार राहें
  • रुके रुके से कदम
  • तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा
  • मैने तेरे लिए ही सात रंग के सपने चुने
  • कहीं दुर जब दीन ढल जाए
  • बेचारा दिल क्या करे
  • रोज रोज आंखो तले, एक ही सपना चले
  • फिर वही रात है
  • एक वो दिन भी थे, एक ये दिन भी है
  • छै छप्पा छै, छप्पाक छै, पानीयों के/पे छींटे उड़ाती हुई लडकी
  • छोड़ आए हम…वो गलियां


एक कार मिकेनिक जिन्हों ने फिल्मों के लिए उत्कॄष्ट गाने लिखे, पटकथा लिखी, त्रिवेणीयां भी ईज़ाद की, फिल्में बनाई, जय हो के लिए विश्वभर में नामांकन हुआ… उनको एक शब्द में कैसे बयां किया जाए की कौन है गुलज़ार?


गुलजारजी की फिल्म 'खुश्बु' के बारे में यहां क्लिक कर के पढें। | गुलजारजी की फिल्म 'परिचय' के बारे में यहां क्लिक कर के पढें। | बासु चैटर्जी की फिल्में

परिचय


कोई भी फिल्म शुरु होती है तो पहला द्रश्य से ही दर्शक बहुत सारी उम्मीद बांध लेते है। ठीक वैसी ही उम्मीद और जिज्ञासा जो हम किसी अच्छे पढते लिखते बच्चे या नई नौकरी पाने वाले नौजवान से लगाते है। मानो पहले प्यार को ढुंढता हुआ आशिक जो कुछ महसुस करता है। कोई नई गाडी खरीदने पर या कोई नई जगह जाने पर नयापन लगता है। पता नहीं.....जाने आगे क्या हो!

'परिचय' गुलज़ार जी की एक क्लासिक फिल्म है। शायद सभी ने यह फिल्म एक बार तो देखी होगी। रामगोपाल वर्मा जिस तरह हर एक्टर को अलग केरेक्टर में पेश करते थे....गुलज़ार जी ने यह बहुत पहेले ही कर दिया था! जितेन्द्र जैसे जम्पींग जेक एक्टर को ईतना गंभीर और ठहराव वाला रोल देना ही बहुत अद्*भुत सोच थी। सभी को जया बच्चन से तो अपेक्षा होती ही लेकिन जितेन्द्र?

फिर एक फिल्म लिखना, उस की स्क्रीप्ट, संवाद भी लिखना और उपर से गीत भी लिखना.....गुलज़ार ही कर सकतें है एसा तो! और फिल्म को देखो तो? पुरी तरफ परफेक्ट, मानो एक एक क्षण किसी शिल्पकार ने धीरे धीरे उभारे हो। टेक्निकल खामीयां भी कोई नहीं!

लेकिन आज कल जैसे ट्रेलर, प्रोमो और फिल्म मेकिंग के सीन्स आधी फिल्म तो दिखा ही जाते है, जिस से दर्शक की आधी जिज्ञासा तो पुरी ही हो जाती है। आधी फिल्म बे मतलब (फिल्म की कहानी में जबरन डाले हुए ) गानों से भरी हुई होती है। एसे ही फिल्म मेकर्सने नया श्लोक/आयात बोलिवुड को दी है...
एन्टरटेईन्मेन्ट-एन्टरटेईन्मेन्ट-एन्टरटेईन्मेन्ट!
अगर दादा साहब फाळके या राज कपूर ने भी एसा ही सोचा होता तो?


खैर....अब परिचय की कहानी पर आते है।

कर्नल राय साहब एक कड़क मिज़ाजी ईन्सान है, अपनी पुरखों की हवेली में रहते है। अपने उसुलो के पक्के और नियमों से बंधे हुए। अपने संगीत प्रेमी बेटे निलेश से वह खफा थे क्यों की वह उनके मर्जी के खिलाफ संगीत सिखता था और अपने गुरु की लडकी से बिना बताए शादी कर ली थी।


राय साहब उसे घर से निकाल देतें है। स्वाभीमानी निलेश भी घर वापस नहीं लौटता। अपना जीवन गरीबी में व्यतित करता है। उसके कुल पांच बच्चे होते है। रमा, अजय, विजय, मीता और संजय (संजु)। निलेश की पत्नी गुजर जाती है और निलेश भी बहुत बिमार होता है।

वह अपने पिता कर्नल राय साहब को खत लिख कर बताता है। आखिरकार निलेश की मृत्यु के बाद वह बच्चे अपने दादा जी मतलब कि राय साहब के पास पहुंच जाते है। 

रमा सबसे बडी थी और उसे लगता था की अपने पिता की मौत के जिम्मेदार उसके दादा राय साहब थे...वह उनसे खफा होती है। सारे बच्चे भी उसीका अनुकरण करतें है। गुस्सैल राय साहब और उनकी बहन सती देवी बच्चों पर सख्ती बरतती है।

बच्चों को टीचर की व्यवस्था घर में ही दी जाती है। लेकिन बच्चे अपनी शरारतों से उन सभी शिक्षकों को भगा देतें है। वे पढना ही नहीं चाहते।

रवि शहर नौकरी ढुंढ रहा है| यहां एक बहुत ही हृदयस्पर्शी सीन जोडा गया है, जिस को शायद कम लोगों ने नोटिस किया होगा/याद रखा होगा। ईस सीन जब रवि एक बनिये के वहां नौकरी के लिए जाता है तो उसे नौकरी मिल जाती है। लेकिन उसे पता चलता है की उसको वह नौकरी कीसी बुढे कर्मचारी की जगह पर मिल रही है। रवि की उस बुढे कर्मचारी से बात, संवाद होता है। मुझे यह सीन बहुत पसंद आया। यह सीन आप जरुर देखिएगा। फिल्म में यह सीन शायद जरा भी जरुरी नहीं था, कहानी से ईसका कोई तालुक भी नहीं था। लेकिन फिर भी...जीवन की करूणा और मानवता फिल्मों में होनी/दिखानी ही चाहिए; गुलज़ार जी यही मानते होंगे। सुपर्ब!

ईस से पहले गुलज़ार जी की फिल्म मेरे अपने में मुख्य हीरो रह चूके विनोद खन्ना ने रवि के दोस्त अमित का किरदार निभाया...जो मेरे खयाल से बड़ी उदारता है।

अमित रवि को सलाह देता है जब तक नौकरी न मिल जाए गांव जा कर उसके मामा जी जो नौकरी दिलवा रहें है....वह कर ले। फिर अच्छी नौकरी मिलने पर चाहे तो वापस लौट आए।

ईस प्रकार रवि गांव की ओर निकल पडता है, ईस कर्णप्रिय गीत के साथ....मुसाफिर हुं यारो! 

रवि अपने मामा जी के साथ राय साहब को मिलने जाता है और वहां उसकी शिक्षक की नौकरी पक्की हो जाती है। वहां रवि किस तरह धीरे धीरे शरारती बच्चॉ के सुधारता है और उनका दोस्त बनता है यह कहानी का सबसे मजेदार हिस्सा है।


धीरे धीरे रमा रवि से प्यार करने लगती है, राय साहब भी रवि पर विश्वास करने लगते है। रवि धीरे धीरे अपने प्रयासों से बच्चों के दिल से अपने दादा जी, मतलब की राय साहब के प्रति जो गुस्सा था वह निकाल देता है।

उल्लेखनीय है की विलन या नेगेटीव रोल में प्रस्थापित हो चूके प्राण साहब की केरेक्टर भूमिका दर्शकों और विवेचकों द्वारा बहुत पसंद की गई। जितेन्द्र और प्राण को अपने चलते आ रहे रोल से अलग लेकिन यथायोग्य रोल में देखना...बहुत फ्रेश अप्रोच था!


राय साहब के नौकर 'नारायण' का रोल असरानी ने अदा किया है। यकीन मानीए ईस रोल को असरानी के अलावा अन्य कोई भी शायद ही न्याय दे पाता। नारायण स्वामी भक्त है और कर्नल राय साहब के अकेलेपन के दुख से अच्छी तरह वाकेफ है।

ईस बीच कर्नल साहब को काम के सिलसिले में बाहर जाना पडा। बच्चे जो घर में कैद से थे वह अब अधिक खुल गए। रवि भी उनको हंसाता, घुमाता और साथ साथ पढाता है। बच्चे रवि के मामा जी से मिलने उनके घर भी जातें है। मामा-मामी को रमा भा जाती है।


कोई भी लेखक या कलाकार यह जानता है की रचनाओं में विषमता (Contrast) का होना कितना जरुरी है। द्राश्य, श्राव्य या अनुभव हो सके ऐसा कोन्ट्रास्ट दिखाने से रचनाओं में रस बढता है। रचनाएं और ईन्ट्रेस्टींग हो जाती है। मतलब की साईझ कोन्ट्रास्ट, एस्थेटीक/फील कोन्ट्रास्ट ... सब होना ही चाहिए। वरना कहानी या फिल्म भी सरपट या सपाट हो जाती है।

फील/एस्थेटीक कोन्ट्रास्ट का बढिया उदाहरण होलिवुड की फिल्म 'ध प्रपोझल' हो सकती है। ईस में शहर से निकल कर छोटे से टाउन में आ कर रहना फिर आखिर में वापस शहर का वातावरण दिखाना...वगैरह दर्शक को रसप्रद लगता है। होलिवुड की एसी सेंकडो फिल्म हैं...कास्ट अवे, ध ममी, रोकी वगैरह।

अपने यहां कोन्ट्रास्ट का उपयोग कम बार हुआ है वह भी माईल्ड लेवल पर। या जब अमीर हीरो/हीरोईन या गरीब हीरो/हीरोईन का प्रेम दिखाया गया हो तब आप यह कोन्ट्रास्ट महसुस कर सकतें है।

लेकिन गुलज़ार और ह्रिषिकेश मुकर्जी ने एस्थेटीक कोन्ट्रास्ट का उपयोग किया है जो बहुत कम फिल्म दिग्दर्शक कर सके। वह भी उस जमाने में...जब फिल्म बनाना ही एक चेलेन्ज था!

यहां पुरी कहानी बता देने से अच्छा है की आप स्वयं ईस फिल्म को देखे और अनुभव करे। यह फिल्म एक पुरानी फिल्म 'द साउंड ओफ म्युझीक' से प्रेरित हो कर बनाई गई है। लेकिन गुलज़ार जीने ईसमें अपनी वो दक्षता दिखाई है की फिल्म पुरी तरह भारतीय परिवेश में ढल गई है। 

आनंद, परिचय, खुश्बु जैसी कई एसी फिल्में है जो एक बार देखने जैसी नहीं है। आप उम्र के अलग अल्ग पड़ाव पर ईसे देखें, आपको एक नया अनुभव और सीख मिलती रहेगी!

गुलजारजी की ही फिल्म खुश्बु के बारे में यहां क्लिक कर के पढें।

Sunday, 19 June 2022

बासु चैटर्जी


 

आज बात करतें है फिल्म डिरेक्टर बासु चैटर्जी के बारे में। वैसे तो मै पुरानी फिल्में कम ही देखता था। भला डीवीडी और केबल कनेक्शन के दौर में होलिवुड फिल्मों का चलन एसा बढ गया था की पुछिए मत। हिंदी फिल्म ईंडस्ट्री में भी उन दिनों कुछ भी खास या नया नहीं हो रहा था। एक बार मुझे पुरानी गोलमाल फिल्म की ३ ईन १ डीवीडी दीखी। वह डीवीडी में अमोल पालेकर की दो ओर फिल्में 'छोटी सी बात' और 'बातों बातों में' भी थी। गोलमाल देखने के बाद मैने यह दो फिल्में भी बारी बारी देखी।

रियालिस्टीक फिल्में सिर्फ होलिवुड और हिंदी फिल्म ईंडस्ट्री के कुछ नए फिल्म डाईरेक्टर्स ही बना रहे थे। पेरेलल सिनेमा तो  पुर्णतः विलय हो गया हो एसा लगता था। लेकिन रियालिस्टीक छोटी सी बात और बातों बातों में यह दोनो फिल्में मुझे गोलमाल से अधिक रियालिस्टीक लगी, अधिक जुडाव महसुस हुआ।
उसके बाद रजनीगंधा फिल्म देखने को मिली। फिर ध्यान गया की ईस फिल्म को भी बासुदा ने ही बनाया है। अब मुझे बासुदा यानी बासु चेटर्जी का काम बहुत ही आकर्षक लगने लगा।


बासुदा की फिल्मों का हीरो लार्जर देन लाईफ नहीं है। वह हीरोपंती नहीं करता। बिलकुल एक सामान्य ईंसान / कोमन मेन होता है। उसकी परेशानियां भी हमारी रोजमर्रा की तकलीफों जैसी ही है। उस परेशानियों का हल भी सामान्य होता है। (फिर भी, एसा सिर्फ फिल्मों में ही होता है!) बासुदा का हीरो गुंडों से लडता नहीं है, दूर रहता है या मार खाता है। लड्कीयों से आकर्षित तो बहुत होता है, लेकिन बेचारा कुछ कहने की हिंम्मत नहीं जुटा पाता। दोस्तों से सलाह-मशवरा करके हिम्मत तो जुटा लेता है लेकिन फिर भी हरबार पराश्त ही होता है। वह आज्ञाकारी होता है, छोटी मोटी नौकरी करता है, फिल्में देखता है, लोकल ट्रेनमें सफर करता है, छोटे छोटे सपनें देखता है... बिलकुल एसे ही, जैसे हम आम ईंसान होतें हैं।

बासुदा की फिल्मों मे दिखाने जानेवाली प्रुष्ट्भुमि यानी की बेकग्राउंड भी बहुत सीदासादा होता है। नायक-नायिका का घर और औफिस एसे होते है, मानों हमारा ही घर और औफिस हो। वही छोटे कमरे, खिडक़ीयां, शो पीस। याद किजीए रजनीगंधा के फूलों से महकता छोटा सा कमरा। या दरवाजे के बहार फुल लिए खडा टोनी ब्रिगेन्झा। या याद किजीए बसस्टोप पर खडी ओफिस गर्ल प्रभा नारायण।




उनकी फिल्मों का अंत या क्लाईमेक्स भी बाकी फिल्मों से अलग होता है। बाकी डाईरेक्टर्स की फिल्मों की तरह बासुदा की फिल्मों का अंत को बढाया-चढाया नहीं जाता। उनकी फिल्मों में रोजाना जीवन से हट कर एक दीन एसा आ जाता है, जो खास बन जाता है। जैसे 'बातों बातों में' बहुत ही सामान्य तरीके से फिल्म अपना सुखांत पाती है। कोई एक्शन, भागादौडी, ड्रामा, डाईलोगबाजी नहीं होती। एकदम सामान्य तरीके से घटनाएं घटती जाती है। और यह सब बहुत योग्य लगता है। एसा नहीं लगता की सिर्फ दर्शकों को अच्छा महसुस करवाने के लिए जबरन लडाई या कोमेडी सिच्युएशन डाल दी गई हो। यह भी तो दर्शको के प्रति बासुदा की प्रामाणिकता ही है!

बासु दा का अपने फिल्मों के क्लाईमेक्स के प्रति एक फिलोसोफीकल विचार रखतें है। वे चाहतें है की दर्शक उनकी फिल्मों को पुरा याद रखे.... ना की सिर्फ क्लाईमेक्स। जैसी की ह्रिषी दा की गोलमाल, जिस के अंत में दर्शक हंस के लोटपोट हो जाते है। आपको या तो उस फिल्म की शुरुआत यानी की ईंटर्व्यु याद होगा या अंत, जिसमें उत्पल दत्त पिस्तोल ले कर अमोल पालेकर के पीछे भागतें है। बिच में हास्य से भरे किस्से है, लेकिन जब फिल्म देखने बैठो तो याद आते है। जब कि, बासुदा कि फिल्मो को अधिक फील / महसुस किया जा सकता है।

एक फिल्ममेकर के तौ पर अगर आप बासुदा जैसा ओर काम करना / देखना चाहते हो, तो आपको यह तय करना होगा -
टेकनीकली और व्यावारिक तौर पर सोचा जाए तो एक कैमेरा ओन होते ही प्रति सेकेंड २४ फ्रेम के हिसाब से फिल्म की रील ईस्तमाल होने लगती थी। लाईट,
साउंड और बाकी सारा खर्चा मिला कर वह एक क्षण हजारों रुपये का होता था। अब प्रोड्युसर ईतना खर्चा करता है, मानों आप ही एक बडी रकम दे रहें हो... आप क्या सोचते हो? आपकी फ्रेम में क्या होना चाहिए? धमाकों के बीच से या खुब सुरत लड्कीयों के झुंड से स्लो मोशन में निकलता स्टाईलिश हीरो या बस की लाईन में खडा, पसीना पोंछता हुआ सीदा सादा अरुण प्रदीप? उस हजारों रुपये के एक शोट में एक रजनीघंधा के फुलों से भरा फुलदान होना चाहिए या लाखों रुपये की स्टाईलिश कार?

आपको एसी थियेटर में अपने आधे दिन की कमाई दे कर एक फिल्म देखने को मिलती है, आप उसमें क्या देखना चाहोगे?
थोडी देर सब कुछ सब टेंशन भुला दे एसा - पैसावसुल ड्रामा, दिल धडक एक्शन, दिलको छु लेनेवाले डाईलोग?
लंबे समय तक अनुभव होती रहे एसी फ्रेश कहानीयां, गुदगुदाती रहें एसी घटनांए, हमारे जैसा ही नायक?

बासु दा ने अपनी पहली ही फिल्म 'सारा आकाश' से हींदी फिल्म ईंडस्ट्री को दिखा दिया की, वर्ल्ड सिनेमा क्या होता है। एक लो बजेट रियालीस्टीक सिनेमा उन्हों ने बनाई जो फिल्म मेंकिंग के तौर पर भी प्रेक्टिकल / व्यावहारिक थी और एसा चलन आज भी चला आ रहा है। उन्हों ने अपना यही फिल्म मेकिंग स्टाईल फोलो करते गए और कई फिल्मों का योगदान दिया।
रजनीगंधा, चित्तचोर, छोटी सी बात, स्वामी, प्रियतमा, खट्टा मीठा, मंजिल, बातों बातों में, शौकिन, एक रुका हुआ फैसला, चमेली की शादी, कमला की मौत ईत्यादी उनकी बहुप्रचलित फिल्में थी।  उनकी फिल्में जैसे की उसपार, एक रुका हुआ फैसला, चक्रव्युह, फोरैन फिल्मों की रीमेक है। सारा आकाश, रजनीगंधा जैसी फिल्में साहित्य से ली गई है।

उन्हों ने टीवी में जब पदार्पण किया तब भी उनकी सिरियलो ने हंगामा मचा दिया था।
उनकी मशहुर टीवी सिरियल है ... रजनी और ब्योमकेश बक्षी!

आखरी समय तक बासु दा फिल्में बनाने का प्रयत्न करते रहे।

रोचक तथ्य
  • बासु दा ने सोलह साल तक कार्टुनिस्ट का काम किया था। उसके बाद वे फिल्म लाईन में आए!
  • बासु दाने अपनी कई फिल्मों में केमियो रोल भी किया है!
  • बासु दा ने पहली फिल्म उन्हों दो लाख की लोन ले कर बनाई थी!
  • बासु दा के पिताजी रेल्वे के कर्मचारी थे। ईसलिए बासु दा का ट्रेन के प्रति बहुत लगाव था। उनकी कई फिल्मों में ट्रेन का सीन होता ही था। उनकी फिल्म दो लडके दोनों कडके, जिस में एक बच्चा दिखाया गया था जो हरेक ट्रेन के रुट और टाईम को जानता था!
  • उन्हें अंदाजा रहता था की फलां फिल्म में कमाई नहीं हो पाईगी फिर भी वे वह फिल्म बनाते थे!
  • उनकी कई फिल्मों में अमिताभ बच्चन का गेस्ट अपिरिय्न्स होता था!